भारतेन्दु की कविताओं में अभिव्यक्त राष्ट्रीय भावना - National feeling expressed in the poems of Bhartendu
भारतेन्दु की कविताओं में अभिव्यक्त राष्ट्रीय भावना - National feeling expressed in the poems of Bhartendu
भारतेन्दु की कविताओं में अभिव्यक्त राष्ट्रीय भावना को समझने से पूर्व राष्ट्रीय भावना के अर्थ व स्वरूप को समझना आवश्यक है। राष्ट्रीयता एक ऐसी विचारधारा है जो आधुनिक समाजों के एकीकरण को सम्भव बनाती है तथा समाज के विभिन्न वर्गों की वफादारी राष्ट्रीय राज्य के लिए अर्पित करती है। 'नेशन' के रूप में राष्ट्र शब्द की उत्पत्ति लैटिन के 'नेसियो' (Natio) शब्द से हुई, जिसका मूल अर्थ है 'जाति'। 16-17वीं शती में 'नेशन' शब्द उस देश या राज्य की आबादी का सूचक था, जिसमें जातीय एकता या समानता पाई जाती थी ।
19वीं सदी में राष्ट्र एवं राष्ट्रीयता की अवधारणा में व्यापक परिवर्तन दृष्टिगोचर होता है। ए. आर. देसाई के अनुसार "राष्ट्रों के रूप में जनसमुदायों का एकीकरण दीर्घकालीन ऐतिहासिक प्रक्रिया की परिणति है ।" दिसाई, ए.आर., भारतीय राष्ट्रवाद की सामाजिक पृष्ठभूमि, पृष्ठ 2) राष्ट्रीयता प्रत्येक देश की उन्नति का अनिवार्य तत्त्व है। राष्ट्र के निवासियों में राष्ट्रीयता की अखण्ड भावना ही राष्ट्र के विकास को अभिप्रेरित करती है तथा उसके विकास का मार्ग प्रशस्त करती है।
भारतेन्दु के सृजन में राष्ट्रीय भावना का स्वरूप सांस्कृतिक और राजनैतिक दो आयामों से जुड़कर विकसित हुआ । इसमें राष्ट्रभक्ति का स्वर राजभक्ति के साथ समन्वित होकर आता है।
1857 के स्वतन्त्रता-संग्राम के प्रति उनकी प्रतिक्रिया राजभक्ति का पोषक बन जाती है। वस्तुतः भारतेन्दु ऐसा करने के लिए विवश थे, क्योंकि सैनिक विद्रोह की असफलता को वे देख चुके थे। इसीलिए उन्होंने राजभक्ति और राष्ट्रभक्ति दोनों के समन्वित मार्ग को अपनाना अधिक उचित समझा। लेकिन उनकी विशेषता यह है कि वे भारतवासियों को उन्नति की प्रेरणा और स्वाधीनता का सन्देश देते चलते हैं। स्पष्ट है कि उनकी राजभक्ति के मूल में देशभक्ति का सूत्र अनुस्यूत है । इस तरह भारतेन्दु ने अंग्रेजों की स्तुतियों या प्रशस्तियों में भी प्रसंगतः भारत के महिमामय अतीत, दुर्दशाग्रस्त वर्तमान और मंगलमय भविष्य की व्यंजना की है।
रामविलास शर्मा का मत सही है कि "राजभक्ति का स्वर भारतेन्दु युग का मूल स्वर नहीं है किन्तु इसके साथ ही यह भी सच है कि "भारतेन्दु में राजभक्ति और देशभक्ति दोनों समानान्तर चलती हैं, जिसका सबसे अच्छा प्रमाण उनकी निम्नलिखित दो पंक्तियाँ हैं-
अंगरेज राज सुख साज सजे सब भारी । पै धन बिदेस चालि जात इहैं अति ख्वारी ॥
वस्तुतः भारतेन्दु की कविताओं में राजभक्ति और राष्ट्रभक्ति दोनों का स्वर साथ-साथ सुनाई पड़ता है। इसके बावजूद "भारतेन्दु की देशभक्ति को सन्देह की दृष्टि से नहीं देखा जा सकता।
उन्होंने कविता में जिस स्वच्छन्दता और राष्ट्रीयता की नींव डाली, उसी का विकास आगे चलकर कथित द्विवेदी युग से लेकर कथित उत्तर छायावादी कवियों तक में होता है। "b
