लोक-गीतों में संगीत का विधान एवं वाद्ययंत्र - Law and instruments of music in folk songs
लोक-गीतों में संगीत का विधान एवं वाद्ययंत्र - Law and instruments of music in folk songs
संगीत का विधान
लोक-गीतों में संगीत का विधान नैसर्गिक होता है। आरोह-अवरोह, सुर-लय-ताल के शास्त्रीय नियम लोक-गीतों में नहीं होते हैं। इन गीतों में कृत्रिमता का पूर्ण अभाव पाया जाता है। संगीत लोक-गीतों में स्वतः स्फुट है। इनमें भावों के आवेग व आवेश के साथ स्वरों का आरोहण व अवरोहण पाया जाता है। संगीत के शास्त्रीय नियमों से परे सहज-स्वाभाविक संगीत इन गीतों की प्रमुख विशेषता है। यही कारण हैकि लोक गीत गायक को किसी विशेष संगीत-शिक्षण की आवश्यकता नहीं होती है। लोक गायक बिना किसी औपचारिक प्रशिक्षण के, गीत को किस प्रकार गाना है,
उस गीत की लय को हृदयंगम कर जान लेता है। कुछ ही अभ्यास में वह लोक गायक गीत को पूर्ण रूप से गाने लगता है। लोक गीत में उसका संगीत नीरक्षीर की भाँति घुला मिला रहता है। लोक संगीत की व्यापकता के विषय में डॉ. कृष्णदेव उपाध्याय के विचार द्रष्टव्य हैं "लोकजीवन का सुन्दरतम प्रतिबिम्ब लोक गीत और लोक संगीत में दिखाई पड़ता है क्योंकि लोक-गीतों में शब्दों और स्वरों के चयन में कृत्रिमता का अभाव रहता है। इनमें लोकजीवन का सीधा-सादा चित्र भी रहता है। लोक गीत सरल, सुन्दर, अनुभूतिमय तथा संगीतमय होते हैं। कदाचित् ही कोई ऐसा लोक गीत हो जो संगीत से अनुप्राणित न हुआ हो।"
लोक गीत का सौन्दर्य स्वर, लय पर बहुत कुछ निर्भर करता है। जहाँ इनका अभाव हो जाता है वहाँ लोक गीत की प्रभावोत्पादकता नहीं बनी रह पाती है। डॉ. सत्येन्द्र ने अंग्रेज विद्वान् Kenneth Rich Mand के कथन का हिन्दी अनुवाद करते हुए लोक-गीतों में संगीत के समन्वय और समावेश पर इस तरह प्रकाश डाला है- "सभी लोक-गीतों में सामान्यतः यह बात मिलती है कि शब्द गौण होते हैं लय से, और इसी कारण कभी-कभी यह कहा जाता है कि यह लय ही है जिसका सर्वापेक्षा अधिक महत्त्व था । "
लोक-गीतों में पाए जाने वाले संगीत-विधान का अपना एक नियमित रूप होता है।
इनमें लय की एक निर्धारित व्यवस्था है, जिसके कारण लोक-गीतों का संगीत बना रह पाता है। लोक-गीतों के संगीत तत्त्व पर आधारित कुछ विशेषताएँ डॉ. कृष्णदेव उपाध्याय ने इस तरह बतायी हैं -
1. लघु-गुरु का शिथिल बन्धन
2. उपान्त्य स्वर को लुप्त स्वर में उच्चारण करना
3. स्तोभ की प्रणाली
उपर्युक्त विशेषताएँ लोक गीत की गायन शैली को स्पष्ट करती है।
लोक-गीतों को गाते समय सरसता बनाई रखने हेतु लघु को गुरु और गुरु को लघु कर देना बहुत सामान्य बात होती है।
उदाहरणस्वरूप देखिए, ब्रजभाषा के इस लोक गीत में चिड़िया के इकार को ईकार (चिड़ी) के उच्चारण में बदल दिया गया है-
चिड़ी तोय चामरिया भावे
उपान्त्य स्वर को लुप्त स्वर में उच्चारण करने की विशेषता के अनुसार लोक गीत में स्थायी या अन्तरा के तुक पद इस गति से गाये जाते हैं कि अन्तिम स्वर का उच्चारण लघु हो जाता है व उपान्त्य का लोप जैसे-
उल्लीपार बसुरिया बाजे, पल्ली पार सखी लहराई।
लोक गीत में माधुर्य के संयोजनार्थ, कुछ लघु पदों का आगम कर दिया जाता है। यह आगम आरम्भ, मध्य या अन्त कहीं भी हो सकता है।
