फिजी की राजनैतिक व्यवस्था एवं तख्तापलट (इंडो-फीजियन संदर्भ) - Political system and coup of Fiji (Indo-Fijian context)

फिजी की राजनैतिक व्यवस्था एवं तख्तापलट (इंडो-फीजियन संदर्भ) - Political system and coup of Fiji (Indo-Fijian context)


 फिजी की राजनीति आम तौर पर एक संसदीय प्रतिनिधि लोकतांत्रिक गणराज्य के दायरे में काम करती है। इसके तहत प्रधानमंत्री, सरकार का मुखिया और राष्ट्रपति राष्ट्र का मुखिया होता है। देश में बहुदलीय प्रणाली है। कार्यकारी शक्तियों का प्रयोगाधिकार सरकार के पास है। विधायी शक्तियाँ सरकार और संसद दोनों में निहित है। न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका से स्वतंत्र है।


आजादी के बाद से अब तक फिजी में चार तख्तापलट हो चुके हैं, दो 1987 ई. में एक 2000 ई. में और एक 2006 ई. के अंत में। 1987 ई. के बाद से सेना या तो शासन में है या उसका प्रभाव निर्वाचित सरकारों पर पूरा है।


1874 ई. में ब्रिटेन ने इस द्वीप को अपने नियंत्रण में लेकर इसे अपना एक उपनिवेश बना लिया। ब्रिटिश लोग भारतीय मजदूरों को अनुबंध पर यहाँ गन्ने के खेतों में काम करने के लिए लाए। 1970 ई. में इस देश को ब्रिटेन ने स्वतंत्रता दी। 1981 ई. में स्वर्गीय इंदिरा जी भी फिजी की यात्रा पर गई थीं। 1987 ई. में देश का लोकतांत्रिक शासन दो सैन्य विद्रोहों से बाधित हुआ, क्योंकि पहले तख्तापलट में ऐसा माना गया कि तत्कालीन सरकार में भारतीय फ़ीजियों का प्रभुत्व था तथा दूसरे में ब्रिटिश राजशाही और गवर्नर जनरल की जगह एक गैर कार्यकारी अध्यक्ष की नियुक्ति हुई। इसके बाद देश का नाम परिवर्तित करके 'फिजी गणराज्य' कर दिया गया (1997 ई. में इसे बदलकर फिजी द्वीप समूह गणराज्य कर दिया गया)।

इस तख्तापलट के कारण भारतीयों ने बड़ी संख्या में देश छोड़ दिया जिसके परिणामस्वरूप लानेशियन्स का बहुमत हो गया।



1990 ई. में नए संविधान के द्वारा राजनैतिक व्यवस्था में मूल फिजी लोगों के वर्चस्व को स्थापित किया गया। रंगभेद विरोधी समूह ( GARD) का गठन एक तरफा थोपे गए संविधान का विरोध करने और 1970 ई. के संविधान की बहाली के लिए किया गया। 1987 ई. के तख्तापलट को अन्जाम देने वाले लेफ्टिनेंट कर्नल सितिवेनी रेबूका नए संविधान के तहत हुए चुनाव के बाद 1992 ई. में प्रधानमंत्री बने। तीन साल बाद सितिवेनी रेबूका ने संविधान समीक्षा आयोग की स्थापना की, जिसके फलस्वरूप 1997 ई. में एक नया संविधान अस्तित्व में आया।

साथ ही इस संविधान को फिजी भारतीय इंडो- फीजियन और फिजी मूलवासी समुदायों के नेताओं का समर्थन भी मिला। फिजी को एक बार फिर से राष्ट्रमंडल के एक राष्ट्र के रूप में स्वीकृति मिल गई।


नई सहस्राब्दी में देश ने फिर से एक तख्तापलट देखा। इस तख्तापलट में जॉर्ज स्पीट ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंडो- फीजियन प्रधानमंत्री महेंद्र चौधरी की सरकार को उखाड़ फेंका जो 1997 ई. के संविधान के बाद निर्वाचित हुई थी। कमोडोर फ्रैंक बैनीमरामा ने राष्ट्रपति मारा के इस्तीफे जो संभवतः मजबूरी में दिया गया था, के बाद कार्यकारी शक्ति ग्रहण कर ली।

सन् 2000 में सुवा की बैरकों में हुऐ दो सैनिक विद्रोहों ने फिजी को हिला कर रख दिया, जब विद्रोही सैनिकों ने शहर में हुड़दंग मचा दिया। उच्च न्यायालय ने संविधान की बहाली का आदेश दिया और सितंबर 2001 ई. में लोकतंत्र को बहाल करने के लिए आम चुनाव आयोजित किए, जो अंतरिम प्रधानमंत्रीलेसीनिया करासे की सोकोसोको लेवेनिवानुआ पार्टी ने जीते।


सन् 2005 में, बहुत विवादों के बीच, करासे सरकार ने एकता आयोग बनाने का एक प्रस्ताव रखा जिसके अंतर्गत सन् 2000 के तख्तापलट के पीड़ितों को मुआवजा दिलाने के साथ इसके उत्तरदायी लोगों के लिए माफी की सिफारिश की गई थी।

इस प्रस्ताव का सेना और विशेष रूप से सेना के कमांडर फ्रैंक बैनीमरामा ने पुरजोर विरोध किया। फ्रैंक बैनीमरामा ने आलोचकों के साथ सहमति जताई कि वर्तमान सरकार के समर्थकों जिन्होंने तख्तापलट में एक निर्णायक भूमिका निभाई, को क्षमा दान देना अनुचित है। उन्होंने सरकार पर अपने हमले मई से जुलाई तक लगातार जारी रखे, जिसके कारण उनके संबंध सरकार से जो पहले से तनावपूर्ण थे और तनावपूर्ण हो गए।

नवंबर 2006 के अंत और दिसंबर 2006 के शुरू में तख्तापलट के लिए बैनीमरामा मुख्य रूप से उत्तरदायी था। बैनीमरामा ने अपनी माँगों की सूची करासे सरकार को सौंप दी जिसके बाद करासे सरकार संसद में एक विधेयक लेकर आई जिसमें 2000 में तख्तापलट के प्रयास में शामिल लोगों को क्षमादान देने की पेशकश की गई थी। उसने करा को 4 दिसंबर तक इन माँगों को स्वीकार करने या अपने पद से इस्तीफा देने का अल्टीमेटम दे दिया। करासे ने माँगों को स्वीकार करने या इस्तीफा देने से साफ इनकार कर दिया। 5 दिसंबर को राष्ट्रपति रातु जोसेफा इलोइलो, ने बैनीमरामा से मुलाकात के बाद संसद भंग करने के एक कानूनी आदेश पर हस्ताक्षर कर दिए।