भारतेन्दु ने अंग्रेजी राज का खुलकर विरोध नहीं किया। इसका एक बड़ा कारण था अंग्रेजों की दमनकारी नीति । ऐसा करने पर प्रतिबन्धित किए जाने और जेल में डाले जाने का प्रावधान था। उन्होंने महारानी विक्टोरिया, प्रिंस ऑफ वेल्स और लार्ड रिपन आदि से सम्बन्धित जो कविताएँ लिखीं उनका उद्देश्य देश की दीन दशा के प्रति उनका ध्यान आकृष्ट करना था।
इन कविताओं में अनेक स्थलों पर स्तुति और याचना का भाव दिखाई पड़ता है। इसका कारण यह है कि 1857 के विद्रोह के उपरान्त महारानी विक्टोरिया ने 1858 में एक घोषणा पत्र जारी किया। यह घोषणा पत्र बेहतरी की उम्मीद जगाने वाला था। इसके विपरीत भारतीय राजाओं और नवाबों के आलसीपन और शोषणकारी नीतियों से जनता की दशा दयनीय बनी हुई थी। अनेक सामाजिक और धार्मिक बुराइयों से समाज जकड़ा हुआ था। ऐसे में महारानी विक्टोरिया के शासन से जनता के हित की उम्मीद भारतेन्दु की चेतना में थी। नयी तकनीक और ज्ञान-विज्ञान के नये-नये आयाम नयी आशा जगाने वाले थे।
उम्मीदों का यह क्रम लार्ड रिपन के आगमन तक चलता रहा।
भारतेन्दु देश की दयनीय दशा के प्रति पीड़ा और सुधार की उम्मीद भरी गुहार महारानी से लगाते रहे और हित रक्षा की कामना करते रहे। ऐसे में भारतेन्दु की कविताओं में मिलने वाला राष्ट्रभक्ति का स्वर उनकी राजभक्ति के स्वर में घुल मिल जाता है। शिवकुमार मिश्र ने लिखा है- "जहाँ तक भारतेन्दु की राष्ट्रभक्ति का सवाल है वह भी काफी अर्से तक ऐसी राष्ट्रभक्ति है, जिसमें देश- दशा के प्रति पीड़ा, देशवासियों की दार्ति पर क्षोभ और अवसाद, देशोद्धार की वास्तविक चिन्ता, देश के रूढ़ि जर्जर स्वरूप पर खेद और आक्रोश, अपनी परम्परा पर गर्व, अपनी राष्ट्रीय अस्मिता को पाने की ललक तथा प्रगति के नये रास्तों पर देश को ले जाने की चिन्ता,
पराधीनता तथा आर्थिक शोषण से उसकी मुक्ति की प्रबल आकांक्षा और उसके लिए किये गए प्रयास आदि तो हैं, परन्तु सब राजराजेश्वरी के संरक्षण में हो सकेगा इस बात का भोला विश्वास भी है। "7
भारतेन्दु का यह 'भोला विश्वास' अन्ततः टूटा और उन्हें यह विश्वास हो गया कि अंग्रेजी सत्ता से देशोद्धार की उम्मीद बेमानी है। 'विजय वल्लरी' (सन् 1881) और 'विजयनी विजय वैजयन्ती' (सन् 1884) में उनके इस बोध की अभिव्यक्ति है। 'विजय वल्लरी' अफगान युद्ध के बाद लिखी रचना है तो 'विजयिनी विजय वैजयन्ती' मिश्र विजय के बाद। इन दोनों ही रचनाओं में देश की दुर्दशा का चित्रण है लेकिन इसके उद्धार हेतु महारानी विक्टोरिया से अनुनय नहीं है। इनमें अंग्रेजी शासन तन्त्र की चालबाजियों और झूठे आश्वासनों की पोल खोली गई है।
वस्तुतः भारतेन्दु की राष्ट्रीय चेतना एक ओर देश की दुर्दशा का यथार्थ चित्रण करती है, दूसरी ओर देश के गौरवपूर्ण अतीत का स्मरण करती है तो तीसरी ओर अंग्रेजी शासन की भारत विरोधी नीतियों की आलोचना करती है । भारतेन्दु अंग्रेजों की षड्यन्त्रकारी नीतियों को किस ढंग से उद्घाटित करते हैं इसका एक उदाहरण भारत दुर्दशा से अवलोकनीय है-
मरी बुलाऊँ देश उजाड़, महँगा करके अन्न । सबसे ऊपर टिकस लगाऊँ, धन है मुझको धन्य मुझे तुझ सहज न जानो जी, मुझे एक राक्षस जानो जी ॥
यहाँ राक्षस और कोई नहीं, अंग्रेज शासन है। 'नये जमाने की मुकरी में भी यह भाव अभिव्यक्त हुआ है-
