हिन्दी की जनपदीय अवधी बोली के लोक-साहित्य का परिचय - Introduction to the folk literature of the regional Awadhi dialect of Hindi

हिन्दी की जनपदीय अवधी बोली के लोक-साहित्य का परिचय - Introduction to the folk literature of the regional Awadhi dialect of Hindi


पौराणिक और ऐतिहासिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण अवध प्रदेश कोसल और साकेत के नाम से भी जाना जाता है। अवध प्रदेश में बोली जाने वाली भाषा को अवधी के नाम से जाना गया। अवधी का इतिहास धार्मिक और राजनैतिक दृष्टि से काफी उतार-चढ़ाव का रहा। विभिन्न परिवेशों का सान्निध्य में रहने से इसका साहित्य भी विविधता को आत्मसात् करता गया है। अवधी भाषा में रचित प्रमुख ग्रन्थों में कुतुबन कृत 'मृगावती', मंझन कृत 'मधुमालती', जायसी कृत 'पद्मावत' गोस्वामी तुलसीदास कृत 'रामचरित मानस' उल्लेखनीय हैं। अवधी में रचित कृतियों में जनभाषा की स्पष्ट झलक दिखाई देती है।

अवधी में रचित साहित्य साहित्यिक दृष्टि से महान् हैं। अवधी में लोक-साहित्य की परम्परा भी समय के साथ-साथ चलती रही। सत्ता के निरन्तर बदलाव की धूप-छाँव और मिश्रित संस्कृति के बीच अवधी लोकसाहित्य अच्छा फला-फूला। अवधी भाषा में अनेक लोक गीत, लोक कथा, लोक गाथा, कहावतें, नाटक इत्यादि रचे गए जो लोक-साहित्य-संग्रहण की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हैं।


1. अवधी लोक कथाएँ:


अन्य भाषाओं के लोक-साहित्य की भाँति अवधी भाषा का प्रारम्भिक लोक-साहित्य भी पद्यात्मक शैली में ही रचा गया। परिणामतः इसकी लोक कथाएँ भी पद्य शैली में अधिक प्रचलित हुई।

कालान्तर में अवधी लोक-साहित्य में गद्य शैली को भी अपनाया गया। अवधी में प्रचलित लोक कथाएँ प्रायः धार्मिक अनुष्ठानों, दैनन्दिन लोक व्यवहारों, नैतिक शिक्षा, चमत्कारों तथा पौराणिक आख्यानों पर आधारित हैं। विद्वानों ने अवधी की लोक कथाओं को दो विभागों में विभक्त किया है (i) प्रसंगानुरूप व्रतादि पूजा-पाठ के अवसर पर कही जाने वाली कथाएँ और (ii) वे समस्त कथाएँ, जो व्रतादि धार्मिक अनुष्ठानों और पूजा-पाठादि से भिन्न अवसरानुकूल कही और सुनी जाती हैं। इन लोक-कथाओं में रहस्य तो होता है परन्तु साधारण कोटि का सीधी-सादी भाषा और आडम्बर रहित गतिविधियों को अपने में समाहित किये हुए अवधी लोक कथाएँ,

लोकानुभव एवं जनश्रुतियों पर आधारित हैं। सर्व मंगल की कामना के उद्देश्य से रची गई ये लोक-कथाएँ सुखान्त होती हैं। अवधी भाषा की लोक-कथाओं में ध्रुवकुमार, राजा भरथरी, श्रवणकुमार, राजा सरवन, ढोला हजारी (जो की राजा नल के जीवन पर आधारित है), एकादसी की कथा, सारंगा सदाबृज आदि की कथाएँ प्रचलित और लोकप्रिय हैं। इसके अतिरिक्त परसा, पाप और पुन्य, सबसे छोटी कहानी, सबसे बड़ी कहानी आदि लोक-कथाएँ भी प्रसिद्ध हैं । श्रवण कुमार पर आधारित लोक कथा का एक उदाहरण देखिए, जब श्रवणकुमार की माता प्यास से व्याकुल हो उन्हें पानी पिलाने को कहती हैं तो श्रवण पानी लाने के लिए दशरथ ताल के निकट पहुँचते हैं और फिर आगे की स्थिति का वर्णन इस प्रकार किया गया है-


