भारत के प्रसिद्ध लोक-नाट्यों का परिचयात्मक अध्ययन - Introductory Study of Famous Folk-Dramas of India

भारत के प्रसिद्ध लोक-नाट्यों का परिचयात्मक अध्ययन - Introductory Study of Famous Folk-Dramas of India


भारत के प्रमुख लोक नाट्य इस प्रकार हैं-


01. बहुरूप या नकल


बहुरूप से तात्पर्य भाँति-भाँति के वेश धारण करते हुए किसी व्यक्ति विशेष की अभिनयपूर्ण नकल उतारने से है। यह स्वाँग श्रेणी का लोक नाट्य है। बहुरूपिया का अभिनय उसके द्वारा धरे गये रूप पर निर्भर करता है। ये बहुरूपिये अपनी इसी कला के द्वारा जीविकोपार्जन करते हैं।


इसमें समाज के विभिन्न वर्गों के लोगों की नकल करते हुए उनके चरित्र को अभिनय के द्वारा प्रस्तुत किया जाता है। इसमें हास्य व्यंग्य-विनोद का सुन्दर नियोजन रहता है।


02. नसीरा


यह ब्रजप्रदेश का प्रसिद्ध लोक नाट्य है। यह लोक नाट्य अत्यन्त अकृत्रिमता के साथ खेला जाता है। जिसमें सामान्य से चबूतरे को मंच का रूप देते हुए उस पर बहुत ही साधारण वेशभूषा में बिना किसी तैयारी के गेय पद्यबद्ध संवादों की शैली में इसे मंचित किया जाता है। इसमें पात्र एक हाथ कान पर रखकर दूसरे हाथ को आगे बढ़ाते हुए उच्च स्वर में ओज के साथ गायन का कार्य करता है। ये लोक नाट्य किसी भी लोक प्रसिद्ध कथानक पर आधारित रहते हैं। नाट्य के बीच-बीच में हास्य-व्यंग्यार्थ किसी छोटे-मोटे किस्से को स्थान दिया जाता है। मंच पर सामान्य सी प्रकाश व्यवस्था लालटेन या मशाल द्वारा की जाती है। इसमें कलाकार अक्सर निम्न वर्ग के होते हैं। आजकल इस लोक नाट्य का प्रचलन नहीं है।


03. भगत


यह ब्रजप्रदेश के आगरा व हाथरस का प्रसिद्ध लोक नाट्य है। भक्ति भावना से युक्त लोगों द्वारा यह खेला जाता है सम्भवतः इसीलिए इसको 'भगत' संज्ञा मिली है। इस लोक नाट्य में व्यंग्य-विनोदात्मकता पाई जाती है। इसके लिए 8 फीट की ऊँचाई पर मंच तैयार करते हुए उसे सुसज्जित किया जाता है लोक-नाट्यों की आरम्भ शैली और अन्त की शैली दोनों को इसमें निभाया जाता है। इसे स्वांग प्रधान लोक-नाट्यों की श्रेणी में रखा गया है।


04. रामलीला


'राम' चरित्र के इर्द-गिर्द रचे गए महाकाव्यों, पौराणिक कथाओं, लीला नाटकों भजन-स्तुतियों के द्वारा एक बृहत् राम वाक्य का सृजन हुआ जिसका प्रभाव आज भी भारतीय समाज व इसके मूल्यों पर देखा जा सकता है।

\इसमें 'राम' के जीवन व लीलाओं को अत्यन्त श्रद्धा के साथ अभिनय में ढाला जाता है। वे सभी लीलाएँ गोस्वामी तुलसीदास के रामचरितमानस को आधार मानकर प्रदर्शित की जाती हैं। रामलीला की अनेक मण्डलियाँ हैं जो भारत के सभी प्रदेशों व सभी भाषाओं में 'रामलीला' का प्रदर्शन करती हैं। दशहरे से पहले गाँव-गाँव, शहर-शहर में ये भ्रमणकारी रामलीला मण्डलियाँ पहुँचती हैं व प्रतिदिन अपना प्रदर्शन करते हुए दशहरे को रावण- वध के साथ ही इसका समापन करती हैं। इसमें महिला पात्रों के किरदार भी पुरुष कलाकार ही निभाते हैं। मंच के पार्श्वभाग में कथानुसार पर्दे लगाए जाते हैं। मनोरंजनार्थ विदूषक की भूमिका भी सृजित की जाती है। रामनगर व बनारस की रामलीला विश्वभर में प्रसिद्ध है। ये रामलीलाएँ भारतीय संस्कृति व जीवन मूल्यों को सहेजने का उत्कृष्ट कार्य करती हैं।


