गुप्त का जीवन परिचय और काव्य-परिचय - Introduction to life and poetry of Gupta

 गुप्त का जीवन परिचय और काव्य-परिचय - Introduction to life and poetry of Gupta


मैथिलीशरण गुप्त ने महावीरप्रसाद की प्रेरणा से खड़ीबोली को अपनी रचनाओं का माध्यम बनाया और खड़ीबोली को काव्यभाषा के रूप में पहचान दिलाने की दिशा में सार्थक योगदान दिया । आधुनिककाल की कविता में जो भी आन्दोलन चले, जो भी नवीन काव्यधाराएँ विकसित हुई, उन सभी में गुप्तजी को पूर्ण सफलता मिली। साठ वर्ष के सुदीर्घ रचनाकाल में उन्होंने जीवन के प्रायः सभी विषयों, काव्य की सभी शैलियों, सभी काव्य-रसों और सभी प्रकार के पात्रों को अपनी कविता का आधार बनाया। उनके जीवन और काव्य का संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है-


जीवन-परिचय


गुप्तजी का जन्म 3 अगस्त 1886 को चिरगाँव, जिला झाँसी, उत्तरप्रदेश में एक वैश्य परिवार में हुआ। उनके पिता का नाम रामचरण गुप्त और माता का नाम काशीबाई था । रामचरण गुप्त स्वयं कविता प्रेमी थे और 'कनक लता' उपनाम से काव्य-रचना करते थे। वे एक निष्ठावान् रामभक्त थे और राम की विष्णुत्व में अटल आस्था रखते थे । इस प्रकार कवि प्रतिभा और रामभक्ति गुप्त को पैतृक देन के रूप में प्राप्त हुए। गुप्तजी की प्रारम्भिक शिक्षा झाँसी के राजकीय विद्यालय में हुई, बाद में उन्हें मैकडोनाल्ड हाई स्कूल में पढ़ने के लिए भेजा गया। किन्तु वहाँ मन नहीं लगने पर घर पर ही शिक्षा का प्रबन्ध किया गया। उन्होंने संस्कृत,

हिन्दी और बांग्ला साहित्य का अध्ययन करने के साथ ही इतिहास, पुराण और संस्कृत के काव्य और नाटक का भी अध्ययन किया। अपने पिता से प्रेरणा प्राप्त कर गुप्त ने अल्पायु में ही कविता लिखना प्रारम्भ कर दिया।


गुप्तजी का पारिवारिक जीवन अधिक सुखी नहीं रहा। क्रमशः उनकी दो पत्नियों की असमय मृत्यु हो गई, तीसरी पत्नी सरयू देवी थीं। उनके एकमात्र पुत्र ऊर्मिलाशरण गुप्त थे और प्रसिद्ध कवि सियारामशरण गुप्त उनके छोटे भाई थे। उन्होंने अधिकतर जीवन एकान्त काव्य-साधना में रहकर बिताया ।

स्वभाव से संकोची होने के कारण वे सार्वजनिक समारोह आदि से दूर रहते थे। प्रारम्भ में उनकी रचनाएँ वैश्य समाज की पत्रिका में छपती थीं। बाद में द्विवेदीजी ने उनकी प्रतिभा को समझकर और उनकी रचनाओं में आवश्यक संशोधन कर उन्हें सरस्वती पत्रिका में छापना प्रारम्भ कर दिया। महात्मा गाँधी के असहयोग और राष्ट्रीय आन्दोलन से प्रभावित होकर उन्होंने देश-भक्ति और राष्ट्रीय महत्त्व की कविताएँ लिखना प्रारम्भ किया। उनके द्वारा रचित देश-भक्ति की कविताएँ 'भारत-भारती' नाम से प्रकाशित हुई, जिसके पश्चात् राष्ट्र ने उन्हें अनौपचारिक तौर पर राष्ट्रकवि के नाम से सम्बोधित करना प्रारम्भ कर दिया। कविवर की स्वर्ण जयन्ती के अवसर पर महात्मा गाँधी ने उन्हें राष्ट्रकवि की उपाधि से सम्मानित किया। 12 दिसम्बर 1964 को गुप्तजी का देहावसान हुआ।