मटकी बाजी रपटा पाऊँ, भनक परी दसरथ के कान। दसुरथ मारा बानु चढ़ाय, छूटे बान करिहाएँ लागु ॥ राम-राम कहि गिरे उतान को आहिउ करिया नवधान। को आहिउ दसरथु के ताल। हम आहिन सरवन के लाल ॥


2. लोक नाट्य :


लोक नाट्य के माध्यम से सामान्य जनजीवन की इच्छाओं, अभिलाषाओं को अभिव्यंजित किया जाता है । जनसाधारण में व्याप्त गतिविधियों, रूढ़ियों-परम्पराओं, रीति-रिवाजों तथा संस्कृति आदि का चित्रण इन लोकनाटकों में मिलता है। अवधी के लोकनाटकों में रामलीला, रासलीला, स्वाँग, नौटंकी आदि रूपों में जनजीवन की अभिव्यक्ति की जाती है।

रामलीला और रासलीला में धार्मिक भावना को समाहित करते हुए पौराणिक चरित्र विशेष का चरित्रांकन कर उसे जनसामान्य के समक्ष एक आदर्श रूप में प्रस्तुत किया जाता है। अवध प्रदेश का अतीत धार्मिकता से ओत-प्रोत रहा है। उसका प्रभाव अवध लोक नाट्यों में सहज ही देखने को मिलता है। इन नाटकों में पुरुष पात्र ही विभिन्न भूमिकाओं में अभिनय करते हैं।


रामलीला अवधी का अत्यन्त लोकप्रिय लोक नाट्य है। रामलीला का मंचन भी बड़ा भव्य और रोचक होता है। इसका मंचन करने के लिए किसी बड़े मैदान में एक वृहदाकार मंच तैयार किया जाता है।

मंच पर एक और रामायण कहने के लिए रामायण मण्डली बैठती है जो उच्च स्वर में गायन करते हुए रामलीला के प्रसंगों को आगे बढ़ाने का कार्य करती हैं। रामलीला के पात्र संवाद कथन के माध्यम से कथा को विस्तार देते हैं। कई स्थानों पर इन पात्रों का संवाद दर्शकों के साथ भी हो जाता है जिससे दर्शकों और रामलीला के पात्रों के बीच सहज समन्वय स्थापित हो जाता है। रामलीला की ही तरह रासलीला का भी मंचन किया जाता है। रासलीला वासुदेव कृष्ण के व्यक्तित्व और कृतित्व पर आधारित विभिन्न लीला-प्रसंगों का मंचन है। इनके अतिरिक्तराजा हरिश्चन्द्र, दानवीर कर्ण, भक्त प्रह्लाद और राम वनगमन जैसी धार्मिक कथाओं का मंचन भी इन लोक नाट्यों के माध्यम से किया जाता है।


धार्मिक भावना से ओतप्रोत लोक नाट्यों के अतिरिक्त कुछ ऐसे लोक नाट्य भी मंचित किए जाते हैं जो किसी पौराणिक और धार्मिक पात्र से सम्बद्ध न होकर सामाजिक प्रवृत्तियों पर आधारित हैं। इनकी कथावस्तु और परिवेश समाज पर आधारित होता है। सामान्यतः इन्हें नौटंकी के नाम से जाना जाता है। सामाजिक परम्पराओं, रूढ़ियों, रीति-रिवाजों, सामाजिक आडम्बरों, संस्कृति आदि को विषय बनाकर इनका मंचन किया जाता है। यह एक प्रकार का गीतिनाट्य होता है जहाँ पात्र एक मंच पर बैठ जाते हैं और अवसर आते ही अपनी भूमिका निभाते हैं।

लोक-आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए इनमें कई बार अश्लीलता का समावेश भी हो जाता है। अपनी स्वाभाविक सरलता के कारण नौटंकी जनसाधारण का मनोरंजन बखूबी करती है। प्रायः इनका मंचन रात्रि में किया जाता है और कई बार ये पूरी-पूरी रात चलती हैं। यद्यपि वर्तमान में सिनेमा की पहुँच गाँवों तक हो गई है तथापि नौटंकी की लोकप्रियता में आज भी कोई कमी नहीं आई है।