05. रासलीला


कृष्ण के साथ गोपियों के नृत्य का वर्णन विष्णु पर्व के बीसवें अध्याय में मिलता है। पुराण, ऋग्वेद के ऋचा गायन के साथ गोलाकार नृत्य के रूप में रास का वर्णन करता है। विष्णु पुराण में 'रास' का विस्तृत उल्लेख है तो श्रीमद्भागवत में भी रास का वर्णन है। यहीं से प्रेरणा पाकर 16वीं शताब्दी में मथुरा के अष्टछाप के कवियों ने गोपी गीतों व रास विषयक पदों की रचना की। वैष्णव पंथ के विकास के साथ-साथ 'रास' की गीत-संगीत व नृत्य प्रस्तुति रासलीला के रूप में लोकप्रिय हुई। 'कृष्ण लीला रहस्य' रचना में इन्द्र ब्रह्मचारी ने अष्टछाप के कवियों की रचनाओं के अतिरिक्त नन्ददास, कुम्भनदास, हरिदास आदि की रचनाओं को जोड़कर माखन चोरी, बाल कृष्ण के सखाओं के साथ खेल, गोपियों की मटकी फोड़ना व कालिया मर्दन जैसे प्रसंगों को जोड़कर संगीतमय नृत्य नाटिका का सृजन किया। रासलीला लोक परम्परा के रूप में विकसित लोक नाट्य है।


06. कीर्तनियाँ


इस लोक नाट्य का प्रधान विषय 'कृष्ण' या 'शिवशंकर से सम्बन्धित होता है। कीर्तन का अर्थ उस गायन से है जो प्रभु स्मरण के रूप में किया जाता है। धार्मिक भावना इस लोक नाट्य की प्रमुख विशेषता होती है। इस लोक नाट्य के अभिनीत किए जाने से पूर्व ही पात्रों का परिचय कराने की परम्परा रही है। इस लोक नाट्य को दरभंगा के महेश ठाकुर ने पर्याप्त प्रश्रय दिया व इसका प्रचार-प्रसार भी करवाया। यह मिथिला जनपद का नृत्य प्रधान लोक नाट्य है।


07. यक्षगान


उत्तर कर्नाटक के आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु व महाराष्ट्र से घिरे क्षेत्र में संस्कृत रंगमंच से यक्षगान नाट्य शैली ने विकास पाया तथा 18वीं शताब्दी में यह शैली लोकप्रिय हुई।

यह रागाधारित नाट्य है जिसमें लगभग 150 रागों को समाहित किया गया है। इस लोक नाट्य में रूप सज्जा, वेशभूषा व पगड़ियों के विभिन्न प्रकार आदि अभिनेताओं को अलौकिकता प्रदान कर देते हैं। यक्षगान को शुद्ध लोक नाट्य माना गया है क्योंकि यह न तो सिखाया जा सकता है व न हीं सीखा जा सकता है। इसमें अभिनेता स्वप्रेरणा से अभिनय करता है। अतीत और वर्तमान दोनों को एक साथ सम्प्रेषित करने की विशेषता इस लोक नाट्य में पाई जाती है।


08. भवाई


भवाई एक हास्य-प्रधान लोक नाट्य है। यह गुजरात प्रदेश में बहुत प्रसिद्ध है जिसे गुजरात की 'तरागाणा' जाति के लोगों द्वारा खेला जाता है। इसका अन्य नाम 'वेश' भी है।

यह नृत्य प्रधान लोक नाट्य है। 'कांचलिया पात्र इसमें भाँति-भाँति के वेश धारण करते हैं। विदूषक को 'रंगलो' कहा जाता है। माता व गणेश की पूजा-वन्दना के उपरान्त नाट्य का प्रारम्भ खुले मंच पर होता है।


09. विदेसिया


नृत्य-संगीत- समन्वित इस लोक नाट्य का नामकरण एक लोक कथा के आधार पर किया गया है जिसमें नायक के प्रवास (विदेश) पर चले जाने के उपरान्त नायिका की दयनीय स्थिति का चित्रण किया गया है। नाट्य का आरम्भ 'भवानी मैया' की प्रार्थना से किया जाता है। बिहार जनपद के इस लोक नाट्य ने अपने नाट्य तत्त्वों व संगीत तत्त्वों के कारण समस्त भारत में अपनी प्रसिद्धि फैलाई है।

