हरिऔध का काव्य-शिल्प - Poetry of Hariodh

हरिऔध का काव्य-शिल्प - Poetry of Hariodh


व्यापक आलोचकीय अनिच्छा के बावजूद हरिऔध आधुनिककाल के एक बड़े कवि के रूप में प्रतिष्ठित हैं। उनकी लोकप्रियता के अनेक कारण हैं। यथा-सीधी-सरल भाषा का प्रयोग, पौराणिक कथानकों का चुनाव, नैतिक मूल्यों का समर्थन, राष्ट्रीय भावधारा की अभिव्यक्ति आदि। उन्होंने कविता में खड़ीबोली के प्रयोग को लोकप्रिय करने हेतु सार्थक प्रयास किये। इन कारणों के अतिरिक्त हरिऔध के रचनाकार व्यक्तित्व का एक अन्य पहलू इस सन्दर्भ में ध्यातव्य है जिस युग में हरिऔध काव्य-रचना में प्रवृत्त थे, उस समय समाज और साहित्य में दो प्रकार के आभिजात्य प्रचलित थे। पहला, राजभाषा अंग्रेजी का और दूसरा, पारम्परिक धर्म और संस्कृति की भाषा संस्कृत का ।

जो साहित्यकार इन दोनों में सिद्धहस्त थे वे बौद्धिकों के सिरमौर हुए, समाज और साहित्य में प्रतिष्ठित हुए। संयोग से हरिऔध इन दोनों कलाओं में निपुण नहीं थे। किन्तु अपने देशीपन के प्रति गहरे आत्मविश्वास के रहते उन्होंने कविता और निजी जीवन में अंग्रेजियत या संस्कृत का आतंक नहीं माना और न ही उनकी अवज्ञा ही की। वे अपने खाँटी चरित्र में दृढ़ बने रहे। इन्हीं दृढ़ताओं में हरिऔध का रचनात्मक व्यक्तित्व निर्मित हुआ ।


रचनात्मक तत्त्वों के संयोग से राष्ट्रीय, सामाजिक व सांस्कृतिक भावधारा स्वयमेव विकसित होती है,

इसलिए विचारकों ने राष्ट्रीयता व संस्कृति की समेकित भावना को यत्नज स्वीकार किया है। द्विवेदीयुगीन साहित्य मूलतः भारतीय नवजागरण की चेतना से स्पन्दित है। हिन्दी प्रदेश में जिस नवजागरण की चेतना का सूत्रपात भारतेन्दु के साहित्य से हुआ था वह हरिऔध की कृतियों में उत्कर्ष को प्राप्त करती है। उनका 'प्रियप्रवास' आधुनिक हिन्दी साहित्य का गौरव ग्रन्थ है जिसमें उन्होंने राधा और कृष्ण को विश्वसेवी तथा विश्वप्रेमी के रूप में चित्रित कर अपनी मौलिकता का परिचय दिया है।


हरिऔध की प्रारम्भिक रचनाएँ ब्रजभाषा में मिलती हैं। 'रसकलश' में उन्होंने ब्रजभाषा का प्रयोग किया है।

'कबीर कुण्डल', 'श्रीकृष्ण शतक', 'उपदेश कुसुम', 'प्रेम प्रपंच', 'प्रेमाम्बु वारिधि', 'प्रेमाम्बु प्रस्रवण', 'उद् बोधन', 'ऋतु मुकुर', 'पुष्प विनोद', 'विनोद वाटिका', 'चोखे चौपदे', 'चुभते चौपदे', 'पद्य प्रसून', 'प्रियप्रवास', 'बोलचाल', 'फूल-पत्ते', 'परिजात', 'ग्रामगीत', वैदेही वनवास', 'हरिऔध सतसई', 'मर्मस्पर्श' उनकी अन्य काव्य-कृतियों हैं। इन रचनाओं में कहीं जाति-सेवा, समाज-सेवा, राष्ट्र-सेवा एवं साहित्य-सेवा की भावना है तो कहीं आक्रोश एवं व्यंग्यका आश्रय लेते हुए सामाजिक कुरीतियों एवं दुर्बलताओं पर विचार किया गया है।


भाषिक योजना


भाषा साहित्य का मूलाधार है। वह सम्प्रेषण का माध्यम है। हरिऔध का भाषा विषयक दृष्टिकोण उदार है। उनकी भाषा परिष्कृत, प्रौढ़, साहित्यिक एवं भाव-सम्प्रेषणीय है। हरिऔध ने ब्रजभाषा और खड़ीबोली दोनों में रचना की। 'रसकलश' ब्रजभाषा में रचित काव्य-रचना है, जबकि 'प्रियप्रवास' तथा 'वैदेही वनवास' की भाषा खड़ीबोली है। उनकी रचनाओं में सरल व प्रांजल हिन्दी का निरलंकार सौन्दर्य है साथ ही संस्कृत की आलंकारिक समस्त पदावली की छटा भी दिखाई देती है। कविताओं में कहीं मुहावरों और बोलचाल के शब्दों की बहुलता है। तो कहीं उन्हें तिलांजलि दे दी गई है। कहीं वर्णनात्मक शैली का अजस्र प्रवाह है तो कहीं चित्रात्मक शैली का चमत्कार विद्यमान है।