नौटंकी के अलावा अवध प्रदेश में स्वाँग का भी पर्याप्त प्रचलन है। विवाहादि के अवसर पर भिन्न-भिन्न जाति समुदाय के लोग स्वांग किया करते हैं।

खुले रंगमंच पर मंचित किए जाने वाले स्वाँग के पात्र छोटेछोटे प्रसंगों पर अभिनय करते हुए सामाजिक विसंगतियों पर व्यंग्य कसते हैं और नृत्यगीत प्रस्तुति तथा संवादों के मध्य तीक्ष्ण कटाक्ष भी कर देते हैं। 


3. लोक गीत :


प्रायः सभी भाषाओं के लोक गीत दो मुख्य वर्गों में विभाजित हैं पहला संस्कार गीत और दूसरा - श्रमगीत | अवधी भाषा के लोक-गीत भी आधायन की दृष्टि से इन्हीं दो वर्गों में विभक्त हैं । परन्तु अवधी लोक गीतों का यह वैशिष्ट्य है कि इन लोकगीतों में अनेक लोक गाथाएँ भी समाहित हैं,

जिन्हें पँवाड़ा कहा जाता है। उदाहरणार्थ, कुसुमा नामक पँवाड़ा। वास्तव में 'कुसुमा पँवाड़ा जतसारी गीत है परन्तु यह लोक गाथा की श्रेणी में आता है। यहाँ कुसुमा नामक युवती के स्वयं पर मिरजा यानी स्थानीय राजा के रीझ जाने के बाद अपने आत्मसम्मान की रक्षा करने की घटना की चर्चा मिलती है। मिरजा उसके भाई तथा पिता को बंदी बना लेता है। कुसुमा बड़ी युक्ति से अपने पिता और भाई को छुड़वाती है और प्राण त्याग कर अपने पिता और कुल के आत्मसम्मान को भी बचाती है। इसी प्रकार का एक और पँवाड़ा 'चंद्रावली' अवधी में अत्यन्त प्रसिद्ध है । चंद्रावली की कहानी भी कुसुमा से मिलती-जुलती-सी है। पानी लेने गई चंद्रावली मुगल का शिकार बनती है।

वह चंद्रावली को छिपा लेता है। चंद्रावली चील्ह (चील पक्षी) के माध्यम से अपने पिता और भाई को अपने बंदी होने का समाचार भिजवाती है। भाई और पिता के मिन्नतों के बावजूद मुगल चंद्रावली को नहीं छोड़ता। इस पर चंद्रावली एक युक्ति का सहारा लेते हुए मुगल को भोजन की व्यवस्था करने के लिए कहती है और उसके वहाँ से जाते ही स्वयं पर तेल डालकर अग्निदाह कर आत्महत्या कर लेती है। इस प्रकार यहाँ भी चंद्रावली कुसुमा की ही तरह अपने कुल के आत्मसम्मान हेतु अपने प्राण न्योछावर कर देती है। अवधी लोक गीतों में वर्णित इन कहानियों के पात्र किसी-न-किसी ऐतिहासिक घटनाक्रम को अपने अंदाज़ में बयाँ करते नज़र आते हैं। अवधी लोक गीत जनजीवन में अपनी पैठ गहरे जमाए हुए हैं। चंद्रावली का एक उदाहरण प्रस्तुत है-


चंद्रा धेरै कगरवा, गगरिया भरि ना ।


जैसे नंगी हो कटरिया, लपकाती आवै ना ॥


वैसे चंद्रा की देहिया, लपाकै लागी ना। घोड़वा चढ़े एक आवै हो तुरकवा, झुकत आवै ना ॥


अवध क्षेत्र में अवसरानुकूल विभिन्न व्रत, पूजा-पाठ, लोकविश्वास तथा संस्कार आदि पर आधारित लोक गीत गायन का प्रचलन है। ऋतुगीत, श्रमगीत, मेला, संस्कार, देवी गीत, धार्मिक गीत आदि का भी विभिन्न अवसरों पर गायन किया जाता है। ऋतुगीत में कजली का गायन सावन के आने पर होता है।

