हिन्दी की जनपदीय मालवी भाषा बोली के लोक-साहित्य का परिचय - Introduction to the folk literature of the regional Malvi language dialect of Hindi

हिन्दी की जनपदीय मालवी भाषा बोली के लोक-साहित्य का परिचय - Introduction to the folk literature of the regional Malvi language dialect of Hindi


1. लोक नाट्य : माच


'माच' शब्द मंच का अपभ्रंश है। यह मालवा का प्रसिद्धलोक नाट्य है। इसमें मालवा की धार्मिक और शृंगारिक प्रवृत्तियों का समावेश देखने को मिलता है। इसे समन्वय लोक नाट्य भी कहते हैं क्योंकि इसने विभिन्न लोक शैलियों को अपनाया है। ये लोक नाट्य फाल्गुन, चैत और बैसाख में मंचित होते है। माच के प्रदर्शन के 15 दिन पूर्व मंच का खंभा गाड़कर मण्डली का मुखिया शुभ लग्न में पूजा करता है। यह मंच से 15 फीट ऊँचा होता है। इसके तीन ओर दर्शक बैठते हैं। मंच के 12 घाट वाले पाट पर नवयुवक कार्यकर्त्ता तथा टेक पर गायकों का समूह बैठता है। यह लोक नाट्य रात भर चलता है। इसका क्रम है ईश वन्दना, भिश्ती द्वारा पानी छिड़कना, जाजिम बिछाना, देवी द्वारा आशीर्वाद देना, गुरु की जय बोलना।

माच में भैरव की स्तुति अनिवार्य है। इसके प्रवर्तक गुरु गोपाल ने राजस्थानी ख्यालों का मालवी रूपान्तरण किया है। इसी आधार पर माच लोकशैली की रचना हुई है। माच का विदूषक शेरमार ख़ाँ राजस्थान के कठपुतली नाट्य के तीसमार ख़ाँ का अनुकरण है। इसका विदूषक हाजिर जवाब और हास्यकला में निपुण होता है। वह श्रोताओं को हँसाकर उनका मनोरंजन करता है। माच ख्यालकारों में गुरु बालमुकुन्द प्रसिद्ध हैं। इनके द्वारा लिखित लोक नाट्यों में राजा हरिश्चन्द्र, नागजी, ढोला- मारुणी, गेंदा परी, राजा भरथरी, सुधबुध सालंगा, हीर-रांझा, देवर भौजाई, चारण-बनजारा लोकप्रिय रचनाएँ हैं। लोक नाट्य खेलने वालों में कालू तथा भेरू ने प्रसिद्धि पाई है। ख्यालों के बाद माच का प्रचलन प्रारम्भ हुआ। यह लोकशैली में माच ख्याल की रचना है। माच के साथ ही अन्य भाषाओं की तरह यहाँ नौटंकी भी प्रसिद्ध है।


2. लोक गीत :


भेरू (भैरव) के गीत


भेरूजी गोतन बाजूटिया रा सावला, उनी सुतारण ले लाव ललकार । हातारी झालो देती आवे रे गुड़ री गूजरी, भेरूजी जो तम कलस्या रा सावला ॥ उनी कुमारण से लाव ललकार ।


हरियाणवी


1. लोक नाट्य स्वांग


स्वाँग का अर्थ है, 'नकल करना'। यह नाच-तमाशा अथवा नौटंकी का पूर्व रूप है।

स्वाँग धारण कर किसी का चरित्रांकन करना ही स्वाँग करना है। यह हरियाणा और राजस्थान का नकलपरक नाट्य रूप है। स्वाँग हरियाणा की सामाजिक धरोहर है। अन्य लोक-नाट्यों के भावों की तरह ही इसके भी भाव और रंग होते हैं। स्वाँग के माध्यम से पौराणिक, ऐतिहासिक तथा सामाजिक कुरीतियों पर व्यंग्य किया जाता है। बिदेसिया के सामाजिक नाटक के समान यह कथा गीत सवाल-जवाब के रूप में होता है। इसका प्रारम्भ 'आगे सुणों हवाल' कहकर होता है। ऐसा बोलकर दर्शकों की जिज्ञासा बढ़ाई जाती है। पूर्वार्द्ध में कथा शिथिल रहती है किन्तु उत्तरार्द्ध तक आते- आते घटनाएँ तीव्र गति से आगे बढ़ती हैं।


2. लोक गीत :


कात कन्हाण के गीत


सत की साथण पाणी नै चाली, या तुलसाँ गैल होली हो राम । भरण गई जल जमना की झारी हो राम, सत की साथण न्यू उठ बोली या तुलसा ओड कुँवारी हो राम । भरण गई जल जमना की झारी हो राम, लोटा भी पटक्या, झारी भी पटकी या रोंदड़ी घर आयी हो राम ।