हिन्दी प्रदेश के लोक-साहित्य के अध्ययन की सीमाएँ - Limitations of study of folk literature of Hindi region
हिन्दी प्रदेश के लोक-साहित्य के अध्ययन की सीमाएँ - Limitations of study of folk literature of Hindi region
लोक-साहित्य का आशय है, 'वह साहित्य जिसे लोक ने रचा।' मानव-समाज के उद्भव काल से ही लोक-साहित्य का रचनाकाल माना जाना चाहिए। यह लोक भावाभिव्यक्ति है अर्थात् इसका सीधा सम्बन्ध भावनाओं से है, बौद्धिकता या विचारों से नहीं। इसीलिए जब से मानव का अस्तित्व बना तब से उसकी भावनाएँ भी बनीं और भावनाओं के साथ ही लोक-साहित्य रचा गया होगा। स्पष्ट है कि मानव समाज और लोक-साहित्य की उत्पत्ति साथ-साथ हुई है। विदेशों में आभिजात्य वर्ग ने इस साहित्य को असंस्कृत समाज की अभिव्यक्ति कहा है ।
इसीलिए विदेशों में लोक संस्कृति और लोक सभ्यता जैसे शब्दों का जन्म हुआ। यदि इसे स्वीकार भी लिया जाय तब भी स्वतः सिद्ध है कि लोक संस्कृति अति-आदिम, गम्भीर एवं मनुष्य की जड़ों की ओर ले जाने वाला साहित्य है। वस्तुतः लोक साहित्य हमारे अंतस का बेबाक उजास है।
समूचे जनमानस की मनोवृत्ति का अध्ययन एक पैमाने पर करना अत्यन्त दुकर कार्य है। लोक की व्याप्ति विस्तृत है । प्रयत्नसाध्य होकर भी इसे जानना सामान्य नहीं है तथापि इसके स्वरूप का अनुमान भर लगाया जा सकता है।
लोक शब्द एक मानव से दूसरे मानव की रागात्मकता का परिचय है और इसकी यही विशेषता इसके अध्ययन की सीमाएँ है।
लोक की वाणी और धरती का पानी कोस-दर-कोस बदलता हुआ दिखाई देता है। काव्यशास्त्र के सिद्धान्तों के आधार पर इसका अध्ययन करना बड़ा दुष्कर है। इसके अध्ययन के लिए आवश्यक है कि अध्ययनकर्त्ता जन-जन की संस्कृति में रच-बस जाए जो किसी भी कालिक अध्येता के लिए कठिन कार्य है। श्रीराम शर्मा के शब्दों में कहें तो "लोक शब्द उस विशेष जनसमूह का वाचक है जो साज-सज्जा, सभ्यता, शिक्षा,
परिष्कार आदि से छू आदिम मनोवृत्तियों के अवशेषों से युक्त परिधि को समाविष्ट करता है ।" लोक-साहित्य को ग्राम साहित्य तक सीमित कर देना समीचीन नहीं है। इसकी व्याप्ति कस्बों, शहरों और महानगरों तक है। लोक की यात्रा जहाँ-जहाँ तक हुई है वहाँ वहाँ तक यह संस्कृति विस्तृत हुई है। आज बड़े-बड़े महानगरों में भी लोक-गीतों द्वारा लोग अपना मनोरंजन करते हैं क्योंकि लोक संस्कृति लोक के साथ संचरित होती है। वह कहीं स्थायी रूप से विराजमान नहीं रहती । वर्तमान संक्रमण काल में लोक-साहित्य का अध्ययन करना और भी अधिक दुर्गम है। वैज्ञानिक उपकरणों ने बाजार के माध्यम से लोक-संस्कृति में घुसपैठ की है।
शहरी चकाचौंध के प्रभाव से कहीं भी, कुछ भी अछूता नहीं रह गया है। लोक के अध्ययन में यह एक विकट समस्या है क्योंकि ऐसे में लोक-साहित्य की मौलिकता पर ही प्रश्न चिह्न लग सकता है।
डॉ. श्याम परमार का मानना है कि "हिन्दी का 'जन' शब्द 'लोक' का पर्यायवाची है। जन या ग्राम यद्यपि 'लोक' के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं तथापि अपने सीमित क्षेत्र के कारण उन्हें लोक की व्यापकता के अनुरूप नहीं मानना चाहिए। जन एक प्राचीन शब्द है। संस्कृत एवं पालि ग्रन्थों में मानव समाज का बोध जन से ही कराया गया है।
इस दृष्टि से लोक और जन में पर्याप्त असमानता है पर प्रयोग और परम्परा के प्रचार में आधुनिक हिन्दी की अनुरूपता के लिए 'लोक' ही अधिक उपयुक्त एवं प्रतिबिम्बात्मक है। न केवल इतना ही बल्कि पूर्व संस्कारों के कारण वह 'जन' से कहीं अधिक विशाल स्तर का स्पर्श करता है।" इस दृष्टि से लोक-साहित्य समूचे मानव- समाज का बोध कराता है। इसके माध्यम से देश का वास्तविक इतिहास, समाज, शासन व्यवस्था, समाज के भीतर विद्यमान कुरीतियों का अध्ययन किया जा सकता है। यहाँ तक कि निरक्षर कही जाने वाली स्त्रियों के लोक- गीतों में उनके अन्तर्मन को बखूबी समझा जा सकता है। आवश्यकता है कि लोक-साहित्य के प्रति संकुचित सोच को त्याग कर गहरी संवेदना वाले लोग इस क्षेत्र में प्रवृत्त हों और वे अपने समाज का सच्चा स्वरूप लिपिबद्ध करें।
वार्तालाप में शामिल हों