भीतर भीतर सब रस चूसे। हंसि-हँस के तन मन धन मूसे जाहिर बातन में अति तेज क्यों सखि सज्जन नहीं अंगरेज ॥'
इस तरह भारतेन्दु ने ब्रिटिश शासन व्यवस्था की शोषणकारी आर्थिक नीतियों को इस मुकरी के माध्यम से उजागर किया है।
भारतेन्दु की राष्ट्रीय चेतना का दूसरा आयाम है 'देश की दुर्दशा का यथार्थ अंकन ।' वे दुखी होकर - 'भारत दुर्दशा' में कहते हैं-
अहू सब मिलिकै आवहु भारत भाई। हा हा ! भारतदुर्दशा न देखी जाई ॥ 10
भारत की दुर्दशा का चित्रण उन्होंने 'प्रबोधिनी' कविता में इस प्रकार किया है-
गयो राज धन तेज रोष बल ज्ञान नसाई
बुद्धि वीरता श्री उद्दाह सूरता बिलाई । आलस कायरपनों निरूद्यमता अब छाई रही मूढता बैर परस्पर कलह लराई ॥"
राज, शक्ति, ज्ञान, वीरता और समृद्धि से हीन भारतीय समाज को वे फटकारते भी हैं और एक जुट होकर उद्यम हेतु प्रेरित भी करते हैं। भारतेन्दु देश की दुर्दशा के लिए अंग्रेजों को, हमारी सामाजिक-धार्मिक रूढ़ियों को, देश की जनता की अकर्मण्यता, आलस्य, झूठ दिखावा और कायरता को मानते हैं। देश की वर्तमान दुर्दशा से आहत होकर वे अपने गौरवशाली अतीत का स्मरण करते हैं। महापुरुषों को बार-बार आमन्त्रण देते हैं और अनेक बार तो वे देश की दशा को सुधारने के लिए ईश्वर से प्रार्थना करते हैं। 'नील देवी' नाटक में वे कहते हैं-
हाय सुनत नहि निठुर भए क्यों, परम दयाल कहाई । सब विधिं बुड़त लखि निज देसहि लेहु न अबहु बचाई। 12
भारतेन्दु ने राम, चाणक्य, चन्द्रगुप्त, विक्रमादित्य, अर्जुन, भीम आदि सभी महापुरुषों का स्मरण किया है। 'प्रबोधिनी' कविता की ये पंक्तियाँ महत्त्वपूर्ण हैं-
कह गए विक्रम भोज राम बलि कर्ण युधिष्ठिर चन्द्रगुप्त चाणक्य कहाँ नासे करि के स्थिर । कहँ क्षत्री सब मरे जरे सब गए कितै गिर कह राज को तीन साज, जेहि जानत है चिर ॥
स्पष्ट है कि भारतेन्दु की कविताओं में राष्ट्रभक्ति का स्वर प्रधान है।
वे राजभक्ति की ओट में निर्बाध रूप से अपनी राष्ट्रभक्ति की अभिव्यक्ति करने में सफल रहे हैं। वे देश की यथार्थ दुर्दशा का चित्रण भी करते हैं और उसके कारणों का उल्लेख भी करते हैं। वे देश की दयनीय दशा से आहत हैं लेकिन उन्हें अपने गौरवशाली अतीत से प्रेरणा भी मिलती है। उनकी कविता राष्ट्रीय अस्मिता की पड़ताल की कविता है और वे 'हिन्दी की जातीय परम्परा के संस्थापक' 14
भारतेन्दु की राष्ट्रभक्ति विषयक रचनाओं में प्रमुख पाँच अंग है देश के उज्ज्वल अतीत पर गर्व, वर्तमान दुर्दशा पर क्षोभ, एकता पर बल,
भविष्य के लिए मंगल आशा, भाषाकीय उन्नति पर बल और उद्बोधन । भारतेन्दु केवल अपने गौरवपूर्ण अतीत का स्मरण ही नहीं करते अपितु पूरे भारतीय समाज को एकता के सूत्र में बाँधना चाहते हैं। उनका दृष्टिकोण पूरी तरह भारतीय था। वे जातीय मतभेद को छू करना चाहते थे। यह हिन्दुओं और मुसलमानों को नजदीक लाकर ही किया जा सकता था। "15 उनका मत है कि एकता के बिना इस देश का कभी उद्धार नहीं हो सकता । एकता राष्ट्रीय उन्नति का अनिवार्य अंग है। वे उद्बोधन देते हुए कहते हैं -
फूट बैर को दूरि करि बाँधि कमर मजबूत । भारतमाता के बनो भ्राता पूत सपूत ॥ 16
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