लोक गाथाओं की उत्पात्ति - origins of folklore
लोक गाथाओं की उत्पात्ति - origins of folklore
समग्र लोक-साहित्य को आदिम साहित्य के अन्तर्गत स्वीकार किया जाता है। लोक गाथाएँ भी इसका अपवाद नहीं है। इनके सृजन में समग्र समाज का योगदान है। अतः व्यक्ति विशेष को इसका रचनाकार स्वीकार नहीं किया जाता है। यह तो युगों से चली आ रही सामुदायिक साधना से प्राप्त पुण्य है। अतः इनकी उत्पत्ति का स्रोत ढूंढ़ना जटिल कार्य है। इनकी उत्पत्ति के सन्दर्भ में विद्वानों ने विभिन्न सिद्धान्तों को स्वीकार किया है। 'हिन्दी साहित्य का बृहत् इतिहास षोडश भाग' में इसके छह सिद्धान्तों का परिचय दिया गया है, जिनका संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है-
1. ग्रिम का सिद्धान्त समुदायवाद
जर्मनी के प्रसिद्ध भाषाशास्त्रवेत्ता विलियम ग्रिम ने लोक-गाथाओं की उत्पत्ति के सम्बन्ध में जिस सिद्धान्त का प्रतिपादन किया है उसे 'समुदायवाद' के नाम से जाना जाता है। इसके अनुसार लोक गाथाओं की उत्पत्ति किसी एक व्यक्ति की काव्य-प्रतिभा का परिणाम नहीं हैं प्रत्युत इसके निर्माण का श्रेय एक समुदाय को प्राप्त हैं। ग्रिम के अनुसार जिस प्रकार इतिहास का निर्माण व्यक्ति विशेष द्वारा नहीं किया जा सकता, उसी प्रकार महाकाव्य का निर्माण एक व्यक्ति द्वारा सम्भव नहीं है। इस सिद्धान्त के अनुरूप लोक गाथा को परिभाषित करते हुए ग्रिम में लिखा है - "लोक गाथा जनता के द्वारा, जनता के लिए, जनता की कविता है। "
2. लेगल का सिद्धान्त : व्यक्तिवाद
ग्रिम के सिद्धान्त का प्रबल तर्कों से खण्डन करते हुए ऑगस्ट विलहेम श्लेगल ने लोक गाथा की उत्पत्ति का जो सिद्धान्त दिया, उसे 'व्यक्तिवाद' नाम से जाना जाता है। श्लेगल का मत है कि लोक गाथा का रचनाकार कोई एक व्यक्ति ही होता है, जिसे लोकसमाज सहज ही अपना लेता है और अपनी भाव सृष्टि को भी मिला देता है। जिस प्रकार एक भव्य महल के निर्माण में अनेक व्यक्तियों का सहयोग रहता है किन्तु उसमें विशेष कलाकार के व्यक्तित्व की उपेक्षा नहीं की जा सकती। उसी प्रकार लोक गाथा के निर्माण में अनेक व्यक्तियों का सहयोग होते। हुए भी वह मूलतः व्यक्ति विशेष की रचना होती है।
3. स्टेथल का सिद्धान्त: जातिवाद
लोक गाथा की उत्पत्ति के सम्बन्ध में अंग्रेज विद्वान् स्टेंथल द्वारा प्रस्तुत सिद्धान्त को 'जातिवाद' के नाम से जाना जाता है। स्टेंथल के मतानुसार "लोक गाथा न तो किसी व्यक्ति विशेष की रचना है और न ही किसी समुदाय की वरन् यह तो सम्पूर्ण जाति की भावनाओं का सृजनात्मक प्रतिफल है।" जातिवाद सिद्धान्त इस मान्यता पर आधारित है कि किसी जाति विशेष की रूढ़ियाँ, परम्परा, अनुभूति और चिन्तन की दिशाएँ समान होती हैं। इसलिए संस्कारगत समानताओं के कारण एक जाति सहित रूप में लोक गाथा की सृष्टि करती है।
4. विशप पर्सी का सिद्धान्त: चारणवाद
इंग्लैंड के विशप पर्सी के सिद्धान्त के अनुसार लोक गाथा की रचना चारणों या भाटों द्वारा की गई थी। प्राचीनकाल में चारण और भाट अपने आश्रयदाताओं का यशोगान करते हुए काव्य की रचना करते थे। भारत में चारणों द्वारा रचित अनेक लोक गाथाएँ उपलब्ध होती हैं। लोकप्रसिद्ध 'आल्हा' लोक गाथा के मूल लेखक जगनिक हैं जो चन्देलराजा परमर्दिदेव के दरबार में चारण थे। वहीं हिन्दी साहित्य के प्रसिद्ध महाकाव्य 'पृथ्वीराज रासो' के रचयिता चन्दवरदाई भी चारण ही थे।
5. प्रो० चाइल्ड का सिद्धान्त : व्यक्तित्वहीन व्यक्तिवाद
अमेरिकी लोक-साहित्यविद् प्रो. चाइल्ड का मानना है कि लोक-गाथाओं की रचना व्यक्ति विशेष द्वारा ही होती है परन्तु उनमें रचनाकार के व्यक्तित्व का कुछ विशेष महत्त्व नहीं होता है।
वर्तमान में उपलब्ध अनेक लोक गाथाओं के रचनाकारों के नाम नहीं मिलते। कुछ लोक-गाथाएँ रचनाकारों के नाम से भी प्रसिद्ध हैं किन्तु उनमें विभिन्न गायकों द्वारा इतना अधिक परिवर्तन कर दिया गया है कि उनके मूल रचनाकार के व्यक्तित्व का लोप हो गया है। इस प्रकार रचना व्यक्ति विशेष की होकर भी व्यक्तित्व से रहित होकर समाज की कृति बन जाती है परिणामस्वरूप कालान्तर में उसके मूल स्वरूप को प्राप्त करना असम्भव हो जाता है।
6. डॉ० उपाध्याय का सिद्धान्त समन्वयवाद
डॉ. कृष्णदेव उपाध्याय का मानना है कि पूर्व विवेचित सभी सिद्धान्तों में आंशिक सत्य है किन्तु किसी एक सिद्धान्त को पूर्णतया प्रामाणिक नहीं माना जा सकता है।
हमें पाँचों सिद्धान्तों के अन्तर्गत रचित लोक गाथाएँ उपलब्ध होती है। अतः कहा जा सकता है कि व्यक्ति, समुदाय, जाति, चारण आदि सभी लोक गाथा की उत्पत्ति मैं अपना योगदान करते आए हैं। इस प्रकार सभी सिद्धान्तों के सहयोग को स्वीकार करते हुए डॉ. उपाध्याय ने 'समन्वयवाद' के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया है। उनके मतानुसार सभी पाँच सिद्धान्त मिलकर लोक गाथा की उत्पत्ति का कारण है, न कि पृथक्-पृथक् । लोक गाथाओं की उत्पत्ति के सन्दर्भ में डॉ. कृष्णदेव उपाध्याय का सिद्धान्त अधिक समीचीन प्रतीत होता है, क्योंकि पृथक् सत्ता के रूप में कोई एक सिद्धान्त समस्त लोक गाथाओं का कारक नहीं हो सकता है।
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