जवाहरलाल नेहरु का युग और भारतीय डायस्पोरा नीति - Jawaharlal Nehru's Era and Indian Diaspora Policy

जवाहरलाल नेहरु का युग और भारतीय डायस्पोरा नीति - Jawaharlal Nehru's Era and Indian Diaspora Policy


1947 में भारतीय स्वाधीनता पश्चात जवाहरलाल नेहरु देश के करीब 16 साल प्रधानमंत्री और विदेशमंत्री रहे। इसलिए प्रवासी भारतीयों के प्रति नेहरु की दृष्टिकोण और विदेश नीति के तत्वों को समझा जा सकता है। तत्कालीन वैश्विक परिस्थति और गुटनिरपेक्षता की अवधारणाओं से प्रेरित होने के कारण वे अफ्रीकी और एशियाई देशों में बसे भारतीयों के मामले में पहल को उन देशों के आंतरिक मामलों में दखल मानते थे। उन्हें डर था उनकी इस पहल से कहीं अफ्रोएशियाई एकता पर संकट न पैदा हो जाए। संविधान सभा में प्रवासी भारतीयों के विषय पर बोलते हुए जवाहरलाल नेहरु ने 4 दिसंबर, 1947 को स्पष्ट रूप से कहा था 'अतीत में ब्रिटिश उपनिवेशों और अधिकृत देशों में भारत - निवासी व्यापारी, व्यवसायी,

श्रमिक और शर्तबंद मजदूर आदि अनेक रूपों में गए हैं। भारतीयों के उन समुद्रपारीय प्रदेश में जा बसने का इतिहास, उनमें से छोटे से छोटे व्यक्ति का भी इतिहास, एक आश्चर्यकारी कथा की भाँति पढ़ा जाता है। ये भारतीय किस प्रकार विदेशों में गए? एक स्वतंत्र देश के नागरिक न होते हुए भी, सभी संभावित असुविधाओं के बीच काम करते हुए भी वे जहाँ कहीं गए, वहाँ उन्होंने अपनी योग्यता सिद्ध की। उन्होंने अपने लिए और जिस देश को अपनाया उसके लिए कठिन परिश्रम किया, और जिस देश में पहुँचे उसे लाभ पहुँचाया।''


"यह एक आश्चर्यकारक कहानी है और ऐसी बात है जिस पर की भारत को गर्व हो सकता है और क्या में यह बताऊँ की उन गरीब शर्तबंद मजदूरों ने जो की विषम परिस्थितियों में बहार गए, अपने श्रम से किस प्रकार क्रमशः उन्नति की? यह भी सत्य है की भारत एक ऐसा देश है जिसमें, बावजूद अनेक कमियों व अन्य ऐसी ही अपार शक्ति है, और जहाँ के लोग विदेशों में फैल सकते हैं। फैलते हैं और हम अपनी संख्या के कारण जिस का हम वहन विकास करते हैं, दूसरों पर छा जाते है। जहाँ एक और हम स्पष्टत: विदेश स्थित या प्रवासी भारतीयों के हितों की रक्षा करने के लिए कृत संकल्प हैं, वहीं दूसरी और हम उन निहित स्वार्थो की रक्षा नहीं कर सकते, जो की उन देशों के हितों के (जहाँ भी वे हों) विरोधी हों। यह एक बड़ी कठिनाई है। फिर भी सभी न्याय हितों की रक्षा करने के लिए, जो भी हम से हो सकेगा, हम करेंगे।'


इसके साथ ही अफ्रीका में बसे भारतीयों और अन्य स्थानों की स्थिति पर विचार रखते हुए नेहरु अपने इन्ही विचारों को 8 मार्च 1948 में संविधान सभा को विस्तृत रूप में संबोधित करते हुए कहा - 'ये भारतीय जो विदेशों में हैं, ये क्या हैं? क्या ये भारत के नागरिक हैं, क्या ये भारत के नागरिक होने वाले हैं या नहीं? अगर ये नागरिक नहीं होने वाले तो इनमें हमारी रूचि केवल सांस्कृतिक और मानवता के दृष्टिकोण से होगी, राजनीति के दृष्टिकोण से नहीं। या तो उन्हें दूसरे देशों में मताधिकार मिल जाए, या फिर मताधिकार से वंचित भारतीय होने के नाते उनके साथ विदेशी मनुष्यों जैसा अनुकूल व्यवहार किया जाए।'


भारतीय प्रवासियों को सलाह देते हुए उन्होंने कहा- आप लोग दूसरे देशों के नागरिकों के साथ दोस्ताना संबंध नहीं रख सकते हैं तो आपको भारत वापस आ जाना चाहिए और विदेश में भारत का नाम खराब नहीं करना चाहिए।


नेहरू का यह स्पष्ट रूप से मानना था कि यदि भारत सरकार प्रत्यक्ष रूप से विदेशों में बसे भारतीय मूल के लोगों को संरक्षण और सहायता प्रदान करती है तो यह भारतीयों के लिए हानिकारक साबित हो सकता है। परिस्थितिवश वे व्यक्तिगत और गैर-सरकारी स्तर पर उनसे संबंध रखने के खिलाफ नहीं थे। भारत की तत्कालीन कमजोर परिस्थिति के कारण भारत सरकार अपने डायस्पोरा के लिए सदभावना के सिवाय और कुछ नहीं कर पाई। राजनीतिक विज्ञान में नेहरु की यह नीति भारतीय डायस्पोरा के संदर्भ में सक्रीय असहाचर्य (active disassociation) कही जा सकती है।