काव्य परिचय


मैथिलीशरण गुप्त की पहली खड़ीबोली की कविता 'हेमन्त' नाम से सन् 1907 में सरस्वती में प्रकाशित


हुई। उनका प्रथम खण्डकाव्य 'रंग में भंग' सन् 1909 में प्रकाशित हुआ। सन् 1910 में 'जयद्रथ वध' और 1914 में ‘भारत-भारती' का प्रकाशन हुआ। उन्होंने सतत रूप से काव्य-लेखन का कार्य करते हुए अनेक रचनाएँ लिखीं साथ ही उर्दू संस्कृत और बांग्ला के ग्रन्थों का हिन्दी में अनुवाद भी किया। उनके द्वारा रचित अन्य प्रमुख रचनाओं के नाम इस प्रकार हैं- किसान, वैतालिका, शकुन्तला, पंचवटी, अनघ, स्वदेश संगीत, हिन्दू त्रिपथगा, गुरुकुल, विकटभट, झंकार, साकेत, यशोधरा, मंगलघट द्वापर, सिद्धराज नहुष,

कुणालगीत, विश्ववेदना, काबा और कर्बला, अजित, प्रदक्षिणा, अंजलि और अर्घ्य, पृथिवीपुत्र, जयभारत, दिवोदास, राजा और प्रजा, विष्णुप्रिया, जयिनी, रत्नावली, लीला, उच्छवास, पद्यप्रबन्धक, पत्रावली प्रमुख अनुवाद ग्रन्थ इस प्रकार हैं विरहिणी, वज्रांगना, मेघनाथ वध, प्लासी का युद्ध, रूबाइयात उमर खय्याम, स्वप्नवासवदत्ता, दूत घटोत्कच, गीतामृत, वृत्र संहार, वीरांगना ।


मैथिलीशरण गुप्त का सम्पूर्ण काव्य उस युग की राष्ट्रीय और सांस्कृतिक चेतना के विकास के प्रत्येक चरण से प्रभाव ग्रहण करता गया और हिन्दी नवजागरण को अपना योगदान देता रहा।

उनके साहित्यिक योगदान के लिए उन्हें अनेक सम्मान प्रदान किये गए। 'साकेत' महाकाव्य के लिए सन् 1936 में हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग में उन्हें मंगलाप्रसाद पारितोषिक और साहित्य वाचस्पति की उपाधि प्रदान की गई। आगरा विश्वविद्यालय ने उन्हें मानद् डी.लिट्. की उपाधि प्रदान की। भारत सरकार ने उन्हें 'पद्मभूषण' से अलंकृत किया। सन् 1960 में उन्हें एक बृहत् अभिनन्दन ग्रन्थ भेंट किया गया। राष्ट्रपति ने उनकी साहित्यिक सेवाओं को सम्मान प्रदान करने के लिए दो बार राज्यसभा का सदस्य मनोनीत किया।


गुप्त का काव्य-शिल्प


काव्य-कृति के निर्माण में जिन उपादानों द्वारा काव्य का ढाँचा तैयार किया जाता है वे सब काव्य के शिल्प-तत्त्व कहलाते हैं। इन उपादानों का प्रयोग कवि अपनी अमूर्त भावनाओं के मूर्त - विधान तथा अभिव्यंजना के सौन्दर्य और शक्ति संवर्द्धन के लिए करता है।

गुप्तजी का समग्र काव्य काव्य-शिल्प के मानदण्डों की दृष्टि से उत्तम और सर्वग्राही है। भाषा, शब्द चयन, शब्द-शक्ति, लोकोक्तियाँ, मुहावरे, वाक्य विन्यास, छन्द-विधान, अलंकार योजना, प्रतीक योजना आदि मानदण्डों की कसौटी पर उनका काव्य पठनीय और आस्वाद्य है। उनकी शिल्पगत विशेषताओं का संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है-


अलंकार- विधान


सौन्दर्यप्रियता मनुष्य का स्वाभाविक स्वभाव है। काव्य में अलंकारों का उपयोग सौन्दर्य-वृद्धि के लिए किया जाता है। अलंकार जहाँ एक ओर भावों को सजाने और रमणीयता प्रदान करने में योगदान देते हैं,

