लोक नाट्यों का उद्भव एवं विकास - Origin and development of folk dramas
लोक नाट्यों का उद्भव एवं विकास - Origin and development of folk dramas
मानव सृष्टि के प्रारम्भ में आंगिक चेष्टाओं के द्वारा अपने मनोभावों को सम्प्रेषित करना मनुष्य का लोक नाट्य की तरफ उठता हुआ पहला कदम था। सामाजिकता के विकास ने उसे मनोरंजन की तरफ उन्मुख किया। आंगिक चेष्टाओं में अभिनय ने स्थान पा लिया। वह सामाजिक विद्रूपताओं को भी समझने लगा व धीरे-धीरे उसने इन विद्रूपताओं को अभिनय में उतारते हुए मनोरंजन करना प्रारम्भ कर दिया। इस तरह मानव चेतना के विकास तथा मनोरंजन की इच्छा के कारण लोकनाट्यों के आदिरूप का सृजन हुआ।
भारतीय परम्परा में यह भी आम मान्यता रही है कि वेद पाठ से वंचित मानव जाति हेतु स्वयं ब्रह्माजी ने पाँचवे वेदस्वरूप नाट्य-वेद का सृजन किया है। विश्व के समस्त विद्वान् इस बात से सहमत है कि हजारों वर्षों की परम्परा से विकसित इन लोक-नाट्यों की शुरुआत किसी-न-किसी धार्मिक भावना या चेतना के फलस्वरूप ही हुई है।
डॉ. वेदपाल खन्ना के अनुसार "संसार के प्रायः सभी देशों में नाटक के आदिरूप का उदय किसी-न- किसी धार्मिक भावना अथवा चेतना के फलस्वरूप हुआ है।
वीर पूजा की भावना धार्मिक उपदेश आदेश, जो कि प्रायः प्राणिमात्र के हृदय में किसी-न-किसी अंश में निहित रहता है, धीरे-धीरे नाटक का रूप धारण कर लेता है। यद्यपि अपने आदिरूप में यह नाटक बड़ा ही साधारण और अपरिमार्जित होता है।"
ज्यों-ज्यों सभ्यता एवं संस्कृति का विकास हुआ त्यों-त्यों मनुष्य भी धीरे-धीरे अपनी भावनाओं की सभ्य रूप में संयमित अभिव्यक्ति करने लगा। यह संयत अभिव्यक्ति ही लोकनाट्यों व नाट्यों के शुरुआती आदिस्रोत माने जा सकते हैं।
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