भिखारी ठाकुर ने इस नाट्य के द्वारा कोटि-कोटि लोगों का मनोरंजन करते हुए इसकी कीर्ति स्थापित करने में अपना पूरा योगदान दिया है।


10. माच


मा का वास्तविक अर्थ 'मंचन' या मंच है। यह मध्यप्रदेश का लोक नाट्य है जो राजस्थानी लोक नाट्य ख्याल से बहुत साम्य रखता है। माच के नाटककारों मुकुन्द गुरु कालूराम उस्ताद, राधा-कृष्ण शुक व गो - गोपाल जी ने पौराणिक कथाओं के आधार पर माच के आलेख तैयार किये और अपने अखाड़ों के कलाकारों द्वारा इन्हें मंचित करवाए। इन आलेखों में कहीं-कहीं सामाजिक व समसामयिक व्यंग्य को भी स्थान दिया गया है। 'खंभ थापना' इसके मंचन की पूर्व सूचना समझा जाता है।

नाट्य का प्रारम्भ भिश्ती के द्वारा मंच पर छिड़काव करने व उसी के साथ फराशा व चौबदार के प्रवेश करने से होता है तदुपरान्त सभी पात्र अपना-अपना परिचय देते हैं। संगत वाद्यों में ढोलक इनका प्रमुख अंग होती है। राजा हरिश्चन्द्र का माच सर्वाधिक लोकप्रिय है।


11. भाँड


वह वर्ग विशेष जो नाना प्रकार की नकलबाजियों द्वारा लोगों का मनोरंजन करता है व बदले में वह कुछ प्राप्त करता है, जिससे उसका उदर पोषण होता है, भाँड कहलाता है। ये नकल का कार्य इतनी सथुराई से करते हैं। कि असली-नकली का भेद करना मुश्किल हो जाता है।

बड़े-बड़े लोग धोखा खा जाते हैं और यही इनकी नाट्य कला की कसौटी भी समझी जाती है। राजस्थान के उदयपुर क्षेत्र के भाँड सर्वाधिक प्रसिद्ध हैं।


12. तमाशा


राम जोशी ( 18वीं- 19वीं शताब्दी) तमाशा लोक नाट्य शैली के जनक माने जाते हैं। इनमें लावणी गायक का प्रयोग प्रमुख है। इससे इनमें प्रश्न-उत्तर शैली का संवाद विकसित होता है। इसका कथानक धार्मिक नहीं होते हुए प्रायः सामान्य होता है। इसके मंचन के लिए तीन तरफ से खुले मंच का निर्माण किया जाता है। किसी भी चौक-चौराहे पर तमाशा प्रदर्शन सम्भव है। विभिन्न साजों की धुनों पर संगीत की लहरियों से आनन्द उठाया जाता है। ग्वालन मंच पर सूत्रधार से संवाद करती है। तत्पश्चात् गोपी नृत्य का आयोजन होता है।

महार-कोल्हारी जाति की सुघड़ नर्तकियाँ ही तमाशा में नृत्य करती हैं। वेषभूषा व रूप सज्जा सामान्य होती है। साड़ी का पल्लू दोनों हाथों से सिर से ऊपर उठाते हुए गोलाकार नृत्य होता है। बीच-बीच में संवाद भी चलते रहते हैं। संगीत विधान ही इस नाट्य का प्रमुख आकर्षण कहा जा सकता है।


13. स्वाँग


स्वाँग का शाब्दिक अर्थ है 'ढोंग रचना' अथवा 'नाटक करना'। यह हरियाणा प्रदेश का प्रसिद्ध लोक - नाट्य है। इसमें पद्य प्रधानता होती है। इसका कथानक पौराणिक, धार्मिक, ऐतिहासिक व सामाजिक विषयों पर आधारित होता है। पद्यमय संवादों के माध्यम से ये कथानक अभिव्यक्ति पाते हैं।


