हिन्दी की जनपदीय छत्तीसगढ़ी बोली के लोक-साहित्य का परिचय - Introduction to folk literature of the regional Chhattisgarhi dialect of Hindi

हिन्दी की जनपदीय छत्तीसगढ़ी बोली के लोक-साहित्य का परिचय - Introduction to folk literature of the regional Chhattisgarhi dialect of Hindi



छत्तीसगढ़ के इतिहास का अवलोकन करने पर ज्ञात होता है कि इसका सम्बन्ध पौराणिकता और ऐतिहासिकता से है। पौराणिक काल में यहाँ का अधिकांश भाग दण्डकारण्य के नाम से प्रचलित था। कालान्तर में इसके कुछ हिस्से को महाकोसल और कुछ को कोसल के नाम से जाना जाने लगा। छत्तीसगढ़ नाम के सम्बन्ध में कहा जाता है कि किसी समय यहाँ 36 गढ़ थे। इसी का आधार लेते हुए इस प्रदेश को छत्तीसगढ़ कहा गया। छत्तीसगढ़ी बोली का मुख्य क्षेत्र छत्तीसगढ़ राज्य है। भाषाविज्ञान में अर्द्धमागधी अपभ्रंश के दक्षिणी रूप से इसका विकास माना जाता है । इसका सम्बन्ध भी अवधी भाषा परिवार से ही है। इसका क्षेत्र सरगुजा, कोरिया, बिलासपुर, रायगढ़, खैरागढ़,

रायपुर, दुर्ग, राजनांदगाँव, कांकेर आदि है। यहाँ अन्य जातियों के अतिरिक्त लगभग 50 से अधिक आदिवासी जातियाँ निवास करती हैं। विभिन्न जातियों और जनजातियों की संस्कृति के सम्मिश्रण से यहाँ का लोक-साहित्य भी समृद्धि पाता गया। लोक-साहित्य की दृष्टि से यहाँ लोक-कथाएँ, गाथाएँ, लोक गीत, लोकोक्तियाँ, मुहावरे, पहेलियाँ आदि लोकप्रिय हैं।


1. लोक-कथाएँ :


छत्तीसगढ़ी लोक-कथाओं में कहीं तो आदिवासी समुदाय के दैनन्दिन जीवन में व्याप्त लोकविश्वास, क्रिया-कलाप, कल्पनागम्यता, जादू-टोना, भूत-प्रेतादि से सम्बन्धित कथाएँ हैं तो कहीं सामान्य जीवन,

रहस्य, होशियारी, देवी-देवताओं से सम्बन्धित लोक-कथाएँ भी प्रचलित हैं। कुछ कथाएँ पौराणिक प्रसंगों पर भी आधारित होती हैं। छत्तीसगढ़ी लोक कथाओं में बकरी और बाघिन, देही तो कपाल, का करही गोपाल, महुआ का पेड़, बकरी और सियार, सुख की खोज, अकास धरती, चम्पा और बाँस, मूरख कौआ, अनोखा दोस्त आदि लोक कथाएँ प्रचलित हैं। ये लोक कथाएँ आकार में छोटी होती हैं किन्तु इनका सीधा सम्बन्ध प्रकृति के किसी-न- किसी उपादान से होता है। धरती और अकास ऐसी ही कथा है, जिसमें एक सियार यह सोचता है कि इस धरती पर सभी का विवाह होता है परन्तु धरती और अकास का विवाह नहीं होता। अतः वह दोनों का विवाह करवाने का निश्चय करता है।

एक दिन गाजा बाजा की आवाज सुनकर अन्य सियार भी धरती और अकास के विवाह में सम्मिलित होकर मदमस्त हो जाते हैं और नशे में ही सियार और देवता का वार्तालाप चलता है। जिसमें देवता कहते हैं कि धरती और अकास एक नहीं हो सकते। कहते हैं उस दिन से ही सियार रात में चिल्लाने लगा । नितान्त काल्पनिकता के सहारे गढ़ी गई यह लघु कहानी छत्तीसगढ़ की सीधी-सादी संस्कृति को अभिव्यक्त करती है।


2. लोक गाथा :


छत्तीसगढ़ी में अनेक लोक गाथाएँ प्रचलित हैं जिनमें कुछ ऐतिहासिक तो कुछ पौराणिक प्रसंगों पर आधारित हैं । राजा वीरसिंह, श्रवणकुमार,

