हिन्दी की जनपदीय बघेली बोली के लोक-साहित्य का परिचय - Introduction to folk literature of the district Bagheli dialect of Hindi
हिन्दी की जनपदीय बघेली बोली के लोक-साहित्य का परिचय - Introduction to folk literature of the district Bagheli dialect of Hindi
अर्द्धमागधी अपभ्रंश से उत्पन्न बघेली भाषा का निकटतम सम्बन्ध अवधी भाषा परिवार से है। स्वाभावतः यह अवधी भाषा के निकट की ही एक उपबोली है। मध्यप्रदेश के रीवाँ, नागोद, शहडोल, सतना मैहर तथा इसके आसपास के क्षेत्रों में विस्तृत बघेली बोली महाराष्ट्र, उत्तरप्रदेश और नेपाल के कुछ क्षेत्रों में भी बोली जाती है। लोक-साहित्य की दृष्टि से बघेली की विस्तृत परम्परा रही हैं। इनमें लोक गीत, लोक गाथा और लोक- कथाएँ आदि का उल्लेख किया जा सकता है।
1. लोक-कथाएँ :
अन्य उपबोलियों की भाँति बघेली में भी विभिन्न विषयों पर आधारित लोक कथाएँ प्रचलित हैं। भूत- बलैत, राजा-रानी, साधू-सन्त, महात्मा आदि विविध कथानकों पर आधारित लोक-कथाएँ बघेली में मिलती हैं।
बघेली लोक कथाओं में बाप-पूत, काँटा से मारकाट जैसी कथाएँ अधिक प्रचलित हैं। काँटा से मारकाट नामक कथा में पिरथी की पत्नी को नदी से नहाकर लौटते समय नचकौनू तिवारी के घर के आगे काँटा चुभ जाता है। मात्र इसी बात पर पूरे गाँव में बवाल हो जाता है। पिरथी नचकौनू पर भड़क जाती है। किसी तरह लालजी के माध्यम से नचकौनू से माँफी मगवाई जाती है। इस पर भी पिरथी का क्रोध शान्त नहीं होता। इसी क्रोधवश नचकौनू तिवारी की तलवार से हत्या कर दी जाती है। कथानक इसी क्रम में आगे बढ़ता रहता है और आगे चलकर दोनों ही पक्षों में भारी मारकाट मच जाती है और इसका अन्त महाभारत के युद्ध के समान होता है। यह एक सामाजिक प्रसंग को आधार बनाकर कही गई कथा है जिसमें मात्र एक छोटे से काँटे के चुभ जाने से बात राई का पहाड़ बन जाती है।
बाप-पूत नामक लोक कथा एक काल्पनिक कथा है जिसमें एक ब्राह्मण अपने पुत्र के साथ परदेस जाने का प्रयोजन करता है। राह में चलते हुए एक जंगल पड़ता है । वहाँ उन्हें तेज प्यास लगती है और वे दोनों एक तालाब के पास पानी पीने जाते है। वहीं उन्हें एक खाली मकान दिखाई देता है जिसमें जाकर वे देखते हैं कि वहाँ बहुत सारा अनाज, दूध और अन्य खाद्य पदार्थ रखे हुए हैं परन्तु मकान में कोई नहीं है। वहाँ वे लोग दाल-चावल बनाकर खाते हैं। इसी बीच एक दानव वहाँ आ जाता है और बड़े से पात्र में खीर बनाकर खाता है। उसे देख बाप और पूत बहुत डर जाते हैं और वहाँ से भागने की सोचते हैं। किसी बात पर बाप जब अपने बेटे को जोर से डाँटता है तो उस डाँट की आवाज सुनकर दानव डर के मारे वहाँ से भाग जाता है। इस प्रकार कथानक आगे बढ़ता है।
