कथानक रूढ़ियाँ अथवा अभिप्राय - plot patterns or motifs

कथानक रूढ़ियाँ अथवा अभिप्राय - plot patterns or motifs


प्रत्येक कलाकृति के मूल में कोई विशेष प्रेरणा रहती है, इसे अभिप्राय कहतते हैं। यह अंग्रेजी शब्द 'मोटिफ' का हिन्दी रूपान्तरण है। लोक-कथाओं का लोक-साहित्य में महत्त्वपूर्ण स्थान है। प्रत्येक देश की लोक कथा उस क्षेत्र विशेष की सामाजिक, सांस्कृतिक दशाओं का प्रतिनिधित्व करती है और वहाँ के जनमानस की छवि को प्रतिबिम्बित करती है। लोक-कथाओं के विस्तृत विवेचन के बाद हम यह कह सकते हैं कि विश्व की अधिकांश लोक कथाओं में एक से रूढ तन्तु मिलते हैं, जिनका अध्ययन करने पर यह ज्ञात होता है कि ये सभी क्षेत्रों में स्वतन्त्र रूप से निर्मित हो सकते हैं। डॉ. कृष्णदेव उपाध्याय ने 'मोटिफ' शब्द की व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया है कि "साधारणतया 'मोटिफ' शब्द का प्रयोग परम्परागत-कथाओं के किसी तत्त्व के लिए किया जाता है,

परन्तु इस बात का स्मरण रखना चाहिए कि परम्परा का वास्तविक अंग बनने के लिए यह तत्त्व ऐसा प्रसिद्ध होना चाहिए कि इसे सर्वसाधारण जनता स्मरण रख सके । अतएव यह तत्त्व साधारण न होकर असाधारण होना चाहिए।" डॉ. सावित्री सरीन ने अतिमानवीय एवं अद्भुत तत्त्वों को कथा के अभिप्राय रूप में स्वीकार करते हुए लिखा है - "अभिप्राय कथा का लघुत्तम तत्त्व है जो परम्परा में स्थिर रूप में रहने की शक्ति रखता है। इस प्रकार की शक्ति रखने के लिए उसमें कुछ असाधारणता और अपूर्वता होनी चाहिए। अभिप्राय कथानक के निर्माण तत्त्व हैं।


परम्परा से प्राप्त और असाधारणता से परिपूर्ण अभिप्रायों का क्षेत्र अत्यन्त व्यापक है।

ये विश्वभर में प्राप्त लोक कथाओं में समान रूप से प्राप्त होते हैं, जिससे समस्त विश्व की लोक कथाओं का तुलनात्मक अध्ययन किया जा सकता है। डॉ. कन्हैयालाल सहल ने अभिप्राय के लिए 'प्ररूढ़ि' शब्द का प्रयोग किया है और उसे अधिक उचित मानते हुए लिखते हैं- "आवृत्ति के साथ-साथ मूल अभिप्राय में कथा को गति देने की शक्ति पाई जाती है। 'प्ररूढ़ि' शब्द में आवृत्ति और गति दोनों का भाव एक साथ पाया जाता है इसलिए 'मोटिफ' के पर्याय के रूप में 'प्ररूढ़ि' शब्द अपनाया जा सकता है।"


प्रस्तुत विवेचन से स्पष्ट है कि अभिप्राय के लिए विभिन्न शब्दों कथातन्तु, कथानक रूढ़ि प्ररूदि आदि का प्रयोग करने वाले समस्त विद्वान् इसके महत्त्व को देखते हुए इसे कथा के मूल तत्त्व के रूप में स्वीकार करते हैं।

यदि कथा में ये मूल तत्त्व नहीं हों तो लोक कथा के निर्माण का महत्त्व नहीं रहेगा। लोक कथा का परम्परागत, सांस्कृतिक और नैतिक रूप अभिप्राय ही है, जो सम्पूर्ण विश्व की लोक कथाओं में समान रूप से पाये जाते हैं और लोक-कथाओं की मूलभूत एकता को प्रमाणित करते हैं। प्रत्येक लोक कथा में एक या अधिक अभिप्रायों का होना आवश्यक होता है। इनके बिना लोक कथा का निर्माण असम्भव है। लोक-कथाओं में अभिप्रायों के महत्त्व को दर्शाता डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल का कथन द्रष्टव्य है- "कहानियों के लिए अभिप्रायों का वैसा ही महत्त्व है, जैसा किसी भवन के लिए ईंट-गारे का अथवा किसी मन्दिर के लिए नाना भाँति की सज्जा से उकरे हुए शिलापट्टों का।" अभिप्राय द्वारा संस्कृति का परम्परित रूप सुरक्षित मिला है।

दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि जैसे वख का निर्माण धागे से होता है, वैसे ही कथा की रचना कथा-तन्तुओं से होती है। अतः लोक-कथाओं के रचना तत्त्वों में इनका प्रमुख स्थान है


देश-देशान्तर की लोक-कथाओं में प्रयुक्त विभिन्न अभिप्रायों को प्रमुख रूप से दो वर्गों में बाँटा जा सकता हैं- 


