लोक-साहित्य के अग्रणी विद्वान - भिखारी ठाकुर - Leading scholar of folklore - Bhikhari Thakur
लोक-साहित्य के अग्रणी विद्वान - भिखारी ठाकुर - Leading scholar of folklore - Bhikhari Thakur
सम्पूर्ण उत्तर-पूर्वी भारत विशेष रूप से भोजपुरी भाषा क्षेत्र में अपने बिदेसिया नाटक और गीतों के माध्यम से अपार सफलता अर्जित करने वाले भिखारी ठाकुर का जन्म गंगा, सरजू और सोन के तिमुहानी से पाँच कि.मी. छू दियरा में बसे गाँव कुतुबपुर (सारन) में सन् 1857 में हुआ था। इनका बचपन खेलकूद और चरवाही करने में व्यतीत हुआ । निम्नवर्गीय परिवार में जन्मने के कारण विधिवत् शिक्षा का अवसर न मिला फिर भी रामचरितमानस का पाठ सुनकर इनके भीतर कवित्व शक्ति जाग उठी। ये अपने जातीय कर्म में भी योगदान देते थे । इसी सिलसिले
में समाज के सभी वर्गों के बाहर-भीतर की गुत्थियों को देखने-समझने का मौका इन्हें मिला। बचपन में ही विवाह हो जाने के कारण आर्थिक संतुलन बनाए रखने और रोजी-रोटी कमाने के फेर में ये कलकत्ता चले गए। इसी बीच इनको मेदनीपुर और जगन्नाथपुरी जाने का भी मौका मिला जहाँ इन्होंने 'रामलीला', 'रासलीला', 'जाला' आदि देखे। ये इनसे इतना अधिक प्रभावित हुए कि यही सब इनके जीवन का लक्ष्य बन गया। दीर्घ अवधि के पश्चात् जब ये अपने गाँव पुनः लौटे तो वहाँ इन्होंने कलात्मक रुझान वाले 'नवहियन' की खोज करके एक 'नाच गिरोह' तैयार किया।
इसी सन्दर्भ में इन्होंने समाज में व्याप्त अनेक धार्मिक और सामाजिक समस्याओं पर संवाद एवं गीतों की रचना की। अपने गीतों और लोक नाट्य के माध्यम से सामाजिक समस्याओं को उजागर कर जनता को मनोरंजक डोरी पकड़वा कर जगाने का विलक्षण कार्य भिखारी ठाकुर ने किया। यह नौटंकी कला न केवल इनके जीवन-यापन का आधार बनी अपितु इसके माध्यम से इन्होंने अपने प्रगतिशील विचार जनमानस तक पहुँचाए ।
सन् 1835 से 1955 के समाज की समस्याओं का सूक्ष्म अध्ययन करके भिखारी ठाकुर ने नौटंकी के माध्यम से कुछ महत्त्वपूर्ण समस्याओं,
यथा बाल-विवाह, अनमेल विवाह, विधवा-विवाह, औरतों में गहनों के प्रति लगाव, व्यभिचार, अवैध सन्तानों के प्रति सामाजिक नजरिया, आर्थिक तंगी से व्यथित होकर कलकत्ता, बंगाल, असम जैसे अन्य शहरों में नवयुवकों का पलायन, निम्न वर्गों पर बढ़ते अत्याचार, वृद्धों की समस्या तथा अशिक्षा आदि को मार्मिक ढंग से उठाया है। शादी-विवाह जैसे अवसरों पर इनकी नौटंकी का प्रदर्शन होता था जिसे देखने दर्शक 18-20 कि.मी. दूर से भी पैदल चलकर आया करते थे। अपनी सामयिक लोक परम्परा के आधार पर भिखारी ठाकुर ने जिन नाटकों की रचना की,
उन्हें सम्पादित कर 'भिखारी ठाकुर ग्रन्थावली' शीर्षक दो खण्डों में प्रकाशित किया गया । इसमें बिदेसिया, भाई- विरोध, बेटी-वियोग, कलियुग-प्रेम, राधेश्याम बहार, गंगास्नान, विधवा विलाप, पुत्र वध, गवरी चोर और ननद-भौजाई आदि सम्मिलित हैं।
लोक समाज ने भिखारी ठाकुर की कला को अत्यन्त सम्मान दिया। सम्मानस्वरूप उन्हें 'रायबहादुर' का की उपाधि से अलंकृत किया गया। भिखारी ठाकुर की विदेशिया पर फिल्म भी बनाई गई।
स्वयं भिखारी ठाकुर ने सिनेमा में अभिनय किया है। सन् 1971 में 84 वर्ष की उम्र में कुतुबपुर गाँव में उनका देहवासन हो गया । लोकजीवन के महान् चितेरे, 'भोजपुरी के शेक्सपियर' कहे जाने वाले सशक्त नाटककार, भरतमुनि की परम्परा में प्रतिष्ठित होने वाले रंगकर्मी और भोजपुरी काव्यों के अनमोल रत्न भिखारी ठाकुर का जीवन नाटक कविता, गीत और रंगकर्म को अपनाने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देता रहेगा।
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