श्रीधर पाठक का काव्यगत वैशिष्ट्य - Poetry feature of Sridhar Pathak

श्रीधर पाठक का काव्यगत वैशिष्ट्य - Poetry feature of Sridhar Pathak


राष्ट्र-प्रेम


श्रीधर पाठक ब्रजभाषा और खड़ीबोली हिन्दी दोनों ही भाषाओं के कवि हैं। वे मुख्य रूप से राष्ट्रप्रेम और प्रकृति-सौन्दर्य के कवि हैं। श्रीधर पाठक के राष्ट्रप्रेम की भावना पर भारतेन्दु युग और द्विवेदी युग की काव्य- प्रवृतियों का सम्मिलित प्रभाव दृष्टिगोचर होता है। वे भारतेन्दु की तरह ही निज भाषा के प्रयोग को बढ़ावा देना चाहते हैं। वे इस बात को समझते थे कि निज भाषा की उन्नति के बिना देश की उन्नति नहीं हो सकती है। वे यह भी मानते थे कि निज भाषा से प्रेम के बिना देश-प्रेम की बात अधूरी और झूठी है। निज भाषा के प्रयोग का आह्वान करते हुए वे कहते हैं-


निज भाषा बोलहु लिखहु पढ्हु गुनहु सब लोग करहु सकल विषयन विषै निज भाषा उपयोग।


भारतीय नवजागरण की एक विशेषता उसका दोचित्तापन भी है। यानी उसमें परस्पर विरोधी प्रवृतियों की अवस्थिति है। राजभक्ति और देशभक्ति जैसी परस्पर विरोधी प्रवृतियों की साथ-साथ उपस्थिति को भारतेन्दु युग के अनेक रचनाकारों की रचनाओं में देखा जा सकता है। श्रीधर पाठक की कविता में भी इस प्रवृति को सहज ही देखा जा सकता है। यदि वे एक तरफ देशभक्ति में 'स्वदेश-विज्ञान', 'सुन्दर भारत', 'भारत वन्दना' जैसी कविताएँ लिखते हैं तो दूसरी तरफ राजभक्ति के प्रदर्शन में 'जार्ज वन्दना' जैसी रचना भी करते हैं। श्रीधर पाठक की राष्ट्रीय चेतना की दूसरी विशेषता है, 'द्विवेदीयुगीन कवियों की तरह भारत की प्रकृति और भारत के लोगों से प्रेम करना।'

कवि भारत देश की परिकल्पना एक विराट् पुरुष के रूप में करता है और उसके सौन्दर्य का वर्णन करता है। इस परिकल्पना के बहाने वह अपनी कविता में भारत के पर्वतों, नदियों, वनों, समुद्रों आदि का गुणगान करता है। इस प्रवृत्ति को उनकी अनेक कविताओं में देखा जा सकता है। 'सुन्दर भारत' शीर्षक कविता से एक उदाहरण देखा जा सकता है-


भारत हमारा कैसा सुन्दर सुहा रहा है शुचि भाल पै हिमाचल, चरणों पै सिंधु-अंचल उर पर विशाल- सरिता सित- हीर- हार- चंचल मणिबद्ध नील नभ का विस्तीर्ण पट अचंचल सारा सुदृश्य-वैभव मन को लुभा रहा है। भारत हमारा कैसा सुन्दर सुहा रहा है


ऐसी ही प्रवृति पाठ्यक्रम की एक अन्य कविता 'देश-गीत' में भी देखी जा सकती है जहाँ कवि देश का जय-जयकार करते हुए भी दरअसल उसकी प्राकृतिक सुषमा का बखान करता है -


जय जय शुभ्र हिमाचल-शृंगा, कल-रव-निरत कलोलिनि गंगा,


भानु प्रताप- समत्कृत तेज-पुंज


अंगा, तप-वेश ।


जय जय प्यारा भारत देश |


भारतभूमि की तरह ही भारतवासियों से भी कवि को बहुत प्रेम है। भारतीयों के प्रति कवि का प्रेम उसे दीन-दुखियों की दुर्दशा की ओर ले जाता है। दीन-दुखियों, शोषितों और पीड़ितों की दुर्दशा कवि को समाज सुधार की प्रेरणा देती है। द्विवेदी युग के अन्य कवियों की तरह ही श्रीधर पाठक के देशप्रेम का एक पक्ष समाज-सुधार की प्रवृति है । वे समाज में खियों की स्थिति को लेकर अधिक संवेदनशील रहे हैं। वे विधवाओं की कारुणिक स्थिति से द्रवित होकर बाल विधवा पर कविता लिखते हैं-


अन्धकार अपार व्यापित, कहूँ न दीसत छोर बचे खेवट-हीन किहि विधि, धर्म- नौका-कोर प्रार्थना अब ईश की सब करह कर जुग-जोर दीन बन्धु, सुदृष्टि कीजै बाल-विधवा ओर ॥


अपनी कविता 'जग-निठुराई में भी उन्होंने बाल विधवा की कारुणिक समस्या को उठाया। भारतीय समाज में स्त्रियों की चिन्ताजनक स्थिति का वर्णन करते हुए उन्होंने 'निबल अबला' शीर्षक कविता लिखी और अबलाओं को उबारने का आह्वान किया-


आरति हरन हार भारत, निज-नाम सफल किन कीजै । वेग उबारि निबल अबला गन, सुजस-सुधा-रस पीजै ॥


प्रकृति-चित्रण


आधुनिक हिन्दी कविता में श्रीधर पाठक का प्रकृति-चित्रण बेहद महत्त्वपूर्ण है। श्रीधर पाठक से पहले प्रकृति रीतिवाद के बन्धन में जकड़ी हुई थी।

