पहेलियों का उद्भव और विकास - Origin and development of riddles

पहेलियों का उद्भव और विकास - Origin and development of riddles


पहेलियाँ लोक मानस की पुरातन अभिव्यक्ति स्वीकार की जाती हैं किन्तु इन्हें लोक गीत या लोक कथा जितना पुराना नहीं मान सकते। इसका कारण यह है कि लोक गीत या लोक कथा हृदय के सहज-सरल उद्गार होते हैं जबकि पहेली में बुद्धि का जटिल प्रयोग होता है। अतः मानव में बुद्धि के विकास के साथ ही पहेली का प्रचलन हुआ होगा। फ्रेजर का कथन है- "पहेली का उदय उस समय हुआ होगा जब किन्हीं कारणों से वक्ता को किसी बात को स्पष्ट शब्दों में कहने में किसी प्रकार की अड़चन हुई होगी।

अतः अपने ज्ञान को रहस्यात्मक रूप में कह कर उसने दूसरों की बुद्धि परीक्षा की होगी और उसके साथ ही मनोरंजन भी हुआ होगा।"


पहेलियों में हमें आदिम मानव की विकास-यात्रा सहज ही दिखाई देती है। इनमें मनुष्य के चातुर्य, रहस्य- भावना और दृष्टि-सौन्दर्य का अद्भुत समन्वय दिखाई पड़ता है। प्रकृति और जीवन के विविध रहस्यों ने मनुष्य को प्रभावित किया और उसकी जिज्ञासु प्रवृत्ति ने उन्हें पहेली रूप दे दिया। अतः कहा जा सकता है कि पहेली में छोटी-छोटी समस्याओं को प्रस्तुत कर मनुष्य को जीवन की कठिनाइयों से संघर्ष करने के लिए प्रेरित करने की अद्भुत क्षमता होती है।

अपनी इसी विलक्षण क्षमता के कारण पहेली आज भी निरन्तर विकासोन्मुखी है । वर्तमान में गणित पहेली, वर्ग पहेली के रूप में इनका पर्याप्त महत्त्व है जबकि परम्परागत रूप में आज भी विशिष्ट अवसरों पर इनका प्रयोग एक प्रथा की तरह किया जाता है। जैसे भोजपुरी प्रदेश में विवाह के समय वैवाहिक विधि के बाद जब वर 'कोहिवर' में प्रवेश करता है तब घर की सियाँ उससे पहेली पूछती हैं जिसे 'छेका' कहते हैं। पहेली के समाधान के बाद ही वर घर के भीतर प्रवेश कर पाता है अन्यथा नहीं। इस प्रकार स्पष्ट है कि पहेलियाँ लोक-साहित्य ही नहीं वरन् लोक परम्पराओं का भी अभिन्न अंग हैं।