दानव यह बात लोमड़ी, बाघ आदि को बताता है कि वहाँ कोई मुझसे भी बड़ा दानव आ गया है। सभी पशु दानव के मकान पर आकर बाप-पूत को ढूँढते हैं परन्तु वहाँ उन्हें कोई नहीं मिलता। इसी बीच अचानक बाप की तेज आवाज सुनकर बाघ आदि भी वहाँ से भाग खड़े होते हैं। बाप-पूत दोनों बड़े आराम से बहुत सारा धन वहाँ से लेकर पुनः अपने गाँव चले आते हैं। इस प्रकार की मनोरंजनात्मक लोक कथाएँ बघेली क्षेत्र में लोकरंजन का काम करती हैं।
2. कहावतें :
# आँधर के आगे रोवै आपन दीदा खोवै।"
अर्थात् किसी निर्दयी के आगे अपनी व्यथा कहना हमेशा व्यर्थ ही होता है।
"जस मुकुन्द तस पादन घोड़ी, तेसे राम मिलैएन जोड़ी। "
अर्थात् बुरी संगत वाले को बुरा फल और अच्छी संगत वाले को अच्छा परिणाम ही मिलता है।
"सड़ा मूड नौआ के दोख।"
अर्थात् गलती किसी की और दोष किसी और को देना ।
"बाप राज न खाए पान, दाँत निपोरे गए प्राण । "
अर्थात् जो काम आपने कभी नहीं किया हो या जो काम आप नहीं जानते हों। उस काम को नहीं करना चाहिए। उसके करने से नुकसान ही होता है। हिन्दी में इसी से मिलती-जुलती कहावत है-
"जिसका काम उसी को साजै और करे तो डंडा बाजै ।"
"आपन देखि न देय, दूसरे का लात मारे।"
अर्थात् अपने दोषों की ओर न देखकर दूसरों की गलतियों का बखान करना ।
3. मुहावरे :
"आँख निपोरब"
आँख दिखाना या आँख तरेरना
"सऊंज लगाउब"
बराबरी करना
"तरघुरिया कर" चाटुकारिता करना
"मोह चोराउब"
किसी काम से जी चुराना
"सटक जाब"
मौका पाते ही भाग जाना
4. लोक गीत :
अन्य बोलियों की तरह ही बघेली में भी पर्याप्त मात्रा में लोक गीत मिलते हैं। इनका स्वरूप और प्रसंग भी वैसा ही है जैसा कि अन्य बोलियों में मिलता है। इन लोक-गीतों में धार्मिक, सामाजिक संस्कारों के अवसर पर गाये जाने वाले गीतों के अलावा ऋतुगीत, श्रमगीतों की व्यापक परम्परा रही है।
(1) सोहर
जौने दिना राम जनम में है, धरती अनंद भई धरती अनंद भई हैं हो। गउवन लुटि भई गउवन लुटि भई हो, आवा गउवन के नाते एक कपिला । रमइयाँ मुँह दुध पियें रमइया मुँह दुध पिये हो,
(2) मुंडन संस्कार का गीत
झलरिया मोरी उलरू झलरिया मोरी झुलरू, झलारिया शिर झुकई लिलार । अंगन मोरे झाल विरवा, सभवा मां बैठे हैं बाबा कउन सिंह गोदी बइठे नतिया अरज करें लाग।
(3) विवाह गीत
काहे का सेयों हरदी का बिरवा, काहे का मैन मजीठ । काहे का सेयों घेरिया कउन कुँवर, कच्चे दूध पिआय । पिअरी का सेयों हरदी का बिरवा, चुनरी का मैन मजीठ । धरम का सेयों घेरिया कवन कुँवर, कच्चे दूध पिआय । खोरवन दुधवा कटोरवन पानी, आजी ओखी लीन्हें ठाढ़। एक नन्नू दुधवा पिया मोरी नातिन, फेर चौके मा जाव।
(4) सोहाग गीत
चिरईरे सोबई चुनगुन रे सोबई, सोइ गे न गरवा के लोग । राजा के सोहागवा
एक नहीं सोये हैं अजवा कउन सिंह, जेखे घरे नतिनी कुँवारि ।
(5) गीत