कवि अपनी शृंगारपरक कविताओं में प्रकृति का उपयोग उद्दीपन और आलम्बन के लिए करते थे। उनकी काव्य-कल्पना में प्रकृति का स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं था। श्रीधर पाठक ने पहली बार प्रकृति को रीतिवाद और शृंगार के बन्धन से मुक्त किया। उनकी प्रसिद्ध कविता 'कश्मीर सुषमा' में इस स्वतन्त्र और स्वायत्त प्रकृति का दर्शन होता है।


प्रकृति यहाँ एकान्त बैठि निज रूप सँवारती । पल पल पलटती भेस छनिक छवि छिन छिन धारति । विमल अम्बु सर मुकुरन मँह मुखबिम्ब निहारति । अपनी छवि पे मोहि आपही तन मन वारति ॥


इन पंक्तियों में प्रकृति के मानवीकरण की प्रवृत्ति को सहज ही पहचाना जा सकता है। लेकिन प्रसंग प्रकृति के अपने सौन्दर्य का ही है। किसी नायक या नायिका के सौन्दर्य के वर्णन के लिए प्रकृति उपमान के रूप सामने नहीं आयी है और न ही किसी शृंगार के प्रसंग में प्रकृति के सौन्दर्य का उपयोग उद्दीपक के रूप में हुआ है। यहाँ प्रकृति स्वायत और स्वतन्त्र है। श्रीधर पाठक ने हिन्दी कविता में प्रकृति को रीतिवादी आलम्बन उद्दीपन से मुक्त करके मानव जीवन की सहचरी बनाया। उन्होंने प्रकृति-वर्णन की आलंकारिक और आडम्बरपूर्ण भाषा का त्याग करके उसे जीवन की सहज भाषा से जोड़ा।


उनकी कविता में प्रकृति के संश्लिष्ट और स्वच्छन्द चित्र मिलते हैं। श्रीधर पाठक की कविता के प्रकृति चित्रों में कल्पना का वैभव, मृदुलता और वैयक्तिक अनुभूति की प्रधानता है। इन अनुभूतियों को सम्प्रेषित करने के लिए कवि ने लाक्षणिक शैली का सहारा भी लिया है। वैयक्तिक अनुभूति, कल्पना की मौलिकता और लाक्षणिक शैली की प्रधानता स्वच्छन्दतावादी काव्य का सूचक है। इसीलिए श्रीधर पाठक को स्वच्छन्दतावाद का प्रवर्तक भी कहा जाता है। आधुनिक हिन्दी कविता में जैसे वे खड़ीबोली के पहले कवि हैं वैसे ही स्वच्छन्दतावाद के भी पहले कवि हैं। बाद में इस प्रवृति का विकास छायावाद में होता है।



काव्य भाषा


स्वच्छन्दता की प्रवृति का असर उनकी काव्यभाषा पर भी है। उनकी काव्यभाषा अपने समकालीनों से अलग है। वे ब्रजभाषा और खड़ीबोली दोनों में ही कविता करते थे। अतः उनकी हिन्दी पर ब्रजभाषा के क्रियापदों का प्रभाव दिखाई देता है। काव्य क्षितिज पर महावीरप्रसाद द्विवेदी के उदय से पहले ही उन्होंने खड़ीबोली में कविता लिखने की शुरुआत कर दी थी। वे भी काव्य की भाषा के लिए खड़ीबोली के प्रयोग के समर्थकों में से थे। यह श्रीधर पाठक का ऐतिहासिक महत्त्व है। उनकी काव्यभाषा में तत्समनिष्ठता और सामासिक पदावली निर्मित करने की प्रवृति भी स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है।

इस बात का जिक्र पहले किया जा चुका है कि उन्होंने काव्यभाषा को रीतिवादी कृत्रिमता और आलंकारिकता से मुक्त किया। वे काव्यभाषा को जीवन के करीब लेकर आए। उन्होंने काव्य की भाषा को नयी शब्दावली से युक्त किया। इससे काव्य की भाषा में सजीवता आई और आगे की कविता के लिए नया मार्ग खुला। काव्यभाषा में उनके योगदान को समझने के लिए हेमन्त ऋतु पर लिखी उनकी कविता का एक उदाहरण देना उचित होगा


बीता कातिक मास शरद का अन्त है, लगा सकल सुखदाय ऋतु हेमन्त है। ज्वार बाजरा आदि कभी के कट गए। खल्यान के काम से किसान निबट गए ।


उद्धृत पंक्तियों की भाषा को ध्यान से देखने की ज़रूरत है। श्रीधर पाठक कविता को गाँव, खेत- खलिहान और जीवन के नजदीक ला रहे हैं। उनकी काव्यभाषा भी गाँव और खेत-खलिहान के सीधे व साधारण शब्दों से निर्मित होती है। इसे रीतिवादी कविता की नायिकाभेद और शृंगारप्रधान कविताओं की भाषा के सामने रख कर पढ़ें तो पता चलता है कि यहाँ न तो अलंकारों का घटाटोप है और न ही कवित्व प्रदर्शन की चाहत । कवित्व प्रदर्शन की चाहत न होने के कारन ही यह काव्यभाषा आडम्बरहीन है। आगे चलकर प्रगतिवादी कविता में इस प्रवृति का समुचित विकास होता है। श्रीधर पाठक ने ग्राम्यगीतों की शैली का भी अपने गीतों में खूब निर्वाह किया है।