वहीं दूसरी ओर भावाभिव्यक्ति को प्रांजल बनाकर प्रभावशाली भी बनाते हैं। मैथिलीशरण गुप्त के काव्य में हमें अलंकारों का सहज स्वाभाविक प्रयोग मिलता है। उन्होंने मात्र अर्थ चमत्कार के लिए ही अलंकारों का प्रयोग नहीं किया वरन् वर्णन में स्वाभाविकता और प्रभावोत्पादकता लाने के लिए भी अलंकारों का सुन्दर प्रयोग किया है। उनके काव्य में उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, सन्देह, भ्रान्तिमान, अतिशयोक्ति, अनुप्रास, यमक आदि अलंकारों का सार्थक प्रयोग किया गया है। छायावाद के प्रभावस्वरूप उन्होंने मानवीकरण अलंकार का भी प्रयोग किया है। इसके साथ ही कहीं-कहीं व्यतिरेक, विभावना, विरोधाभास और दीपक जैसे अलंकारों का भी प्रयोग मिलता है। कुछ उदाहरण द्रष्टव्य हैं-


उपमा-


मन-सा मानिक मुझे मिला है तुझमें उपलखनी


रूपक -


जितने कष्ट कण्टकों में है, जिनका जीवन सुमन खिला, गौरव गन्ध उन्हें उतना ही अत्र, तत्र, सर्वत्र मिला ।


अनुप्रास -


चारु चन्द्र की चंचल किरणें, खेल रही हैं जल-थल में


व्यतिरेक-


वह मुख देख, पाण्डु-सा पड़कर, गया चन्द्र पश्चिम की ओर।


मानवीकरण-


सखी नील नभस्सर में उतरा, यह हंस अहा तरत-तरता ।


छन्द-योजना


छन्द काव्य-शिल्प के प्रमुख उपकरणों में से एक है, कविता और छन्द का अन्तरंग सम्बन्ध है। छन्द रागात्मक अनुभूति का सहज और उपयुक्त वाहक है। साहित्यकार की सौन्दर्य अनुभूति यदि सही ढंग से ना हो तो उसका सौन्दर्य नष्ट हो जाता है, जबकि वह छन्द में बँधकर लय से प्रभावित होकर प्रकट होती है तो उसका मूल्य बढ़ जाता है। मैथिलीशरण गुप्त एक कुशल काव्य-शिल्पी हैं। उन्होंने अपने काव्य के भाव वैविध्य और व्यापकता को प्रभावी बनाने के लिए मुक्त छन्दों और परम्परागत छन्दों दोनों का प्रयोग किया है।

उनकी 'जयद्रथ वध' हरिगीतिका छन्द की श्रेष्ठ कृति है तो 'साकेत' में परम्परा के विरूद्ध मुक्त छन्दों का प्रयोग भी किया गया है। गुप्त ने भावों को ओजपूर्ण बनाने के लिए हरिगीतिका और प्रकृति-चित्रण के लिए शिखरिणी या अन्य छोटे छन्दों का प्रयोग किया है।


'साकेत' के नवम सर्ग की छन्द-योजना को स्तुत्य प्रयास बताते हुए डॉ० नगेन्द्र लिखते हैं कि- "गुप्तजी के साकेत में नवम सर्ग की बदली छन्द योजना ऊर्मिला की विरह वेदना को करवटें बदल-बदल कर व्यक्त कर देने वाली प्रतीत होती है।"

इसका अभिप्राय यह है कि छन्दों की विविधता ऊर्मिला की उत्पीड़ा को क्षण-क्षण में नये आयाम प्रदान करती है। अतः कहा जा सकता है कि छन्द- गुप्तजी उस में सफल रहे हैं। द-विधान की दृष्टि से नवम प्रतीक योजना


साहित्य में प्रतीकों का बड़ा महत्त्व है। प्रतीकों से अर्थबोध का महान् कार्य लिया जाता है। प्रतीक एक प्रकार से रूढ़ उपमान का दूसरा नाम है। जब उपमान स्वतन्त्र न रहकर पदार्थ विशेष के लिए रूढ़ हो जाता है तो वह प्रतीक बन जाता है। इस प्रकार प्रत्येक प्रतीक अपने मूल रूप में उपमान होता है। प्रतीक देश-काल के अभिव्यंजक होते हैं, मैथिलीशरण गुप्त का प्रतीक विधान भी अपने युगबोध का द्योतक है।

उन्होंने छायावादी प्रतीकों के साथ ही उर्दू-फारसी, बांग्ला प्रतीकों को भी अपने काव्य में स्थान दिया है। प्रतीकों के प्रयोग ने उनकी भावाभिव्यक्ति को और अधिक प्रभावी बना दिया है। 'साकेत' का एक उदाहरण द्रष्टव्य है.