(i) लोक- विश्वास पर आधारित और (ii) कवि कल्पित ।


कथानक अभिप्रायों के अध्ययन की सुविधा के लिए विभिन्न पाश्चात्य और भारतीय विद्वानों ने इन्हें वर्गीकृत किया है। पाश्चात्य विद्वानों में स्टिथ थामसन का नाम उल्लेखनीय है,

जिन्होंने अभिप्रायों की विस्तृत अनुक्रमणिका प्रस्तुत की है। इस अनुक्रमणिका को डॉ. सत्येन्द्र की पुस्तक 'लोक-साहित्य का विज्ञान' में देखा जा सकता है। इसके अतिरिक्त भारतीय विद्वानों में डॉ. सत्येन्द्र ने 'ब्रजलोक-साहित्य का अध्ययन' में, डॉ० हजारीप्रसाद द्विवेदी ने 'हिन्दी साहित्य का आदिकाल' सम्बन्धी अपने व्याख्यानों में, राजस्थानी लोक-साहित्य के सन्दर्भ में डॉ. कन्हैयालाल सहल ने हरियाणा लोक-साहित्य के सन्दर्भ में तथा डॉ. शंकरलाल यादव ने लोक- कथाओं में प्रयुक्त 'कथानक अभिप्रायों का विस्तृत अध्ययन किया है। भारतीय लोक-कथाओं में प्रचलित अभिप्रायों का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है-


पशु-पक्षियों द्वारा भविष्यवाणी, विश्वासपात्र सहायक पशु-पक्षी, उड़ने वाला घोड़ा, पक्षियों का मानववाणी में बोलना, सर्प का मानव रूप धारण करना,

परी को नग्नावस्था में देखने पर विपत्ति का आना, वर्जना की शर्त तोड़ने पर अनहोनी का होना, जादू से पुनर्जीवन और यौवन प्राप्ति, जादुई छड़ी अथवा वस्त्र से उड़ना, मंत्र शक्ति से किसी को वशीभूत करना, दैत्य के प्राणों की अन्यत्र स्थिति, उड़ते साँप, बोलने या व्यक्त को निगलने वाली गुफाएँ, दैत्य द्वारा रक्षित खजाना, परी-लोक की यात्रा, परियों का स्त्री रूप में आना, विवाह के लिए अद्भुत प्रण अथवा शर्त और परीक्षाएँ, माँगने पर भोजन देने वाली कड़ाही, सौतेली माता का पुत्र विरोध, हाथी द्वारा राजा का चयन करना, हँसने पर फूल झड़ना, परकाया में प्रवेश करना, शिव-पार्वती द्वारा शाप-मुक्ति आदि अनेक अभिप्राय लोक- कथाओं में प्राप्त होते हैं, जो कथा में प्राण तत्त्व की भूमिका निभाते हुए गत्यात्मकता का संचार करते हैं।


छोगे एवं बात बणाव


सामान्यतः वर्णनात्मक घटनाचक्र के कथात्मक रूप-विधान को वार्ता की संज्ञा दी जाती है और सम्पूर्ण कथा-कहानी साहित्य-वार्ता साहित्य के अन्तर्गत रखा जाता है। 'वार्ता' शब्द अपभ्रष्ट होकर या कहें कि लोक जिह्वा में उतरकर 'बात' बन जाता है। राजस्थान में कथा रचना या बात साहित्य की समृद्ध परम्परा मिलती है। लोक कथाएँ या बातें लोकजीवन का अंग बनकर प्राचीनकाल से कथाकारों और जनसाधारण के कण्ठ पर अवस्थित हैं। ये कथाएँ या बातें मौखिक परम्परा से प्राप्त वह विरासत है, जो लोक- -कण्ठ पर विराजित होकर एक कण्ठ से दूसरे कण्ठ पर परम्परा से ध्वनित होते हुए युगों से चली आ रही है। इसी क्रम में 'वाचन' की उत्पत्ति होती हैं।

कथावाचक जिसे कथक्कड़ भी कहते हैं, अपनी विशेष शैली में कथा को रूपाकार देता है। भावना और कल्पना के ताने-बाने से निर्मित इन कथाओं के माध्यम से दिन-भर के कठिन परिश्रम से श्रान्त और जीवन की कठिनाइयों से क्लान्त सर्वसाधारण लोक रात्रिकाल में चौपालों पर एकत्र होकर कथा के वाचन श्रवण से अपना मन बहलाता है। कई कथाएँ लघु रूप होती हैं जो कुछ मिनटों में ही समाप्त हो जाती हैं, तो कई इतनी बड़ी होती हैं. कि कई रातों तक उनका वाचन श्रवण होता है। श्रोता इन लोक-कथाओं को बड़े चाव से सुनता है।


