लोक-गीतों में संगीत का विधान एवं वाद्ययंत्र - Law and instruments of music in folk songs

लोक-गीतों में संगीत का विधान एवं वाद्ययंत्र - Law and instruments of music in folk songs


इसमें खोखले बाँस के समान लम्बाई वाले दो समानान्तर टुकड़े होते है जिनमें एक पत्ती लगी होती है। जिसका निचला भाग मोम द्वारा तूंबे से जुड़ा होता है। बजाने वाला भाग तूंबे का बढ़ा हुआ भाग होता है। दोनों पंत्तियाँ एक ही ध्वनि पर मिली होती हैं। एक खोखले बाँस में उँगली रखने के लिए 5 से 8 तक छिद्र होते हैं। एक खोखला बाँस मूल ध्वनि देता है तथा छिद्र वाले बॉस से विभिन्न स्वर उत्पन्न किये जाते हैं। पूँगी के नीचे भाग में अँगूठा लगाने के लिए छिद्र होता है। ध्वनि को काबू में रखने के लिए कई बार तीसरे बाँस के टुकड़े का प्रयोग भी किया जाता है। इसे जोगी तथा सपेरे आदि बजाते हैं।


16. खड़ताल:


यह आपस में टकराकर बजने वाला वाद्य है। यह लकड़ी की बनी चौड़ी चपटी आकार की जोड़ी होती है। जिसमें पीतल की गोल-पतली प्लेटें जुड़ी होती हैं। इसे एक ही हाथ में पकड़कर एक को अंगूठे में तथा दूसरे को उँगलियों में डालकर आपस में टकराकर बजाया जाता है। इससे एक तारे की संगत की जाती है तथा राजस्थान के भक्ति-संगीत में यह विशेष महत्त्व रखता है।


17. जंतर :


यह तारों वाला परदों का वाद्य है। इसमें डाँड के दोनों और लकड़ी के बड़े तूंबे लगे होते हैं। डाँड पर 14 हट्टी के परदे मोम से चिपके होते हैं।

इसमें दो तार स्टील के होते हैं जिनमें से एक मुख्य तार तथा दूसरा चिकारी का होता है। इसकी कुल लम्बाई 114 से.मी. होती है। इसके ऊपरी तूबे को कन्धे पर टिकाकर तथा डाँड को नीचे से हाथ में पकड़कर उँगलियों से बजाया जाता है। यह वाद्य वीणा से मिलता-जुलता है। इसे राजस्थान के भोपे धार्मिक रचनाएँ सुनाते समय बजाते हैं। बगड़ावत की प्रस्तुति करते समय भी इस वाद्य की संगत होती है।


18. रावणहत्था:


यह तारों वाला कमान से बजने वाला वाद्य है। इसमें दो मुख्य तार होते हैं जिनमें से एक घोड़े के बालों से तथा दूसरा लोहे की कुछ तारों को बट कर बनाया हुआ होता है।

इसके तरबों की संख्या क्रमश: 3, 7, 11 तथा 16 तक होती है जो शुद्ध सप्तक में मिली होती है। इसमें केवल घोड़ी ही रहती है। मुख्य तार घोड़ी के ऊपर से तथा तरबों के तार घोड़ी के बीच में से गुजरते हैं। इसका तूंबा नारियल के खोल का तथा डाँड बाँस की बनी होती है। इसमें खूँटियाँ लकड़ी की होती हैं। नारियल के खोल पर झिल्ली होती है जो मढ़ी हुई न होकर डोरी के साथ बँधी हुई होती है। झुकी हुई कमान पर घोड़े की पूँछ के बाल लगे हुए होते हैं। यह कमान मुख्य तारों को बजाता है। इसके नीचे के हिस्से को छाती पर टिकाकर बजाया जाता है। किसी-किसी कमान पर घण्टी भी लगी होती है जो इसकी ध्वनि को विविधता प्रदान करती है। यह पाबूजी के कथावाचकों द्वारा प्रयोग में लाया जाता है। कथावाचक पश्चिमी राजस्थान के भील जाति के भोपे होते हैं।