वस्तुतः हरिऔध ने द्विवेदीयुगीन काव्यभाषा की कर्कशता में सरसता का संचार किया है। हरिऔध की भाषिक योजना की महत्त्वपूर्ण विशिष्टताएँ निम्नलिखित हैं-


i. हरिऔध का भाषा पर असाधारण अधिकार है। उनकी कविताओं में भाषा की पूर्ण शक्ति का विकास होता दिखाई पड़ता है। तत्सम शब्दों के साथ तद्भव व देशज शब्दों का भी प्रयोग हुआ है। अवसरानुकूल सामान्य बोलचाल की भाषा का प्रयोग भी हुआ है।


ii. वाक्य-विन्यास सुगठित है । उसमें खड़ीबोली हिन्दी की मूल प्रवृत्तियों का ध्यान रखा गया है। 


iii. सामासिक पदों का विधान मिलता है, यथा शक्ति-सौन्दर्य-समन्वित, कर्म-भावना-प्रसून, वस्तु- व्यापार-योजना आदि ।


iv. 'चुभते चौपदे', 'चोखे चौपदे' और 'बोलचाल' आदि काव्य-रचनाओं में मुहावरों और कहावतों के प्रयोग द्वारा लाक्षणिकता का समावेश हुआ है।


V. छन्द और भावों के अनुरूप भाषा का प्रयोग किया गया है।


बिम्ब-विधान


काव्यभाषा सामान्य भाषा से भिन्न होती है। सामान्य भाषा केवल अर्थ व्यक्त करती है जबकि काव्यभाषा चित्रों का विधान करती है।

यह चित्रात्मकता काव्य में 'बिम्ब-विधान' से आती है। बिम्बात्मक काव्यभाषा रचना में चमत्कार उत्पन्न करती है। बिम्ब वह शब्दचित्र है जो कल्पना द्वारा ऐन्द्रिक अनुभवों के आधार पर निर्मित होता है। बिम्ब द्वारा जो चित्र सृजित होते हैं वे भावों और अनुभूतियों को उद्वेलित करने की शक्ति रखते हैं। ऐसा होने पर ही बिम्ब-विधान को सार्थक कहा जाता है। विद्वानों ने विभिन्न आधारों पर बिम्ब के अनेक भेद किये हैं। इनमें ऐन्द्रिक बिम्ब प्रमुख हैं जो विभिन्न इन्द्रियों से सम्बन्धित होते हैं, यथा चाक्षुष बिम्ब नाद बिम्ब, आस्वाद्य बिम्ब, प्रातव्य बिम्ब, स्पर्श्य बिम्ब । इसके अतिरिक्त काल्पनिक बिम्ब और प्रेरक अनुभूति के आधार पर निर्मित सरल बिम्ब संकुल बिम्ब, भावातीत बिम्ब, तात्कालिक बिम्ब आदि अन्य भेद हैं।


हरिऔध की बिम्ब योजना सायास है। उनके बिम्ब भावात्मक एवं आलंकारिक हैं। अधिकांश बिम्ब रूपक, उपमा और मानवीकरण जैसे अलंकारों के माध्यम से निर्मित किये गए हैं। हरिऔध के बिम्बों का आधार उनकी सादृश्यमूलक अलंकार योजना है। चित्रात्मकता के कारण भाव सहज सम्प्रेषणीय हैं। उनकी काव्य-शैली मार्मिक एवं भावपूर्ण है। यशोदाके विरह-वर्णन की अभिव्यंजना देखिए-


प्रिय पति वह मेरा प्राणप्यारा कहाँ है। दुख जलधि निमग्ना का सहारा कहाँ है। अब तक जिसको मैं देख के जी सकी हैं। वह हृदय हमारा नेत्र-तारा कहाँ है ॥


पल-पल जिसके मैं पंथ को देखती थी। निशि-दिन जिसके ही ध्यान में थी बिताती । उर पर जिसके है सोहती मंजुमाला। वह नवनलिनी से नेत्रवाला कहाँ है ॥


स्वयं को उच्च मानने वाली जातियों द्वारा दीन-हीन, दबी-कुचले और शोषित वर्ग के प्रति किये गए अन्याय और कुर्यवहार का मार्मिक व कारुणिक वर्णन हरिऔध प्रभावी बिम्ब के माध्यम से प्रस्तुत करते हैं-


आप आँखें खोल करके देखिए । आज जितनी जातियाँ हैं सिर-धरी । पेट में उनके पड़ी दिखलायेंगी। जातियाँ कितनी सिसकती या मरी ॥


छन्द योजना


छन्द से काव्य में गेयता तथा प्रभविष्णुता का समावेश होता है। चारुता- विधान में छन्द ही सर्वाधिक सहायता पहुँचाता है । छन्दबद्ध कविताएँ मानस पटल पर सीधे उतरती जाती हैं। उनका प्रभाव अपेक्षाकृत अधिक स्थायी होता है। मुकुन्ददेव शर्मा के अनुसार "हरिऔध की काव्य-कृतियों में वर्ण्य विषय के समान ही छन्द के क्षेत्र में भी अद्भुत वैविध्य मिलता है। वे दोहा, कविता या सवैया के प्रयोग तक ही सीमित नहीं रहे, अपितु रोला, छप्पय, कुण्डलिया, सरसी, तांटक, लावनी, वीर आदि छन्दों के साथ-साथ उर्दू शैली के चौपदों का भी अत्यन्त कुशलतापूर्वक विधान करते हैं। यही वजह है कि छन्दों एवं भावों के अनुरूप भाषा प्रयोग करने की उनकी अद्भुत सामर्थ्य के कायल उनके आलोचक भी हैं।"