लोक-साहित्य के अग्रणी विद्वान - डॉ. कृष्णदेव उपाध्याय - Leading scholar of folklore - Dr. Krishnadev Upadhyay

लोक-साहित्य के अग्रणी विद्वान - डॉ. कृष्णदेव उपाध्याय - Leading scholar of folklore - Dr. Krishnadev Upadhyay


डॉ. कृष्णदेव उपाध्याय लोक-साहित्य के उद्भट विद्वान् हैं। उनके हृदय में साहित्य के प्रति सच्चे समर्पण की भावना रही है। इन्होंने प्रारम्भिक शिक्षा सोनवर्षा के प्राइमरी पाठशाला, माध्यमिक शिक्षा तत्कालीन वेस्टेन हाई स्कूल (अब लक्ष्मीराज देवी इंटर कॉलेज) बलिया में और उच्च शिक्षा काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी से प्राप्त की । इन्होंने हिन्दी और संस्कृत में एम० ए० उपाधि प्राप्त की। डॉ. कृष्णदेव उपाध्याय ने लखनऊ विश्वविद्यालय से 'भोजपुरी साहित्य का अध्ययन' शीर्षक विषय पर सन् 1951 में पी-एच.डी. की उपाधि प्राप्त की और हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग से 'साहित्यरत्न' की परीक्षा उत्तीर्ण की।


डॉ. उपाध्याय ने गवर्नमेंट ट्रेनिंग कॉलेज आगरा, लखनऊ गवर्नमेंट डिग्री कॉलेज, नैनीताल और गवर्नमेंट पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेज ज्ञानपुर, वाराणसी के हिन्दी विभाग में सहायक प्रोफेसर के पद पर लगभग 20 वर्ष तक पी.इ.एस. ग्रेड में अध्यापन कार्य किया। सरकारी नौकरी से अवकाश प्राप्ति के उपरान्त ये सन् 1966 में लालबहादुर शास्त्री डिग्री कॉलेज, मुगलसराय में प्रिंसीपल के पद पर कार्यरत रहे। इन्होंने सन् 1971 तक काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में यू.जी.सी. द्वारा मनोनीत प्रोफेसर के रूप में शोधार्थियों के शोध कार्य का निर्देशन किया।

डॉ. उपाध्याय ने तीन बार यूरोप की लोक सांस्कृतिक यात्रा की। सन् 1965 में ये मारबुर्ग (पश्चिमी जर्मनी) में आयोजित जर्मन लोक-साहित्य सम्मेलन में एकाकी भारतीय प्रतिनिधियों के रूप में सम्मिलित हुए। सन् 1966 में ये पश्चिमी जर्मनी के माटिंगन विश्वविद्यालय द्वारा भारतीय लोक संस्कृति विषय पर व्याख्यान देने के लिए विजिटिंग प्रोफेसर के रूप में आमन्त्रित किये गए। इसी समय इन्होंने यूरोप के फ्रांस इंग्लैंड, स्वीत्जरलैंड, हंगरी आदि देशों का परिभ्रमण तथा वहाँ के लोक-साहित्यकारों से मुलाकात की। डॉ० उपाध्याय सन् 1966 में रोमानिया के बुखारेस्ट नगर में आयोजित 'इंटरनेशनल कोन्फ्रेंस फॉर हिन्दी नरेटिव रिसर्च के अधिवेशन में भारतीय सरकार के प्रतिनिधि के रूप में सम्मिलित हुए।

इसी अवसर पर इन्होंने पूर्वी तथा उत्तरी यूरोप के डेनमार्क, नार्वे, स्वीडन, फिनलैंड, चेकोस्लोवाकिया आदि देशों के लोक-साहित्य संस्थानों का निरीक्षण तथा अध्ययन किया। ये सन् 1966 में अमेरिका के इंडिया विश्वविद्यालय द्वारा भारतीय लोक-साहित्य विषय पर भाषण देने के लिए आमन्त्रित किये गए। डॉ. कृष्णदेव उपाध्याय अमेरिका की एशियन हिन्दी लोर सोसाइटी की कार्यकारिणी समिति के सदस्य भी रहे हैं।


डॉ. उपाध्याय को इस उपलब्धि तक पहुँचाने वाले प्रेरणास्रोत इनके ज्येष्ठ भ्राता पद्मभूषण बलदेव उपाध्याय थे।

डॉ. कृष्णदेव उपाध्याय ने लोक-सहित्य पर ही शोध कार्य किया था इनका शोध ग्रन्थ 'भोजपुरी लोक-साहित्य का अध्ययन' शीर्षक से प्रकाशित हुआ है। इनकी पुस्तक 'लोक-साहित्य की भूमिका' हिन्दी में लोक-साहित्य विषय पर उच्च कोटि की पुस्तक कही जा सकती है। इसमें लोक-साहित्य के समस्त मुख्य रूपों, जैसे लोक गीत, लोक गाथा, लोक कथा, लोक नाट्य तथा लोकोक्तियों का विशद् विवेचन है। चूँकि डॉ. उपाध्याय का विशेष अध्ययन भोजपुरी लोक-साहित्य पर है अतः इस पुस्तक में उदाहरण के रूप में भोजपुरी गीतों की ही प्रधानता है। भोजपुरी लोक-साहित्य संकलन से लेकर वर्गीकरण तक के कार्यों में डॉ. उपाध्याय का विशेष योगदान है।

प्रारम्भ में भारत में लोक-साहित्य तथा लोक संस्कृति के संग्रह संरक्षण और शोध कार्य के मध्य समन्वय स्थापित करने वाली कोई संस्था नहीं थी। इस अभाव की पूर्ति के लिए प्रयाग में सन् 1665 में 'भारतीय लोक संस्कृति शोध संस्थान की स्थापना की गई। इस संस्थान के संस्थापक डॉ. ब्रजमोहन व्यास, श्रीकृष्णदास और डॉ. उपाध्याय थे । इन्होंने लोक संस्कृति सम्मेलन का आयोजन किया और लोक-साहित्य के विकास तथा संरक्षण हेतु अथक प्रयास किये।


डॉ. उपाध्याय ने लोकसाहित्य संकलन के साथ लोक-साहित्य के विभिन्न पक्षों पर गम्भीर चिन्तन किया है । लोकसाहित्य पिपासुओं के पठनार्थ एवं परवर्ती अनुसन्धानकर्त्ताओं के मार्गदर्शनार्थ उन्होंने अनेक पुस्तकों की रचनाएँ भी की हैं, जिनमें प्रमुख निम्नलिखित हैं- (1) भोजपुरी लोक गीत, भाग- 1. (2) भोजपुरी लोक गीत भाग 2, (3) भोजपुरी और उसका साहित्य, (4) भोजपुरी लोक-साहित्य का अध्ययन, (5) भोजपुरी लोक संस्कृति, (6) लोक-साहित्य की भूमिका, (7) लोक संस्कृति की रूपरेखा (8) हिन्दी का लोक-साहित्य (हिन्दी साहित्य के बृहत् इतिहास के सोलहवें भाग में राहुल सांकृत्यायन के साथ) ।