लोक-साहित्य के अग्रणी विद्वान - पण्डित रामनरेश त्रिपाठी - Leading scholar of folklore - Pandit Ramnaresh Tripathi
लोक-साहित्य के अग्रणी विद्वान - पण्डित रामनरेश त्रिपाठी - Leading scholar of folklore - Pandit Ramnaresh Tripathi
इनकी प्रारम्भिक शिक्षा गाँव के प्राइमरी स्कूल में हुई। बचपन से ही इन्हें कविता से प्रेम था। मिडिल पास करने के बाद वे अंग्रेजी पढ़ने जौनपुर गए लेकिन हाईस्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद 18 वर्ष की उम्र में पिता से अनबन होने के कारण वहाँ से कलकत्ता चले गए। वहाँ भी ये अधिक समय तक न रह सके। वहाँ उन्हें संग्रहणी रोग हो गया। अर्द्धमृतावस्था में पहुँचने पर स्वास्थ्य सुधार के लिए जयपुर राज्य के सीकर ठिकाना स्थित फतेहपुर ग्राम में सेठ रामबल्लण नेवटिया के पास गए। फतेहपुर में माठा और स्वास्थ्यप्रद जलवायु के सेवन से वे शीघ्र ही स्वस्थ हो गए। इनकी साहित्य-साधना का शुभारम्भ शेखावाटी की उस पुनीत धरा से हुआ।
त्रिपाठीजी के द्वारा लिखित अनेक बालोपयोगी काव्य-संग्रह, सामाजिक उपन्यास और हिन्दी महाभारत आदि पाठक वर्ग में बहुत प्रसिद्ध हुए। सन् 1915 ई. में पण्डित रामनरेश त्रिपाठी प्रयाग आ गए। थोड़ी-सी पूँजी से उन्होंने प्रकाशन का कार्य प्रारम्भ किया। साहित्य के अनेक पथ पर एक साथ चलने वाले वे पहले और अकेले पथिक हैं। उनके द्वारा रचित 'पथिक' खण्ड-काव्य हिन्दी साहित्य का गौरव-ग्रन्थ है। पण्डित रामनरेश त्रिपाठी को जीते-जी कोई राजकीय सम्मान नहीं मिला। किन्तु पाठक वर्ग द्वारा उन्हें और उनकी कृतियों को अपार सम्मान दिया गया।
पण्डित रामनरेश त्रिपाठी ने साहित्य के प्रत्येक पहलू और प्रत्येक विधा पर लेखनी चलाई। मानवतावादी कवि रामनरेश त्रिपाठी कवि, नाटककार, कहानीकार, उपन्यासकार, कोशकार, टीकाकार, सम्पादक, व्यंग्य-लेखक, आलोचक, चरित्र लेखक, शिक्षक, इतिहास लेखक, संग्रहकर्त्ता, सूक्तिकार, वैयाकरणिक, भाषाविद्, यात्रावृत्ताकार तो थे ही, साथ ही उन्होंने संगीत, विज्ञान, अनुवाद, संस्कृत, राजनीति एवं ग्राम-जीवन से सम्बन्धित रचनाएँ भी की। उनकी रचनाओं का राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक एवं साहित्यिक दृष्टि से बड़ा महत्त्व है ।
बाल साहित्य के वाल्मीकि रामनरेश त्रिपाठी ने राष्ट्र की अनेक भाषाओं, यथा मराठी, राजस्थानी, गुजराती, बंगाली आदि में रचनाएँ की कविता-कौमुदी के सात भाग संकलित कर वे अक्षय यश के अधिकारी हुए । सौन्दर्योपासक एवं स्वच्छता के प्रेमी कवि रामनरेश त्रिपाठी का मुखमण्डल गम्भीर एवं दूरदर्शितापूर्ण लगता था। उनकी वाणी में वशीकरण मंत्र की सी शक्ति थी। वे अपने अन्तर्भेदनी दृष्टि से मनुष्य के स्वभाव की परख तत्काल ही कर लिया करते थे। सुन्दरता और सुरुचि से उनका सहज स्नेह था। 13 जनवरी 1961 को हिन्दी साहित्य सम्मेलन की ऊपरी मंजिल के कक्ष में इनका देहान्त हुआ।
स्वाध्याय और देशाटन के द्वारा त्रिपाठीजी ने जो ज्ञान प्राप्त किया वह उनकी रचनाओं में दिखाई देता है। लोक-साहित्य के संकलन में इन्होंने अथक श्रम किया। वास्तव में उनका श्रम बड़ा कष्टसाध्य था जो परवर्ती अनुसन्धानकर्त्ताओं हेतु अनुकरणीय है। बीसवीं शताब्दी के तृतीय दशक में त्रिपाठीजी ने लोक-गीतों के संग्रह का कार्य प्रारम्भ किया। बड़े श्रम के साथ भारत के विभिन्न प्रान्तों की यात्रा अनेक वर्षों तक कर हजारों-हजार लोक- गीतों का संकलन किया । सन् 1926 में इन्होंने 'कविता कौमुदी' के पाँचवे भाग के रूप में ग्रामीण गीतों का प्रकाशन किया जिसमें उत्तरप्रदेश तथा पश्चिम बिहार के लोक-गीतों का संकलन है। त्रिपाठी जी ने लोक गीतों का संकलन बड़ी निष्ठा एवं लगन के साथ किया और उन्हें वर्गीकृत करके पाठकों के सम्मुख रखा। उन्हें लोक-साहित्य
के संकलनकर्त्ताओं में मील का पत्थर कहा जाय तो अतिशयोक्ति न होगी। उनका योगदान के लोकसाहित्य के लिए किये गए कार्यों में प्रथम सोपान है।
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