14. नौटंकी


संगीतकारों के प्रवेश के साथ नौटंकी नाट्य का आरम्भ होता है। सभी वादक अपने साजों (वाद्य यंत्रों) के साथ अपना स्थान ग्रहण करते हैं। उर्दू शेर व गज़लों को इसके गेय संवादों में प्रमुख स्थान प्राप्त होता है जबकि ध में खड़ी बोली का प्रयोग किया जाता है। इस शैली का उद्भव 16वीं से 18वीं शताब्दी के मध्य हुआ माना जाता हैं। हाथरस व कानपुर की नौटंकी शैलियाँ अपना विशेष स्थान रखती हैं। नौटंकी में नृत्य का स्थान बहुत सीमित होता है। संगीत व वाद्यों की संगत दर्शकों को बाँधे रखता है। अनेकक्षः प्रदर्शित की जाने वाली नौटंकियों में 'अमरसिंह राठौड़ नौटंकी सर्वाधिक लोकप्रिय है। अन्य प्रसिद्ध प्रेमगाथाधारित नौटंकियाँ जैसे सियाह पोष - और लैला मंजनू, भूपसिंह, शहजादी नौटंकी, सुल्ताना डाकू, रेशमी रूमाल, त्रिया चरित्र आदि हैं।


15. जात्रा


यात्रा का बांग्ला उच्चारण जात्रा हो गया। 16 वीं- 17वीं शताब्दी में इस लोक नाट्य का विकास हुआ। समसामायिक मुद्दों को कथानक का आधार बनाना इसकी प्रमुख विशेषता कही जा सकती है। प्रारम्भ में धार्मिक चरित्र, यथा- कृष्ण, राधा, सखी पात्र इसके प्रमुख विषय हुआ करते थे परन्तु समयान्तराल से इस जात्रा ने शिवजात्रा, दुर्गाजात्रा, समयात्रा से होते हुए विद्यासुन्दर जैसी प्रेमकथा को भी अपने नाट्य का विषय बना लिया। स्वतन्त्रता आन्दोलन में इसने स्वदेशी जात्रा के रूप में देश के ज्वलन्त मुद्दों को अपना विषय बनाया। यह भ्रमणशील नाट्य-दल होता है, जिसके सदस्य समाज के सभी वर्गों से आते हैं। जात्रा के सभी पात्रों का किरदार पुरुष कलाकार ही निभाते हैं। इसका मंच सोलह फीट का वर्गाकार व आधा फीट ऊँचा होता है। इसका प्रदर्शन तुनी व ढोल के स्वर के साथ प्रारम्भ होता है। संगीत इसका प्रधान अंग होता है।


16. कथकली


17 वीं शताब्दी में दक्षिण के नर्तक केरल वर्मा ने कथकली के वर्तमान स्वरूप को जन्म दिया। यह दक्षिण भारत के केरल प्रान्त का मुख्य नृत्य नाट्य है, जिसमें पात्र बड़े-बड़े मुखौटे लगाकर संगीतमयी प्रस्तुति के साथ किसी कथानक को प्रस्तुत करते हैं। ये कथाएँ प्रायः पौराणिक हुआ करती हैं।


कथकली का शाब्दिक अर्थ कथ व केलि का अलग करते हुए समझा जा सकता है कथा का अर्थ है, कहानी और केलि का अर्थ है खेल अर्थात् किसी कथा को नृत्य-नाट्य के रूप में प्रस्तुत करना। इसमें मूक अभिनय किया जाता है । यह एक व्याख्यात्मक संगीत नाट्य है। कथकली के प्रमुख कलाकार हैं- शंकरन् नम्बूदरीपाद, गोपीनाथ, कुंजुकुरूप, राघवन, नायर, कनक रेले तथा कृष्णन् कुट्टी।

12344

17. ख्याल


राजस्थानी लोक-नाट्यों में सर्वश्रेष्ठ व सर्वाधिक प्रभावकारी लोक नाट्य 'ख्याल' नाम से जाने जाते हैं। राजस्थान में भाँति-भाँति की शैलियों में ख्यालों का प्रचार रहा है। होली से कुछ दिन पूर्व गाँव या शहर के चौक में किसी मन्दिर के सामने, इसके मंचन की पूर्व सूचनार्थ एक ध्वज-दण्ड लगा दिया जाता है। ख्याल में अभिनय, गायन, नाच व ताल का मंजुल मेल दिखाई देता है। ख्याल का मुख्य पात्र अभिनय के साथ-साथ गायन व नृत्य कला में भी पारंगत होता है। इन ख्यालों में शुरू से ही गुरुशिष्य परम्परा रही है। पात्र अपने परिचय के साथ अपने गुरु का परिचय अवश्य देता हैं। इनके कथानक प्रायः पौराणिक, वीरता-प्रधान व प्रेम-प्रधान होते हैं।