भरथरी आदि लोक गाथाएँ यहाँ विशेष लोकप्रिय हैं। भरथरी से सम्बन्धित लोक गाथा का उदाहरण देखिए-


कतेक गैना ल गावंव मय, तीन महीना ल ओ, तीने महीना जादूमारे है, जादू काटत हे राम, खड़े-खड़े सामदेई ये, रूपदेई राम, जादूल बइरी इन काटत हैं, जेला देखत हे राम, काटे मैं जादू कट जाए, नैना रानी ये ना, गुस्सा होवय देखतो बाई रामा ये दे जी।


3. लोक गीत :


छत्तीसगढ़ी की यह विशेषता यह है कि यहाँ लोक गीत और लोक नृत्य परस्पर पूरक होते हैं । अर्थात् प्रत्येक लोक नृत्य के साथ एक विशेष लोक गीत का युग्म होता है। माँदर, झाँझ, बाँसुरी, घुंघरू आदि नृत्य-गीतों के विशेष प्रकार हैं। इसके अतिरिक्त नारी गीत,

पुरुष गीत, सुआ गीत, करमा गीत, मंडई गीत, ऋतुगीत, श्रमगीत, संस्कारगीत आदि लोक गीत छत्तीसगढ़ी लोक-साहित्य की शोभा बढ़ाते हैं।


1) करमा गीत


चलो नाचे जाबारे गोलेंदा जोड़ा, करमा तिहार आये है, नाचे जाबो रे। पहली मैं सुमिरौं सरस्वती माई रे, पाछू गौरी गणेश रे गोलेंदा जोड़ा ... ॥ गाँव के देवी देवता के पइया लगारे, गोड़ लागौ गुरुदेव के रे गोलेंदा जोड़ा ॥


(2) सुआ गीत


छत्तीसगढ़ी लोक-गीतों में सुआ गीत नामक लोक गीत बहुत लोकप्रिय है।

सुआ तोते को कहते हैं। सुआ गीत में स्त्रियाँ एक तोते के माध्यम से सन्देश भेजती हैं। आम मान्यता के अनुसार सुआ एक ऐसा पक्षी है जो किसी के द्वारा बोली गई बातें सुनकर, रटकर उन्हें पुनः उसी स्वर में बोलता है। हिन्दी कहावतों में भी तोता रटंत का ज़िक्र मिलता है। जायसी के पद्मावत में भी हीरामन सुआ (तोते) की चर्चा विशेष तौर पर हुई है। स्त्रियाँ प्रायः सुआ को अपने हृदय की बात बताकर यह विश्वास करती हैं कि वह उनके मन की व्यथा प्रियतम तक अवश्य पहुँचा देगा। सुआ गीत को वियोग-गीत माना गया है। सुआ गीत हमेशा एक ही बोल से प्रारम्भ होता है जो इस प्रकार है-


तरी नरी नहा नरी नहीं नरी ना ना रे सुअना, मोर नयना जोगी, लेतेंव पाँव ल पखार ॥

मेरे सुअना तुलसी में दियना बार अग्धन महीना अगम भइये। मेरे सुअना बादर रोवय ओस डार, पूस सलाफा धुकत हवह ॥ मेरे सुअना काला देवय रंग डार, चइत जंवारा के जात जलायेव ॥


मेरे सुअना किट किट करय मोर दाँत, माघ कोइलिया आमा रुख कुहके ॥ मेरे सुअना मारत मदन के मार फागुन फीका जोड़ी बिन लागय।


मेरे सुअना सुरता में धनी के हमार ॥


(3) हल्दीया विवाह गीत


एके तेल चढ़गे कुँवर पिवराय ।


दुए तेल चढ़गे महतारी मुरझाय ॥ तीने तेल चढ़गे फुफु कुम्हलाय । चउथे तेल चढ़गे मामी अंचरा निचुराय ॥


(4) गौरा का गीत


गौरा का त्योहार छत्तीसगढ़ के रावत समुदाय की स्त्रियों द्वारा मनाया जाता है। इस त्योहार में गऊरा गऊरी अर्थात् शिव-पार्वती की पूजा-अर्चना की जाती है। यह लोकोत्सव प्रतिवर्ष दीपावली और लक्ष्मी पूजा के बाद मनाया जाता है। कार्तिक महीने की कृष्ण पक्ष की अमावस्या को मनाए जाने वाले इस उत्सव में दीपावली की रात्रि में परम्परानुसार गौरा-गौरी की विधिवत बरात निकाले जाने का प्रचलन है। आदिवासी समुदाय के लोग तालाब या किसी जलाशय के समीप की मिट्टी से गौरा-गौरी की मूर्तियाँ बनाते हैं। सूर्योदय से पूर्व ही ब्राह्म मुहूर्त में गौरा-गौरी की बरात निकाली जाती है जिसमें लोग सज-धज कर धूमधाम से सम्मिलित होते हैं।

