हिन्दी की जनपदीय गढ़वाली बोली के लोक-साहित्य का परिचय - Introduction to the folk literature of the district Garhwali dialect of Hindi

हिन्दी की जनपदीय गढ़वाली बोली के लोक-साहित्य का परिचय - Introduction to the folk literature of the district Garhwali dialect of Hindi


गढ़वाली लोकसाहित्य के सभी रूपों में पहाड़ी प्रवृत्ति के अनुरूप श्वासों के आरोह-अवरोह का प्रभाव देखा जाता है। गढ़वाली में संस्कारों के लोक गीत मंगल-गीतों की श्रेणी में गिने जाते हैं। इन गीतों में पुत्र की महत्ता बताई जाती है। उसे देवता प्रसूत कहा जाता है। अन्य भाषाओं के समान ही गढ़वाली मंगल गीतों में वर- वधू के प्रतीक सीता राम और शिव-पार्वती हैं। इन गीतों में स्त्रियाँ अपने पुत्र को कृष्ण कहकर सम्बोधित करती हैं। पुत्र का जन्म माता की तपस्या का फल है "तू होला मेरी तपस्या का जायो।" -


एक अन्य लोक गीत इस प्रकार है-


देन्गा होई जाया वे सेळी धरती,


देगा होई जाया में भूमियाळा दयोऊ ।


देन्गा होई जाया में माई मडूली,


देन्णा होई जाया में रितू बसन्ता ॥