18. तुर्रा कलंगी


राजस्थान, महाराष्ट्र तथा मध्यभारत में तुर्रा-कलंगी लोक नाट्य अधिक प्रचलन में रहा है। तुर्रा कलंगी लोक नाट्य में दो दल होते हैं- (1) तुर्रा और (2) कलंगी। इन दोनों दलों में आध्यात्मिक व दार्शनिक विषयों को लेकर वाद- द-विवाद होता है। कलंगी दल वालों की मान्यता होती है कि कलंगी आदि शक्ति का प्रतीक है तथा तुर्रा शिव का। ये लोग तुर्रे की उत्पत्ति भी कलंगी से ही मानते हैं। इसके विपरीत तुर्रे वाले तुर्रे को अखण्ड चैतन्य के रूप में 'ऊँ' शब्द का प्रतीक मानते हैं। ये तुर्रे को शक्ति से उद्भूत नहीं स्वीकारते। इस लोक नाट्य में मंच का निर्माण विशेष प्रकार का करते हुए उसे 12 फीट की ऊँचाई दी जाती है, वहाँ रानी (कलंगी) का शीशमहल होता है। कलंगी पात्र यहीं से टेर देते हुए नीचे उतरता है। तुर्रा या राजा पात्र नीचे या तो घोड़े पर या पैदल दर्शकों के बीच से टेर देता हुआ आता है। मुख्य मंच शीश महल के नीचे 05 फीट ऊँचाई का बनाया जाता है, यहीं पर तुर्रा- कलंगी के सवाल-जवाब होते हैं जिन्हें नृत्य व गायन के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है।



19. रम्मत


क्षेत्र व समुदाय विशेष के आधार पर डॉ० नन्दलाल कल्ला ने रम्मत लोक नाट्य के चार प्रकारों का वर्णन


किया है-


1. बीकानेरी रम्मत: बीकानेर शहर में होली से 10 दिन पूर्व समुदाय विशेष के मोहल्ले में यह रम्मत लोक नाट्य मंचित होता है।


2. जैसलमेर की रम्मत: राजस्थान के पोकरण- फलौदी क्षेत्र में कवि तेज ने रम्मतों के आलेख तैयार किए थे जिन्हें उनके शिष्य ने मंचित करवाया। इन स्थानों पर ब्राह्मण जाति के कलाकार इस पारम्परिक लोक नाट्य को जीवित रखे हुए हैं।


3. मेघवालों की रम्मत: राजस्थान के सिरोही जिले में यह रम्मत ढोल की संगत में प्रदर्शित की जाती थी। 4. रावळों की रम्मत: राजस्थान में रावळ नामक एक जाति है

जो लोक नाट्य से पूर्णत: जुड़ी हुई है। इस जाति के लोग होली पर्व के आस-पास गाँव-गाँव जाकर रम्मत लोक नाट्य प्रदर्शित करते हैं जिसे रावळों की रम्मत नाम से जाना जाता है। इस जाति की यह खास विशेषता है कि ये अपनी यजमान जाति चारणों की उपस्थिति में ही नाट्य प्रस्तुति करते हैं, यजमान चाहे संख्या में एक ही हो पर उनकी उपस्थिति अनिवार्य मानते हैं। इनकी रम्मत में ये अलग-अलग जातियों के स्वाँग बड़ी चतुराई से करते हैं। इनकी अभिनय क्षमता अद्भुत होती है। अर्द्धनारीश्वर के स्वांग में ये नृत्य के साथ आदिशक्ति का यशोगान भी करते हैं। रम्मत के कलाकार तलवारबाजी व नृत्य में भी पारंगत होते हैं। इनके प्रमुख स्वाँग हैं - चच्यै भोरे का स्वाँग, कान्ह-गूजरी का स्वाँग, सूरदास का स्वाँग, मलिया मेणैका का स्वाँग, बीकोजी का स्वाँग इत्यादि । रावळों की रम्मत अश्लीलता या फूहड़पन से सदैव दूर होती है। बड़ा ही संयत व मर्यादित हास्य तथा चुटीले व्यंग्य इनकी खास विशेषता होती है। गीतसंगीत व नृत्य का बहुत सुन्दर समावेश इनमें होता है। 'मादळ' लोक वाद्य पर भी ये संगत देते हैं।