इस दौरान गाँव की महिलाएँ गौरा-गौरी के भक्तिमय गीत गाती हैं जिससे सम्पूर्ण परिवेश भक्ति भाव से परिपूर्ण हो जाता है। गौरा- गौरी विवाहोत्सव पूर्ण होने के उपरान्त कलश यात्रा प्रारम्भ होती है। तदनन्तर तालाब या किसी जलाशय में गौरा- गौरी की मूर्तियाँ विसर्जित की जाती हैं। इस पूजा में सभी जाति और समुदाय के लोग सम्मिलित होते हैं।


इस अंचल में दीपावली पूजा के दिन को शुरुहुत्ति त्योहार कहते हैं। इसका आशय हैं, त्योहार की शुरुआत। इस दिन दिवस अवसान के समय लोग समूह में एकत्रित हो गाँव के बाहर जाते हैं और एक स्थान पर पूजा करते हैं।

उसके बाद उसी स्थान से मिट्टी लेकर गाँव लौट आते हैं। साथ लायी गई मिट्टी को साना जाता जाता है और उससे शिव-पार्वती की मूर्तियाँ बनाई जाती हैं। शिव गऊरा हैं जिनकी सवारी बैल है और पार्वती गऊरी हैं जिनकी सवारी कछुआ है। मूर्तियों को लकड़ी के पिड़हे पर आसीन कर उन्हें अत्यन्त कौशल और उत्साहपूर्वक सजाया जाता है। लकड़ी की एक पिड़हे पर बैल पर आरूढ़ गऊरा और दूसरे पिड़हे पर कछुए पर आरूढ़ गऊरी की प्रतिष्ठा की जाती है। पिड़हे के चारों कोनों में चार स्तम्भ लगाकर उन पर दिया तेल-बाती रखा जाता है।

सम्पूर्ण झाँकी अत्यन्त मनोहारी जान पड़ती है। रात्रि में लक्ष्मी पूजन के उपरान्त गऊरा गऊरी की झाँकी सम्पूर्ण गाँव में निकाली जाती है। झाँकियों में दो कुँवारे लड़के या दो कुँवारी लड़कियों का युग्म गऊरा गऊरी के पिड़हे सर पर रखकर चलते हैं। उनके साथ चल रही स्त्रियाँ गऊरा गऊरी के गीत गाती हैं, नृत्य-गीत दोनों ही आरम्भ हो जाते हैं। गाते-नाचते हुए लोग झाँकियों के साथ-साथ चलते हुए पूरे गाँव की परिक्रमा करते हैं। कुछ पुरुष एवं महिलाएँ नाचते-नाचते अति उत्साहित हो जाते हैं। मान्यता है कि उस समय उन लोगों पर देवी-देवता सवार होते हैं।


गऊरा लोक गीत का गायन केवल महिलाओं द्वारा ही किया जाता है।

पुरुष दमऊ, सींग बाजा, ठोल, गुदुम, मोहरी, मंजीरा, इझुमका, दफड़ा, ट्रासक आदि वाद्ययंत्र बजाते हैं। इसे गंडवा बाजा कहते हैं क्योंकिइन वाद्यों को गांडा जाति के लोग ही बजाते हैं।


इस उत्सव के पहले जो पूजा होती है, वह बैगा जाति के लोग करते हैं। इस पूजा को 'चावल चढ़ाना' कहा जाता है। गीत गाते हुए गऊरा गऊरी को चावल चढ़ाया जाता है। पुरऊराम साहू द्वारा संकलित गीत देखिए -


एक पतरी रयनी भयनी राय रतन ओ दुरगा देवी। तोरे शीतल छाँय, चौकी चंदन पिदुली ॥


महिलायें गीत गा रही हैं और गऊरा गऊरी को चावल चढ़ाया जा रहा है- 



एक पतरी चावल, दो पतरी चावल,


दूपतरी रयनी भयनी, राय रतन ओ दुरगा देवी । तोरे शीतल छाँय, चौकी चंदन पिढुली ॥