ऊषा-सी आयी थी जग में, संध्या सी क्या जाऊँ


भ्रान्त पवन से वे आवें, मैं सुरभि समान समाऊँ ।


बिम्ब-विधान


बिम्ब-विधान आधुनिक काव्य की प्रमुख विशेषता है । बिम्ब काव्य में संक्षिप्तता, रंजकता और भाव सरसता की सृष्टि करता है।

यद्यपि द्विवेदीयुगीन काव्य-शिल्प में बिम्ब-विधान को विशेष महत्त्व नहीं मिला, किन्तु छायावादी काव्य में इनका आवश्यक रूप से प्रयोग किया गया। गुप्तजी पर छायावादी काव्य-विधान का प्रभाव था अतः उनके काव्य में हमें विविध बिम्बों के सुन्दर प्रयोग देखने को मिलते हैं। साकेत नगरी के निःस्तब्ध वातावरण का प्रस्तुत चित्र दृश्य बिम्ब का सुन्दर उदाहरण हैं-


नगरी थी निःस्तब्ध पड़ी क्षणदा-छाया में, भुला रहे थे स्वप्न हमें अपनी माया में।


पुरी-पार्थ में पड़ी हुई श्री सरयू ऐसी, स्वयं उसी के तीर हंसमाला थी जैसी ।


शैली


मैथिलीशरण गुप्त ने महाकाव्य, खण्डकाव्य, प्रगीतकाव्य और मुक्तक कविताओं की भी रचना की है। महाकाव्य के रूप में उनके द्वारा रचित साकेत और द्वापर उल्लेखनीय हैं। खण्डकाव्य में जयद्रथ वध, नहुष और पंचवटी उनकी लोकप्रिय रचनाएँ हैं। यद्यपि शैली विधान में गुप्तजी ने संस्कृत साहित्य का अनुकरण किया है तथापि नयी तकनीक और स्वरूपों को भी उन्होंने पर्याप्त महत्त्व दिया है। उदाहरण के लिए 'साकेत' में परम्परागत महाकाव्य के लक्षण मिलते हैं किन्तु फिर भी उसमें छन्द विधान का नियम नहीं अपनाया गया है। अतः कहा जा सकता है कि गुप्त का समग्र काव्य-शैली की दृष्टि से श्रेष्ठ है।


गुप्तजी ने महावीरप्रसाद द्विवेदी की प्रेरणा से काव्य-सृजन के लिए खड़ीबोली हिन्दी का प्रयोग किया। उन्होंने अपनी विविध रचनाओं में खड़ीबोली का प्रयोग कर उसे काव्य के लिए कोमल और काव्योचित गरिमा से सम्पन्न कर दिया। उनकी रचनाओं में खड़ीबोली के प्रकृत और सहज रूप के दर्शन होते हैं। वे संस्कृतनिष्ठ सामासिक शब्दावली के स्थान पर सरल शब्दों का प्रयोग करते थे। उनके द्वारा प्रयुक्त खड़ीबोली वर्तमान मानक खड़ीबोली का आधार है। गुप्तजी की भाषा में तत्सम शब्दों का बाहुल्य है। उनकी भाषा की शक्ति उसकी सामासिकता, लाक्षणिकता, मुहावरों और लोकोक्तियों में प्रकट होती है। गुप्त की काव्यभाषा में प्रसाद, ओज और माधुर्य तीनों गुणों का अवसरानुकूल प्रयोग किया गया है। उनकी भाषा की एक अन्य विशेषता उसकी लाक्षणिकता है। इसके साथ ही उनकी भाषा में लयात्मकता और कर्णप्रियता विशेष रूप से देखी जा सकती है।