कथक्कड़ बात बनाने की कला में विशेष पारंगत होता है।

वह अपनी विशिष्ट वाचन शैली से श्रोता को प्रतिपल सजग और जिज्ञासु बनाए रखता है, जिससे कथावाचन के लिए अनुकूल वातावरण का निर्माण होता है। कथावाचन के दौरान कथक्कड़ दोहा सोरठा या अन्य लयबद्ध पद्यात्मक उक्तियों का प्रयोग करता है, इन पद्यों को 'छोगे' कहा जाता है । इन छोगों में कहीं सामाजिक विषमता का वर्णन, तो कहीं नीति कथनों की बात हुई है, कहीं अलौकिक और काल्पनिक चित्रों का चित्रण, तो कहीं भले-बुरे का भेद-निरूपण किया गया है, कहीं इन छोगों के कलेवर में कहावतों को स्थान मिला है, तो कहीं कथ्य कथा की वर्ण्य वस्तु से सम्बन्धित बातें कही गई हैं। यहाँ कुछ छोगे उदाहरणार्थ प्रस्तुत हैं-


1. क्रम संवर्द्धक छोगे :


कथा को प्रारम्भ करने से पूर्व श्रोताओं को सचेत करने, हुंकारे की अनिवार्य शर्त रखने और अपनी कथा की सत्यता पर बल देने के लिए इस प्रकार के छोगे का वाचन किया जाता है-


बात भली दिन पाधरा पैर्डे पाकी बोर।


घर भींडळ घोड़ा जिणे, लाडू मरि चोर केई नरसूता केई नर जागे, जागतेड़ा री पागड़ियाँ ढोलिया रै पागे । सूतोड़ा री पागड़ियाँ जागतड़ा लेय भागे, फोरा पतळां रौ डाव नीं लागे ॥ ओक तिल वो ई कांणी, नित उठ कंथर कढ़ावै घाणौ । पाड़ोसण माँगे खळ रो डलौ, कठै री तेलण कठै रौ पळौ ॥


फौज में नगारी बात में हुंकारी हुंकारै री बात प्यारी लागे बात सुणियाँ भाग जागे । भी बात कहणवाळ अर जीवै हुं कारै रौ देणवाळ ॥


2. नैतिक उपदेश प्रधान छोगे :


इन लोगों में नीतिप्रद कथनों की बहुलता होती है। ये सामाजिक दृष्टि से अच्छाई-बुराई सत्-असत् का ज्ञान कराते हैं। इनमें प्राचीन परम्पराओं, सामाजिक मान्यताओं और विश्वासों का विवेचन भी मिलता है। जैसे-


बात साची भली, पोथी बांची भली,


देह साजी भली, बहू लाजी भली, लूवाँ बाजी भली, नौबत गाजी भली, गाय दूजी भली, गवर पूजी भली, जोबन जोड़ी भली, कच्छी घोड़ी भली, मौत मोड़ी भली, मंशा थोड़ी भली, अब केरी भली, माळा फेरी भली, बात साची भली, पोथी बाँची भली ॥


3. जीवन अनुभव सिद्ध छोगे :


इन छोगों में विविध परिस्थितियों से गुजरने वाले व्यक्ति द्वारा अनुभूत ज्ञान का सारपूर्ण विवेचन होता है-


बाप जैड़ा बेटा, रूख जैड़ा टेटा, घड़े जैड़ी ठीकरी, मायड़ जैड़ी डीकरी, झाड़ जैड़ा मूळ धरती जैड़ी धूळ, रूई जैड़ा सूत, माइत जैड़ा पूत, भाखर जैड़ा भाटा, बिरखा जैड़ा लाटा, रूखाँ जैड़ा छोडा, मँडी जैड़ा मोडा


4. प्रसिद्धियाँ प्रतिपादक छोगे :


इन छोगों में लोकप्रसिद्ध व्यक्तियों, वस्तुओं, स्थानों, पशुओं आदि का नामोल्लेख होता है, जिससे श्रोता को सहज ही इनकी जानकारी प्राप्त हो जाती है-


प्रथम पिंड पाणी रौ, देवल तौ आबू रा। हवेलियाँ ती जेसाणे री, गढ़ तौ चित्तौड़ री ॥ ताल तौ भोपाल रौ, मिंदर तौ मथुरा रा नीर तौ गंगाजी री, धीणौ तौ भैंस रौ ॥


उजास तौ सूरज रौ, आदर तौ माया रौ।


बाँण तौ अरजण रौ, तिलक तौ केसर रौ ॥


सला तौ पंचाँ री, ममता तो माँ री 1


5. जनपदीय झाँकी प्रधान छोगे :


इन छोगों में कथाकार जनपद विशेष की भौगोलिक स्थिति और वहाँ की प्रसिद्ध वस्तुओं का उल्लेख करता है, जिससे उस जनपद विशेष की संस्कृति की सुन्द झलक दिखाई देती है -


साळ बखाणू सिंधरी, मूंग मंडोवर देस। झीणौ कपड़ी माळवे, मारू मरुधर देस ॥ बोर मतीरा बाजरी, खेलर काचर खाँण । धान र धीणा धौपटा, बरसाळ बीकाण ॥