19. नागफणी


यह ताँबे के दो भागों का बना होता है। एक भाग बेलनाकार और खोखला होता है जिसका मुँह घण्टीनुमा खुला होता है। इसके ऊपर चित्रकारी की हुई होती है। फूँक मारने वाला भाग नुकीला होता है। इसकी कुल लम्बाई 159 से.मी. होती है।


20. रावलों की मादल :


यह प्रहार करके बजाया जाने वाला वाद्य है। यह नटों की ढोलक से काफी मिलता-जुलता है। अन्तर केवल इतना है कि इसमें झिल्ली को गजरा लगाकर रस्सियों द्वारा कसा होता है तथा बीच में गाँठ भी लगी होती हैं। इसे बायीं ओर गीला आटा लगाकर बजाया जाता है। इसके सिर का व्यास 18 से.मी. होता है। राजस्थान के लोकनृत्यों के साथ इसका भी काफी प्रचलन है।


21. श्रीमंडल :


यह एक तरंग वाद्य है जिसके द्वारा सप्तक के सभी स्वर निकाले जा सकते हैं। इस वाद्य में 12.5 से 20.5 से.मी. व्यास की पीतल या लोहे की प्लेटें रस्सी से एक लोहे के फ्रेम से जड़ दी जाती हैं। इसे लकड़ी की दो छड़ों, जिनके आगे गाँठ लगी होती हैं, की सहायता से बजाया जाता है। लोकनृत्यों में इस वाद्य का अनूठा स्थान है।


22. रमझौला :


ये कुछ बड़े आकार के घुँघरू होते हैं जो चमड़े की एक पट्टी पर टंगे होते है। यह पट्टी पिंडली तक बाँधी जाती है तथा होली के अवसर पर नृत्य मण्डली में इसका प्रयोग किया जाता है।


23. अलगोजा :


यह फूँक मारकर बजाया जाने वाला वाद्य है। इसे दोहरी बाँसुरी भी कहते हैं जो खोखली लकड़ी की बनी होती है। दोनों में 6 छिद्र होते हैं। दोनों बाँसुरियों की लम्बाई 48 से.मी. होती है। आमतौर पर ऊपर के 3 छिद्र बन्द करके इसे बजाते हैं। ये पशु चराने वालों का मनपसंदीदा वाद्य है। अलवर जिले के मेव इसे स्वतन्त्र रूप से बजाते हैं। अगर एक ही बाँसुरी का प्रयोग किया जाए तो यह एक अन्य राजस्थानी वाद्य 'पोली' कहलाता है।


24. नड़


यह सुषिर (फूँक मारकर बजाया जाने वाला) वाद्य है। एक कगोर नामक विशिष्ट प्रकार के बाँस से निर्मित होता है। इसकी लम्बाई लगभग एक मीटर होती है।

इस खोखले बाँस में तीन छेद होते हैं। श्वास रोकने एवं छोड़ने की विशिष्ट प्रक्रिया से गुजरने पर ही इसमें से स्वर और सुर दोनों निकाले जाते हैं। यह चरवाहों का वाद्य है। विगत वर्षों में करणा भील (जिसका वध कर दिया गया) इसका श्रेष्ठ वादक था।


25. भपंग


यह तूंबी से बना होता है। तूंबी नीचे से मढ़ी हुई होती है और इसका मुँह ऊपर से खुला रहता है। इसमें पतले चमड़े का एक तार लगा होता है। तूंबी को बगल में दबाकर तथा ताँत को हाथ में पकड़कर लकड़ी के गुटके से इसे बजाया जाता है। मेव-जोगियों तथा फकीरों का यह प्रिय वाद्य है।


लोक गायक


साधारण तौर पर हर वह व्यक्ति, जो लोक गीत का गायन करता हो, लोक गायक कहलायेगा। सामान्यतः मानव समाज का प्रत्येक प्राणी इस श्रेणी में रखा जा सकता है क्योंकि सम्भवतः हर मनुष्य कभी-न-कभी अपने मनोभावों को स्वर लहरियों में ढालते हुए एकाध लोक गीत तो गाता ही है।


'लोक गायक' शब्द के सामाजिक रूप से प्रयोग को देखा जाए तो लोक गायक उन्हें भी कहा जाता है जो लोग लोक गायन का कार्य पेशे के रूप में करते हैं। सारांशतः लोक-गीतों के गायकों को लोक गायक कहा जाता रहा है।