अवध प्रदेश में गाँवों में विशेषतया महिलाएँ झूला झूलते समय इस गीत का गान करती हैं। प्रेमाकुलता - प्रधान इन गीतों में संयोग- वियोग के साथ ही व्यथा-कथन भी होता है। इसी दौरान सावन गीत भी गाया जाता है। यद्यपि इसका स्वरूप कजली की ही तरह होता है परन्तु फिर शैलीगत भिन्नता के कारण इन्हें सावन ही कहा जाता है।


ऋतु-गीतों में चौमासा, छहमासा, बारहमासा जैसे गीतों का भी महत्त्व है। इन गीतों की विशेषता यह है कि ये विरहगीत हैं। जायसी कृत पद्मावत इसी श्रेणी में आता है। ये गीत पति के वियोग में ही गाये जाते हैं।

पति वियोगिनी स्त्रियों को पति के वियोग में कुछ भी नहीं सुहाता। प्राकृतिक सौन्दर्य उन्हें पीड़ा प्रदान करता है। ये गीत हिन्दी साहित्य की उन रचनाओं की तरह जान पड़ते हैं जिनमें स्त्री पात्रों का विरह वर्णित किया गया हो।


ऋतु-गीतों में ही होली के अवसर पर गाये जाने वाले फगुआ, फाग, चौताल नाम से लोक-गीतों का प्रचलन है। इसी क्रम में अवध प्रदेश में रेख्ता नामक गीत लोकप्रिय है। राधा-कृष्ण, सीता-राम के होली खेलने की कथा पर आधारित ये रेख्ता शृंगार रस से ओतप्रोत गीत होते हैं। कहीं-कहीं इनमें शिवजी को भी होली खेलते हुए बताया जाता है। इस अवसर पर भाँग का विशेष रूप से सेवन किए जाने के कारण यह प्रसंग मादक हो उठता है।

पति-पत्नी के संयोग वर्णन के साथ ही इनमें उनके वियोग के प्रसंगों का भी वर्णन किया जाता है। साथ ही हास- परिहास, सुख-दुःख, संयोग-वियोग वर्णन के कारण रेख्ता गायन से आनन्द और उल्लासमय वातावरण उपस्थित हो जाता है। विभिन्न पौराणिक प्रसंगों को अभिव्यक्त करने वाले लोक गीत रेख्ता का एक उदाहरण देखिए-


चक्र सुदरसन राम का रखवाली पर ठाढ़। किरपा होय रघुनाथ की सो पढ़ों दसौ औतार । अवतार राम पहिले जब मच्छ को धरै । संखासुर मारि राम कोप हैं करे। रघुबर के सेवकन को दुख कभी ना परे ।


भोजपुरी के समान ही अवधी भाषा में इन ऋतु-गीतों के अतिरिक्त श्रम-गीतों के गायन का भी प्रचलन है।

जिनमें जँतसार, सोहनी अर्थात् निराई के समय के गीत, कोल्हू के गीत आदि उल्लेखनीय हैं। परिश्रम करते समय लोक समुदाय इन श्रम- गीतों को गाकर अपने श्रम-बोझ को हल्का करने का प्रयास करते हैं। जाँत से चक्की पीसते समय पसीने से लथपथ महिलाएँ जँतसार के गान में अपनी वेदनाओं की अभिव्यक्ति करती दिखाई देती हैं। करुण रस प्रधान इन गीतों को गाकर स्त्रियाँ परिश्रम से उपजी थकान और नीरसता से स्वयं को मुक्त अनुभव करती हैं। इसी प्रकार सोहनी के गीत उस समय गाये जाते हैं जब बोवाई के बाद उनमें छोटी-छोटी घास या अनावश्यक झाड़- झरकट उग आते हैं तो ग्रामीण समुदाय खुरपी नामक औजार से अपने खेतों से इन अनावश्यक उगी घास-झरकट को उखाड़ने का काम कर रहे होते हैं। इस प्रक्रिया को निराई कहते हैं।

