फिजी में भारतीय गिरमिटिया श्रमिकों के लिए कार्य करने वाले नेता - Leader working for Indian indentured labor in Fiji

फिजी में भारतीय गिरमिटिया श्रमिकों के लिए कार्य करने वाले नेता - Leader working for Indian indentured labor in Fiji


महात्मा गांधी जी की सलाह पर फिजी में आकर भारतीय अनुबंधित गिरमिटिया श्रमिकों के बीच उनके साथ हो रहे अन्याय, मानवाधिकारों के हनन के लिए आवाज उठाना, भारतीयों को संगठित करना और उनके अंदर सांस्कृतिक राजनीतिक जागृति के लिए कार्य करने वालों में प्रमुख नाम मणिलाल डॉक्टर और सी. एफ. एंड्रयूज का है।


मणिलाल डॉक्टर


मणिलाल डॉक्टर का जन्म 28 जुलाई, 1881 ई. को बड़ौदा, गुजरात में हुआ था। उनका असली नाम मणिलाल मगनलाल शाह था। उन्होंने एम. ए. 1904 में बंबई विश्वविद्यालय से किया।

इसके बाद वे 1905 में बार-एट-ला के छात्र के रूप में लंदन चले गए। वहाँ 'भारतीय समाजशात्री' के रूप में उन्हें होम रुल सोसाइटी का एक सक्रिय सदस्य बना दिया गया। 1906 ई. में मणिलाल की मुलाकात एम. के. गांधी से हुई। उन्होंने फिजी में काम कर रहे गिरमिट मजदूरों की दुर्दशा के बारे में मणिलाल को बताया और ब्रिटिश सत्ता से भारतीय मजदूरों की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक स्थिति में सुधार लाने के लिए मणिलाल डॉ. को मॉरिशस से फिजी भेजा।


मणिलाल ने इंडियन ओपिनियन नामक समाचार-पत्र में प्रकाशित दक्षिण अफ्रीका में संघर्षरत महात्मा गांधी तथा फिजी के तोताराम सनाढ्या,

बाबूराम सिंग राम रूप और जे. पी. महाराज के पत्र - व्यवहार को पढ़कर 1912 ई. में फिजी जाना निश्चित किया था। इस पत्र व्यवहार में गांधी जी से अंग्रेजी में शिक्षित तथा वकील व्यक्ति को फिजी भेजने का अनुरोध किया गया था। मणिलाल फिजी में पहली बार मासिक रूप से प्रकाशित होने वाले भारतीय जनरल 'इंडियन सेटलर्स के अंग्रेजी प्रकोष्ठ के संपादक थे। इसका प्रकाशन 1917 ई. में प्रारंभ हुआ था परंतु कोष की कमी के कारण कुछ समय बाद ही इसका प्रकाशन बंद हो गया था। 1911 ई. में स्थापित ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन ऑफ फिजी का नाम


बदलकर 'इंडियन इम्पीरियल एसोसिएशन ऑफ फिजी करने का श्रेय मणिलाल को ही दिया जाता था। फी जियाई- भारतीयों में राजनीतिक सक्रियता का युग 1911 ई. में प्रारंभ हुआ,

जब ब्रिटिश इण्डिया एसोसिएशन (बाद में, इंडियन इम्पीरियल एसोसिएशन) की स्थापना हुई थी। इसके संस्थापक मणिलाल 1912 ई. में, जे. पी. महाराज, पीटर ग्रांट और पंडित तोताराम सनाढ्य के निवेदन पर फिजी आए थे।


सी. एफ. एन्ड्रयूज : रेवरेंड चार्ल्स फ्रीयर एन्ड्रयूज (सी. एफ. एन्ड्रयूज) का जन्म ब्रिटेन में 12 फरवरी, 1871 ई. को हुआ था। वे महात्मा गांधी के अभिन्न मित्र थे। ब्रिटिश नागरिक होते हुए भी आप भारतीय स्वाधीनता संग्राम के बारे में समय-समय पर मैंचेस्टर गार्जियन', 'द हिंदू, 'माडर्न रिव्यू', 'द नैटाल आबजर्वर', और 'द टोरोंटो स्टार' में आलेख लिखते रहे।

महात्मा गांधी की सलाह पर एंड्रयूज 1915 और 1917 में फीज़ी की परिस्थितियों का विश्लेषण करने फिज़ी गए थे। 1936 में जब वे आस्ट्रेलिया व न्यूजीलैंड की यात्रा पर थे तो उन्हें फिजी आमंत्रित किया गया व वे पुन: फिज़ी गए। एंड्रयूज ने शोषित भारतीय अनुबंधित / गिरमिटिया श्रमिकों की मुक्ति के लिए संघर्ष किया और अंततः उन्हें सफलता मिली। फिजी में ही उन्हें सबसे पहले दीनबंधु के संबोधन से अलंकृत किया गया था। वहाँ से भारत लौटकर दीनबंधु एंड्रयूज ने अपना संपूर्ण जीवन श्रमिकों केकल्याण के लिए समर्पित कर दिया।

फीज़ी के बंधुआ मजदूरों को मुक्ति दिलाने व उनका जीवन बेहतर बनाने के प्रयास के लिए एंड्रयूज की भूमिका सदैव याद की जाएगी। व्यक्तिगत स्तर पर सी. एफ. एंड्रयूज ने करारबद्ध कुली प्रथा की समाप्ति के लिए सबसे अधिक सराहनीय प्रयास किया था। मैकनील चिमन लाल की रिपोर्ट से वे भारतीय जो इस प्रथा को समाप्त करने के पक्ष में थे, संतुष्ट नहीं थे। अततत्कालीन वायसराय लार्ड हार्डिंग की अनुमति से सी. एफ. एंड्रयूज और डब्ल्यू.डब्ल्यू. पियर्सन ने 1915 में फिजी की प्रथम यात्रा की, जो पूरी तरह से अशासकीय थी। इनकी रिपोर्ट ने फिजी की औपनिवेशिक सरकार की नीतियों के विरुद्ध एक दमदार आरोप पत्र का रूप धारण कर लिया था।

इसी रिपोर्ट के द्वारा लार्ड हार्डिंग करारबद्ध कुली प्रथा को समाप्त करने के लिए गृह सरकार की स्वीकृति लेने में सफल हुए थे।


फरवरी 1916 ई. को सी. एफ. एंड्रयूज व पियरसन की फिज़ी गिरमिटिया श्रम रिपोर्ट (Indentured Labour In Fiji) जारी की गई थी। इस रिपोर्ट के पश्चात् ही गिरमिटियों की ओर अनेक संस्थाओं और सरकार का ध्यान आकृष्ट हुआ व गिरमिटिया श्रमिकों को मुक्ति मिल पाई थी। इस संदर्भ में एंड्रयूज के व्यक्तिगत प्रयास सराहनीय रहे। 5 अप्रैल, 1940 ई. को कलकत्ता में एंड्रयूज का निधन हो गया।