सावन के समय कजरी या कजली, कउन रंग मुंगवा कउन रंग मोतिया कउन रंग ननदी के विरना । लाल रंग मूँगा सुपेत रंग मोतिया सँवरे रंग ननदी के बिरना। कान सोहई मुंगवा कानो कान सोहई ननदी के बिरना। गले सोहइ मुंगवा कानेन सोहइ मोतिया,
सेजरिया सोहई ननदी के बिरना । टूटि मुंगावर मोतिया रूठि जइहैं ननदी के बिरना। बिन लेबइ मुंगवा बटोर लेबइ मोतिया, मनाय लेबइ ननदी के बिरना।
(6) बारहमासी
उतरत सावन लागत भादौं आये न विरना तुम्हार हो, कान की तोरी माया बनी है काहेन के तोरे बाप हो । काहेन के तोरे भइया बने हैं आ न सावन मास हो, कठवन की तोरी माया बनी है पथरन के तोरे बाप हो।
(7) प्रणय सम्बन्धी गीत
दादरा गीत
बना सोवई अटारी जगावा सखी, उनके मौरीमाँ लागी है, अनार की कली कचनार की कली, अनार की कली कचनार की कली।
8) बिरहा
आमा कच्छ पानी, बनायो चोंगी। चिरई तोरे कारन, भयो जोगी ॥ लंबी सड़किया के गोला बाजार। लौटा के पानी छलक नहि जाय। पतरइला कै बोली, अलख नहिं जाय। बिरहा घाट मा बिरहा बिटउना। मैं बिरहन पनिहार ॥
बघेली क्षेत्र में अनेक जनजातियाँ निवास करती हैं जिनमें गोंड, भुमिया, मवासी, पनिया आदि लगभग 14-15 उपजातियाँ यहाँ रहती हैं। संस्कृति और परम्परानुरूप इनकी जीवन-पद्धति में ईश्वर का बड़ा स्थान होता है। स्वाभावतः इनकी लोक-परम्परा, जीवन-शैली, यहाँ तक कि भाषा और संस्कृति भी अन्य जातियों से भिन्न जान पड़ती हैं। परिणामतः उपर्युक्त सामाजिक और धार्मिक लोक-गीतों के अलावा बघेली में कुछ जनजातीय लोक गीत भी गाये जाते हैं जिनमें विभिन्न देवताओं की आराधना के साथ ही संस्कार-गीत, त्योहार गीत,
ऋतु-गीत, श्रम-गीत आदि प्रचलित हैं। इनमें विभिन्न जनजातियों में बोली जाने वाली भाषाओं की शब्दावली का विशेष प्रभाव देखा जाता है। प्रायः इन जनजातीय गीतों में कोई-न-कोई कथा कही जाती है। इसकी, छल्ला, करमा आदि लोक गीत काफी लोकप्रिय हैं। करमा जनजातीय गीत का एक उदाहरण देखिए- माँदर,
ऐ हे हे हाय पतरेला जवान, देखे मा लागे सुहावन रे । कउन फूल फूले हिडिया हो,
कउन फूल फूलै मनमाल।
कउन फूल फूलै रस डोमरी, जहाँ छइला करे दरबार ।
5. पहेलियाँ :
अरिया माँ लोलरिया नाचै ।
(जीभ)
उज्जर बिलैया, हरियर पूँछ तूजान महतारी पूत ।
एक सींग के गोली गाय, जेतना खियावौं ओतना खाय ।
(जाँत)
अत्थर पर पत्थर, पत्थर पर जंजाल, मोर कहानी कोई न जाने, जाने भइया लाल ।
( नारियल)
अगर कगर दौरिया, बीच मा बहुरिया ।
(दाल)
बघेली लोक-साहित्यमर्मज्ञों में रामबेटा पाण्डेय, कुन्तीदेवी अग्निहोत्री, जगदीशप्रसाद द्विवेदी, मोहनलाल श्रीवास्तव, रामेश्वरप्रसाद मिश्र, बृजकिशोर निगम आदि के नाम प्रमुख हैं जिन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से बघेली लोक-साहित्य सम्पदा को बढ़ाया है।
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