निराई के समय उत्पन्न थकावट को दूर करने की दृष्टि से गाये जाने वाले सोहनी गीत में वेदनाभिव्यक्ति भी की जाती है। व्यथा की अभिव्यंजना प्रसंग विशेष का सन्दर्भ लेकर एक चरित्र और कथा के माध्यम से की जाती है। उदाहरणार्थ-


ऊँचे कुंअना के नीची जगतिया ।


रामा पनियाँ भरै यक बं भनियाँ रे ना। घोड़े चढ़ा आवा एक राजा का पुतवा हो ना। बाँभनि एक चुन पनियाँ पिअउती हो ना।


ग्रामीण परिवेश में गन्ने का रस कोल्हू के द्वारा निकाला जाता है। इसके अलावा तेल भी कोल्हू के द्वारा ही निकाला जाता है।

इस प्रकिया के समय जो गीत गाया जाता उसे कोल्हू के गीत कहते हैं। जिसे अक्सर कुर्मी और तेली समुदाय के लोग गाते हैं। शृंगार रस से परिपूर्ण इन गीतों में प्रेम के संयोगवियोग पक्षों को अभिव्यक्त किया जाता है।


गाँवों में मेला लगने का खूब प्रचलन होता है। किसी त्योहार, तिथि, पर्व अथवा किसी विशेष आयोजन पर स्थानीय मन्दिर के आस-पास पर मेले का आयोजन होता है। इन मेलों में शिरकत करने आते समय महिलाओं और पुरुषों की पृथक् पृथक् टोलियाँ गीत गाते हुए मेलों में पहुँचती हैं। इन गीतों के विषय मेले के प्रयोजन पर निर्भर करते हैं।


अवधी भाषा में संस्कार गीतों की अधिकता है। धार्मिक संस्कारों और पारम्परिक रीति-रिवाजों से अनुप्राणित इन संस्कार-गीतों में मनुष्य के जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त के गीतों का समावेश मिलता है। सोहर, दोहद, सरिया, छठी, लोचना, बधाई, पसनी, मूइन, जनेउ, सिलपोहनी, देवी गीत, माण्डव के गीत, बियाहे के गीत अर्थात् विवाह गीत, विवाह के ही अवसर पर द्वार-चार, भाँवर, बाती, गारी, परछन, नकटा, गौना और मृत्यु गीत आदि इन्हीं संस्कार-गीतों के अन्तर्गत ही आते हैं। ये गीत बच्चे के जन्म से लेकर जीवनपर्यन्त के संस्कारों पर आधारित होते हैं जो प्रसंगानुकूल समय-समय पर गाये जाते हैं। इन गीतों में दोहद अर्थात् साध के गीत किसी स्त्री की गर्भधारणा के पश्चात् गाये जाते हैं।

अवध प्रदेश में जब गर्भवती स्त्री के मायके वालों को यह शुभ समाचार ज्ञात होता है तो वे पुत्री की ससुराल सिधौरी भेजते हैं। इस अवसर पर सिधौरी के गीत बड़े आनन्द के साथ गाये जाते हैं। साध या दोहद गीतों में गर्भवती स्त्री की विभिन्न मनोदशाओं और इच्छाओं की अभिव्यक्ति भी होती है। यह एक प्रकार का सोहर ही होता है किन्तु अवसर भिन्नता के कारण इसका नाम पृथक् है ।


सोहर की परम्परा से ही सम्बन्धित सरिया नामक लोक गीत बच्चे के जन्मावसर पर गाये जाते हैं। आजकल ये दुर्लभ हो चुके हैं। बच्चे के जन्म के पूर्व गर्भवती स्त्री के पेट में दर्द दाई को जचकी के लिए बुलाना, बच्चे के जन्म के बाद दाई का नेग माँगना आदि गतिविधियों की चर्चा सरिया नामक लोक गीत में मिलती है।