यह विशेषता स्तोभ की प्रणाली के रूप में जानी जाती है। उदाहरणार्थ- हो, रामा, ऐ जी कोई, ऐ जी हाँ सा, हां जी, से, आदि पदों का आगम लोक-गीतों में किया जाता है। जैसे-
ऐ जी हाँसा म्हारी रुणक-झुणक
पायल बाजे सा
बाई सा बीरा की कर आऊं सा ।
और भी,
बाग हिंडोले अम्मा मेरी परि रहे जी, ऐ जी कोई झूलत नंदकिसोर ।
इस प्रकार कहा जा सकता है कि लोक-गीतों का अपना निजी लयाधारित संगीत-विधान होता है।
वाद्य यंत्र
लोक-गीतों की प्रस्तुति के साथ वाद्य यंत्रों के प्रयोग से उनकी प्रभविष्णुता और भी अधिक बढ़ जाती है। प्रत्येक प्रदेश में प्रचलित वाद्य यंत्रों की अपनी विशिष्ट पहचान होती है सांगीतिक दृष्टि एवं वाद्य के बजाने के ढंग के आधार पर लोकवाद्य यंत्रों को निम्नलिखित वर्गों में रखा जा सकता है-
1. घनवाद्य
इस वर्ग के वाद्य यंत्र पीतल, ताँबा, जस्ता या ऐसी ही किसी धातु से निर्मित होते हैं। इन वाद्यों को आघात करके या चोट करके बजाया जाता है। श्रीमंडल, मंजीरा, टंकोरा, चिमटा आदि घन वाद्यों की श्रेणी में परिगणित किए जाते हैं।
2. अनुरुद्ध वाद्य
ये वाद्य यंत्र ताल या थाप से बजाए जाते हैं। ये वाद्य या तो एक ओर से मढ़े होते हैं जैसे- डफ, चंग इत्यादि । अथवा दोनों ओर से मढ़े हुए होते हैं जैसे ढोलक, ढोल, नगाड़ा आदि। -
3. सुषिर वाद्य
वाद्य-यंत्र के छेदों में फूँक मारकर बजाए जाने वाले वाद्य सुषिर वाद्य कहलाते हैं। जैसे- पूँगी, मुरला,
सतारा आदि।
4. तार वाद्य
ये वे वाद्य यंत्र होते हैं जिन्हें उनके ऊपर लगे तारों को झंकृत करके बजाया जाता है।
सारंगी रावण हत्था, वीणा आदि इसी श्रेणी के अन्तर्गत आते हैं।
लोक-गीतों के गाने में प्रयुक्त लोक वाद्यों पर विचार करते हुए लोक-साहित्यविद् डॉ. सत्येन्द्र ने गायकों के बाजे के अनुसार वाद्यों के प्रयोग का एक चार्ट दिया है। इनके अनुसार लोक वाद्य इस प्रकार हैं- नंगाज, ढोलक, तबला, मजीरा, सारंगी, डमरू, झाँझ, घट थाली, ढप, चिकाड़ा, मकशबीन, इकतारा, बेल या बेली, तुम्बी बीन, हारमोनियम, तम्बूरा, करतालें, खंजरी।
उक्त वाद्यों के अतिरिक्त भी कई अन्य वाद्य हैं जो अलग-अलग प्रदेशों में बहुत प्रचलित हैं। जैसे- रावणहत्था, बीन, सिंगी बाजा, नक्कारा, नड़, भपंग आदि ।
भारत के विभिन्न प्रदेशों में विविध भाँति के लोक वाद्यों का प्रयोग किया जाता है। उदाहरणार्थ, राजस्थान प्रदेश के लोक-गीतों के गाने में प्रयुक्त प्रमुख लोक वाद्य निम्नलिखित हैं-
01. कमाचया :
यह तारों वाला बिना परदे का कमान द्वारा बजाये जाने वाला वाद्य है। इसमें एक तूंबा होता है जिस पर चमड़े की पतली झिल्ली चढ़ी रहती है। इसकी घुरच अथवा घोड़ी बहुत चौड़ी होती है जिस पर तार लगे रहते हैं। कुल 9 तारों में से 3 मुख्य तार बटी हुई तात के बने होते हैं। शेष 6 तार स्टील के होते हैं। इस वाद्य की कुल लम्बाई 75 से.मी. होती है। यह वाद्य राजस्थान की लंगा जनजाति प्रयोग में लाती है।
02. खंजरी:
यह डमरू के प्रकार का वाद्य है। इसका ढाँचा लकड़ी का बना होता है। इस पर बकरी की खाल मढ़ी होती है। इसे एक हाथ से पकड़कर दूसरे हाथ की हथेली एवं उँगलियों द्वारा बजाया जाता है। इस वाद्य में खाल के तनाव को कम या अधिक करने का कोई साधन नहीं है। इसे कालबेलिया तथा जोगी जनजातियों के लोग नृत्य एवं गायन के समय प्रयोग में लाते हैं।
03. पुरालियो