नेहरू शासन काल में भारत के पड़ोसी राष्ट्र श्रीलंका में प्रवासी भारतीयों के निष्कासन की समस्या निर्माण सामने आई। श्रीलंका में चाय, रबर और काफी के खेतो में सस्ते दामों पर कार्य करने के लिए दक्षिण भारत से भारतीय मजदूरों को कंगनी मेस्त्री व्यवस्था के तहत ले जाया गया था जो बाद वहीं बस गए। श्रीलंका की स्वतंत्रता के समय भारतीयों की संख्या 1,50,000 थी। श्रीलंका के स्वतंत्रता पूर्व इन लोगों को वहाँ ब्रिटिश नागरिक के रूप में समान अधिकार प्राप्त थे, परंतु स्वतंत्रता पश्चात श्रीलंका में भारतीयों के निष्कासन की समस्या उठ खड़ी हुई। श्रीलंका में एक विचार प्रचलित हुआ कि ये भारतीय मूल के लोग श्रीलंका की आर्थिक नीतियों को प्रभावित करते हैं

अतः इन्हें वापस भारत चले जाना चाहिए। ऐसे ही परिस्थिति में अधिकांश भारतीयों को भारत भेजने के प्रयत्न में श्रीलंका की सरकार करने लगी। इसके तहत श्रीलंका सरकार ने पहले प्रयास के तहत यह किया कि 1948 में सीलोन नागरिकता अधिनियम तथा 1949 में सीलोन संसदीय अधिनियम पारित करके भारत के मूल निवासियों को मताधिकार से वंचित कर दिया। इसके बाद भारतीय नागरिकों को श्रीलंका की नागरिकता प्राप्त करने हेतु इस प्रकार का प्रमाण पत्र देना आवश्यक हो गया कि उसके माता-पिता श्रीलंका में ही जन्मे हैं। इसके साथ ही 1939 से लगातार श्रीलंका निवास का भी प्रमाण पत्र प्रस्तुत करना आवश्यक रखा गया। इन सभी प्रयत्नों के मूल में श्रीलंका का यह उद्देश्य था कि अधिक से अधिक भारतीय मूल के निवासी श्रीलंका छोड़कर चले जाएँ।


पंडित जवाहरलाल नेहरु ने श्रीलंका में प्रवासी भारतीयों के प्रति अपनाई सक्रिय अलगाव की नीति से अलग हटकर जून 1953 में श्रीलंका के प्रधानमंत्री डढले सेनानायके से वार्ता की परंतु श्रीलंका प्रधानमंत्री के हठ के कारण कोई ठोस उपाय या समझौता नहीं हो पाया। इस समस्या के सिलसिले में नेहरू के लगातार प्रयास चलते रहे। जनवरी 1954 में जान कोटेवाला को समस्या पर बात करने हेतु दिल्ली आमंत्रित किया गया। प्रवासियों के संबंधर्मे नेहरु और कोटेवाला के बीच समझौता हुआ। 1956 ई. में आर. डी. भंडारनायके की सरकार आई। उनका रवैया भारत के प्रति मित्रता पूर्ण रहा। प्रवासियों के समस्या के प्रति नेहरु और भंडारनायके के बीच भी वार्ता हुई, परंतु कोई संतोषजनक हल नहीं निकल पाया।


लक्ष्मीमल सिंघवी जी 1962 में तीसरी लोकसभा के निर्दलीय सदस्य चुने गए थे, उस समय उन्होंने प्रथम बार तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु के समक्ष प्रवासी भारतीयों के प्रश्नों को रखा। नेहरु ने अपनाए सक्रिय अलगाव के नीति के कारण नेहरु उस समय डायस्पोरा के लिए कुछ नहीं कर सके। उसी दौरान डॉ. सिंघवी ने प्रवासी भारतीयों के लिए एक नए शब्द का निर्माण किया जो अनेक लोगों को प्रिय और रुचिकर प्रतीत हुआ। प्रवासी भारतीयों के संदर्भ में वह शब्द था 'भारतवंशी भारतवंशी एक विलक्षण शब्द है क्योंकि यह शब्द वंश को किसी जाति या परिवार से नहीं जोड़ता बल्कि वह देश के विराट परिवार का परिचायक है।


1962 में भारत और चीन के युद्ध के समय नेहरु विदेशी भारतीयों के प्रति दोहरी वफादारी की बात करते हैं। पूर्वी अफ्रीका में बसे भारतीय लोगों से भारत की सुरक्षा बढ़ाने में योगदान का स्वागत तथा अन्य किसी भी प्रकार के मदद की उनसे आशा करते हैं। इससे सबंधित प्रश्न जब नेहरु से पूछा गया तो उन्होंने कहा प्रवासी भारतीयों की दोहरी निष्ठा है. एक मेज़बान देश के प्रति जहाँ वो रह रहे हैं और एक स्वभूमि के प्रति।' नेहरु की भारतीय डायस्पोरा के प्रति नीति से स्पष्ट होता है किस्वतंत्रता पूर्व प्रवासी भारतीयों के लिए जो दृष्टिकोण था वह स्वतंत्रता के पश्चात भारत की तत्कालीन परिस्थितिवश के कारण वैसा नहीं रहा। परंतु श्रीलंका के भारतीयों के प्रति उनका नजरिया अधिक सक्रियता का था।