शिशु-जन्म के बाद बधाई नामक गीत गाने की प्रथा है। यह बधाई बच्चे की बुआ लाती है, जिसमें बच्चे के लिए विभिन्न खिलौने और कपड़े आदि लाने का प्रसंग वर्णित किया जाता है। जिसके बदले बुआ अपने भाई की ओर से नेग पाती है। ये गीत छठी अर्थात् अन्नप्राशन के संस्कार के बीच गाये जाते हैं। बच्चे के पैदा होने के छठवें दिन छठी नामक संस्कार आयोजित होता है, जिसमें सगे-सम्बन्धियों और परिवारजनों को भोजन कराया जाता है। कहीं-कहीं इसे छठी की पूजा भी कहते हैं। इस पूजा में विभिन्न देवी-देवताओं और ग्रहों के चित्रों के साथ माँ और बच्चे की सांकेतिक तस्वीर बनाए जाने की प्रथा है। छठी की पूजा के अवसर पर छठी के गीत गाये जाते हैं। एक उदाहरण देखिए-


पहिले तो पूजे दसरथ मोती थारु भराए।


फिर तो पूजै रानी कौसल्या देई मोतिन माँगभराइ ।


फिर तो पूजे बाबा सबै जनै मोतिन थारु भराइ ।। हु बिधि पूजा बनाइ ॥



इस प्रकार विभिन्न पौराणिक प्रसंगों को गाकर ग्रामीण महिलाएँ छठी की पूजा करती हुई जच्चा-बच्चा के कुशल-मंगल की कामना करती हैं। इस संस्कार में घर के बड़े का विशेष महत्त्व होता है।


पसनी के अवसर पर भी सोहर गीत गाया जाता है, जिसमें नवजात बच्चे को अन्नप्राशन कराया जाता है। इसके बाद मुंडन और कर्णवेध, फिर बरुडा यानी जनेउ संस्कार के अवसर पर भी सोहर गीत गाने की प्रथा है। विवाह के अवसर पर गेहूँ की सफाई करते समय देवी गीत का उठान किया जाता हैं।

इसके बाद सील पोहन, माइव, विवाह गीत आदि का गायन विधियों के क्रमानुसार अवसर पर किया जाता है। विवाह के अवसर पर एक विशेष प्रकार के गीत गाना बड़ा शुभ और आवश्यक माना जाता है जिसमें वधू पक्ष की महिलाएँ वर पक्ष को गीतों के माध्यम से गालियाँ सुनाती हैं। इसे किसी प्रकार का अपशब्द न मानकर प्रेम-प्रदर्शन का प्रतीक माना जाता है। इसमें सम्बन्धी और उनके रिश्तेदारों को गाली सुनाने का प्रचलन है। इसके पश्चात् भाँवर और विदाई आदि संस्कारों के अवसर पर सम्बन्धित गीत गाकर लोक-कल्याण और मांगल्य की कामना की जाती है। इन सभी संस्कारों के अतिरिक्त अन्तिम संस्कार कहे जाने वाले अर्थात् मृत्यु के समय भीलोक गीत गाये जाते हैं।

इसे मृत्यु गीत कहा जाता है। यद्यपि इन गीतों में दुःख और विलाप की अभिव्यक्ति होती है फिर भी अपनी आयु पूर्ण कर सिधारने वाले वृद्ध की मृत्यु उसके भाग्य की द्योतक मानी जाती है। इन गीतों में मृतक की आत्मा का आलाप- संलाप होता है। एक उदाहरण देखिए-


बिछुरत प्रान काया अब काहे रोई हो। कहत प्रान सुनो मोरिकाया, मोर तोर संग न होई हो । हम जाबइ अब दुसरे महल मा, तोर कवन गति होइ रे ।


मृत्यु-गीतों में मृतक के परिवारजनों की भिन्न-भिन्न मनोदशाओं का वर्णन करने के साथ ही उनका शोक व्यक्त किया जाता है। इन गीतों के माध्यम से शोकाकुल परिवारजनों का संताप कम करने का प्रयास किया जाता है।

अवध प्रदेश में इन संस्कार गीतों के अलावा अन्य धार्मिक, सामाजिक और विभिन्न अवसरानुकूल लोक गीत गाये जाते हैं।


वर्तमान में अवधी भाषा में कई कवियों ने अपनी कलम चलाई जिनमें दयाशंकर दीक्षित, बलभद्र दीक्षित, रमई काका आदि कवियों का नाम विशेष तौर पर उल्लेखनीय है।


अवधी भाषा में अनेक मुहावरे और लोकोक्तियाँ भी प्रचलित हैं।