यह छनक कर बजाए जाने वाले वाद्यों के प्रकार में आता है। यह बाँस का बना होता है तथा मोरचंग से काफी मिलता- -जुलता है परन्तु इसका किनारा एस्सियों का बना होता है जिनके आपस में टकराने से भिन्न ध्वनियाँ प्रसारित होती है।
इसे उँगलियों से बजाते हैं। इसे गरासिया व कालबेलिया जनजाति के लोग बजाते हैं।
04. सारंगी:
सारंगी संज्ञक वाद्य कई रूपों में उपलब्ध है-
गुजरातन सारंगी:
यह तारों तथा बिना परदों का लोकवाद्य है जिसे नाखून द्वारा बजाया जाता है। इसके कुल चार तारों में से दो बटी हुई तात के तथा दो स्टील के होते हैं। इसमें नौ रतवें होती हैं जो दायीं ओर खूँटियों से बँधी होती हैं। इस वाद्य की कुल लम्बाई 58 से.मी. है। इसे लंगा जनजाति के लोग बजाते हैं।
ii. धानी सारंगी :
यह भी तारों वाला बिना परदे का लोक वाद्य हैं। इसमें लकड़ी का तूंबा होता है। इसमें दो तारें स्टील की और दो तारें बँधी हुई तारों की होती हैं। मुख्य तार स्टील का होता हैं। इसमें 14 तरखें होती हैं, जिनमें से 9 डाँड पर दायीं ओर और 5 सामने की ओर खूंटियों से बँधी हुई होती हैं। इसकी कुल लम्बाई 49 से.मी. है और इसे कमान द्वारा बजाया जाता है। इसे जोगी जनजाति के लोग अपने मनोरंजन के लिए बजाते हैं।
सिन्धी सारंगी:
यह तारों वाला बिना परदे का लोक वाद्य है। इसे कमान द्वारा बजाया जाता है। इसमें कुल 4 तार होते हैं। जिनमें 2 स्टील के तथा 2 बटी हुई तात के बने होते हैं।
मुख्य तार स्टील का होता है। इसमें 21 तरबें होती हैं जिनमें से 16 दायीं ओर से बँधी रहती है तथा बाकी बायीं ओर ऊपर खूँटियों से बंधी हुई होती हैं। डाँड के बीच छेद होता है। इसकी कमान अलग ढंग से हिलायी जाती है जिससे ताल की अनुभूति प्राप्त होती है। इसे लंगा जनजाति के लोग गायन के साथ संगत के लिए बजाते हैं।
iv. जोगिया सारंगी
यह तारों वाला बिना परदों का कमान द्वारा बजने वाला वाद्य है। यह सारंगी से काफी मिलता-जुलता है। इसके तूंबे पर खाल मढ़ी होती है जिस पर घुरच रखा होता है।
यह तुन नामक लकड़ी का बना होता है। इसमें कुल चार तार होते हैं जिनमें से 2 स्टील के तथा 2 बटी हुई तात के होते हैं। मुख्य तार बटी हुई तात का होता है। इसमें 11 तर होती है। इसे राजस्थान के जोगी सम्प्रदाय के लोग अपने धार्मिक नायकों की जीवनियों को गाते हुए बजाते हैं तथा निहालदे सुल्तान नामक गाथा गाते समय भी इसका प्रयोग किया जाता है।
05. चिकारा
यह भी तारों वाला बिना परदे का वाद्य है। इसका तूंबा नारियल के खोल का बना होता है तथा डाँड बाँस की बनी होती है जिस पर उँगली रखकर बजाया जाता है।
तूंबे पर चमड़े की झिल्ली चढ़ी होती है जिसे खोल के सिला जाता है। इसमें तीन तार होते हैं जिनमें से दो बँटे हुए बालों के तथा तीसरा स्टील का होता है। ये सभी बे के नीचे कील के साथ बंधे होते हैं। ऊपर की ओर यह डाँड के साथ खूँटियों से बँधे होते हैं। इसे लकड़ी के बने कमान के साथ बजाते हैं। यह 65 से.मी. लम्बा होता है। इसे गडरिया जनजाति के लोग गाने के साथ संगत के लिए भी प्रयोग में लाते हैं। इस लोकवाद्य का एक दूसरा रूप मौर्य जनजाति के लोग भी संगत के लिए प्रयोग में लाते हैं। इस रूप में अन्तर केवल यही है कि कमान के साथ घण्टी भी लगी रहती है जो कि वादन के समय इसे थोड़ी भिन्नता प्रदान करती है।
06. मोरचंग:
यह फूँक मारकर बजाए जाने वाला एक लोकवाद्य है। इसका किनारा लोहे का होता है जिस पर एक लोहे की जीभ लगी रहती है। इसे बाएँ हाथ में थामकर किनारों को हाथों पर रखते हैं तथा दाएँ हाथ की उँगलियों से खींचकर बजाते हैं। लोहे की जीभ को लगाकर फूँक मारकर हिलाते रहते हैं। इसे गडरिये लयकारी संगत के लिए बजाते हैं।
07. मुरला:
यह फूँक मारकर बजाए जाने वाला वाद्य है। यह एक विशिष्ट प्रकार का नालीदार वाद्य है। जिसमें दो पोली लकड़ियों की नालियाँ होती हैं।
प्रत्येक नली में एक-एक सरकंडा लगा रहता है। एक नली से ध्वनि निकलती है तो दूसरी से स्वर बजते हैं। ये सरकंडे वृक्ष की पतली लकड़ी के बनते हैं। ध्वनि देने वाली नली में तीन छिद्र होते हैं जो मोम की सहायता से निश्चित स्वर में मिला दिये जाते हैं। इसे मुख्य रूप से लंगा जनजाति के लोग बजाते हैं।
08. मादल
यह ढोल के प्रकार का लोक वाद्य है। यह मिट्टी का बना सुच्चकार आकृति का होता है। इसके ऊपर
चमड़े की झिल्ली रस्सी से बंधी होती है। इसमें ढोल की भाँति छल्ले नहीं होते हैं। इसे गीला आटा लगाकर बजाया जाता है। ये 50 से.मी. लम्बा होता है। इसे भील एवं गरासिया जनजाति के लोग नृत्य के साथ संगत के लिए प्रयोग में लाते हैं।
09. वर
यह फूँक मार कर बजाया जाने वाला एक लोकवाद्य है। यह पीतल का बना होता है। इसकी आकृति अंग्रेजी वर्णमाला के अक्षर ण से मिलती है जिसका एक भाग बेलनाकार तथा दूसरा सुच्चाकार होता है। सुच्चाकार भाग आगे से कपनुमा होता है। इसमें Integrated Mouth Piece लगा होता है। इसमें से बहुत धीमा स्वर निकलता है और स्वरों की संख्या सीमित होती है। इसकी कुल लम्बाई 124 से.मी. है। इसे सरगरा जाति के लोग बजाते हैं।
10. पाबूजी के माटे
ये मिट्टी के दो बड़े आकार के मटके होते हैं जिनके सिर का व्यास 37 से.मी. होता है। इनके मुँह पर चमड़े की झिल्ली तसमों से बँधी होती है। इन्हें हाथ से बजाते हैं तथा एक समय पर दो व्यक्ति बजाते हैं। दोनों माटे अलग-अलग स्वर में मिले होते हैं। पश्चिमी राजस्थान में थोरी व नायक जनजातियाँ इन्हें बजाती हैं।
11. gear:
इसमें 3 मुख्य तार होते हैं जिनमें दो स्टील तथा एक तात का होता है। ये ऊपर खूंटियों से बँधे होते हैं। इनके अतिरिक्त 6 तरबें होती है। इसे लंगा जाति के लोग बजाते हैं।
इसका तूंबा विशेष प्रकार से झुका होता है। यह कमान द्वारा बजाया जाता है। कमान में घुँघरू बँधे होते हैं। कमान लय के साथ घुमायी जाती है।
12. बौकिया
यह पीतल का बना होता है। यह सरगरा जनजाति का खानदानी वाद्य है तथा इसे ढोल के साथ बजाया
जाता है।
13. दुकाळी :
यह भील जनजाति का वाद्य है। यह 6 सर 8 इंच की पोली बेलनाकार लकड़ी का बना होता है। इसके एक किनारे पर खाल मढ़ी रहती है तथा दूसरा किनारा खुला रहता है।
खाल के मध्य भाग से होकर एक तार लगाया जाता है और हाथ से लय इच्छानुसार बजाई जाती है। इसे मुख्य रूप से दीपावली के अवसर पर बजाया जाता है।
14. डेरू :
यह भी डमरू के प्रकार का वाद्य है। इसके सिरे पर बछड़े के चमड़े की झिल्ली लगी होती है जो दोनों ओर कीलों से टंगी होती है और रस्सियों से बँधी होती है। इसे एक तरफ लकड़ी की चोट मारकर बजाया जाता है। ऐसा करने से अलग-अलग प्रकार की ध्वनियाँ निकलती हैं। इसे भी सपेरे या पेशवर जनजातियाँ ही अधिकांश रूप से प्रयोग करती हैं। कालबेलिया जनजाति के लोग भी इसे मन बहलाव के लिए बजाते हैं।
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