लोक-साहित्य में समान्तरता और प्रसार - Parallelism and Diffusion in Folklore

लोक-साहित्य में समान्तरता और प्रसार - Parallelism and Diffusion in Folklore


लोक ज्ञान, बौद्धिक चेतना, सुसंस्कृत तथा बौद्धिक चेतना वाले मनुष्यों काएक ऐसा समुदाय है जो मानव की आदिम वृत्तियों तथा मान्यताओं की धारा से बहता हुआ नैसर्गिक जीवन जीने में विश्वास रखता है। जिन तत्त्वों के माध्यम से यह लोक अपनी अभिव्यक्ति करता है वह लोक तत्त्व है। यही लोक तत्त्व जिस शब्द-विधान, वाणी- विधान द्वारा व्यक्त होता है और जिसमें लोक मानस की व्याप्ति होती है वह लोक-साहित्य है।


वह साहित्य जिसका सरोकार सहजता, अकृत्रिमता, अनायास रूप से, समूहबद्धता और भाव प्रवणता से है वह लोक-साहित्य है और जिसका सरोकार सचेष्ट, सोद्देश्य,

व्यष्टिनिष्ठ, विचारोत्तेजक, पर व्यक्ति द्वारा रचा जाता है वह जन साहित्य है। एक का रचयिता जनता द्वारा, जनता के लिए है तो दूसरे का रचयिता व्यक्ति है पर वह भी रचता जनता के लिए ही है। डॉ. नामवर सिंह लिखते हैं- "लोक-साहित्य जहाँ जनता के लिए जनता द्वारा रचित साहित्य है, वहाँ जन साहित्य जनता के लिए व्यक्ति द्वारा रचित साहित्य है। अर्थात् वह रचनाकार जिसकी रचित कृति लोकमय ही हो जाती है, जिसे ढूंढना कठिन है, वह लोक-साहित्य है जो माटी की सौंधी सुगन्धयुक्त है। जबकि जन साहित्यकार अपनी रचना के पीछे सचेष्ट रहता है जिसमें उसकी निजता भी रहती है और अपनी रचना के प्रति गौरव का भाव भी रहता है।" इन दोनों रचनाकारों की समान्तरता को निम्नलिखित बिन्दुओं द्वारा व्यक्त किया जा सकता है।