लोकोक्तियों का उद्भव और विकास - Origin and development of proverbs
लोकोक्तियों का उद्भव और विकास - Origin and development of proverbs
लोकोक्तियों की रचना जीवन की वास्तविक घटनाओं और मनुष्य की निरीक्षण क्षमता पर आधारित होती है। इनकी उत्पत्ति कब और किसके द्वारा हुई ? इस सन्दर्भ में कुछ भी निश्चित तौर पर कह पाना कठिन है। डॉ० कन्हैयालाल के शब्दों में कहा जा सकता है कि "लोकोक्तियाँ जन-समुद्र के बिखरे हुए रत्न हैं। किसने ये रत्न बिखरे ! इस सम्बन्ध में निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता, किन्तु बहुत सम्भव है कि कहावतों का प्रथम उत्स मनुष्य के मन में तभी उत्सारित हुआ होगा जब उसकी प्रत्यक्ष अनुभूति अपने सरस वेग के साथ सहज भाषा मैं निस्सृत हुई होगी।"
लोकोक्ति-कोश में लोकोक्ति के उद्भव के तीन प्रमुख कारण वर्णित किये गए हैं- "कुछ लोकोक्तियाँ घटना- विशेष से उत्पन्न होती हैं, कुछ इतिहास - विशेष के संस्कार से निकलती हैं और कुछ नित्य के व्यवहार से ।" उक्त कारणों के अतिरिक्त कुछ विद्वानों ने 'प्राज्ञ वचन' को भी लोकोक्ति की उत्पत्ति के कारणों में स्वीकार किया है। घटना विशेष से उत्पन्न लोकोक्तियों के उदाहरण इस प्रकार हैं-
मन चंगा तो कठौती में गंगा ।
करम को लेख नाय मिटे।
पर तिरिया की प्रीति, और सूली कौ चढ़िबाँ ।
जान अजाई जाति ऐ औ बेकर कौ मरिबौ ।
उक्त लोकोक्तियों के मूल में अवश्य ही कोई घटना या कथा रही है किन्तु समय बीतने के साथ कहानी या घटना विस्मृत हो गई जबकि सम्बन्धित लोकोक्ति लोकप्रसिद्ध होकर आज भी समान अवसरों पर लोकव्यवहार में प्रयुक्त की जाती है।
इतिहास-विशेष के संस्कार से उत्पन्न लोकोक्तियों में ऐतिहासिक घटना पर आधारित उक्तियाँ इस प्रकार हैं-
अंग्रेजी राज, पहिरवे कूँ कपड़ा न खाइबे कूँ अनाज ।
मालै मरि गोरिदा, भूखे मरे किसान।
उक्त लोकोक्तियाँ अंग्रेजी शासनकाल में भारतीय जनता की दुर्दशा को प्रकट करती हैं। लोकोक्ति की उत्पत्ति का मूल आधार दैनिक अनुभव ही है। एक ही अनुभव बार-बार देखने को मिलता है तब लोक कण्ठ से किसी उक्ति का जन्म स्वाभाविक है। यही उक्ति लोकप्रसिद्ध हो लोकोक्ति बन जाती है। उदाहरण द्रष्टव्य हैं-
अधजल गगरी छलकत जाय।
सौ दवा की एक दवा प्रातै घूमै और खावै हवा ।
'प्राज्ञ वचन' से तात्पर्य किसी विद्वान् के द्वारा प्रयुक्त उस सूक्ति से है, जो जनसाधारण में प्रिय और प्रसिद्ध होकर लोकोक्ति रूप धारण कर लेती है। उदाहरणार्थ-
होइ है सोई जो राम रचि राखा ।
पर उपदेश कुशल बहुतेरे ।
समग्रतः कहा जा सकता है कि लोकोक्ति का निर्माण किसी व्यक्ति-विशेष ने एकान्त में बैठकर नहीं किया। यह तो जीवन के प्रत्यक्ष अनुभवों का ज्ञान है जो सूक्ष्म निरीक्षण और सामान्य बुद्धि के योग से संक्षिप्त और लयात्मक उक्ति के रूप में अभिव्यक्त हो गया है। समय के साथ उक्ति-निर्माता का व्यक्तित्व इतना लोकमय हो गया कि व्यक्ति उक्ति लोकोक्ति हो गई।
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