लोक नृत्यों का प्रस्तुतीकरण - presentation of folk dances
लोक नृत्यों का प्रस्तुतीकरण - presentation of folk dances
लोक नृत्यों की आकर्षक प्रस्तुति में लोक नृत्य-गीत, लोक वाद्य, लोक नृत्यकार की वेशभूषा तथा उसकी अंग-भंगिमाएँ सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण स्थान रखती हैं। लोक नृत्यकार नृत्य प्रस्तुति के समय बड़ी रंग-बिरंगी व कलापूर्ण वेशभूषा धारण करते हैं। ये वेशभूषाएँ अलंकृत होती है। आदिम और पिछड़ी जातियों में यह अलंकरण प्रवृति बहुत अधिक मिलती है। लोक-नृत्यों के प्रदर्शन के लिए जितने आवश्यक लोक गीत और लोकवाद्य हैं उतनी ही आवश्यक लोकनर्तक की वेशभूषा भी है। लोक नृत्यों का रूप और रंग अपने स्थानीय- वेशभूषा से ही मनोहर बन पाता है। भारत के प्रत्येक प्रान्त में तरह-तरह की वेशभूषाओं का प्रचलन है। प्रत्येक क्षेत्र की एक विशिष्ट शैली है।
इसी तरह अलग-अलग क्षेत्रों में लोक-नृत्यों की प्रस्तुति के दौरान पहने जाने वाले गहनों की भी विविधता दृष्टिगोचर होती है। रंग-बिरंगी सुन्दर वेशभूषा के साथ भाँति-भाँति का अलंकरण, केश विन्यास, नर्तकों की साज-सज्जा आदि सब मिलकर लोक नृत्यों की प्रस्तुति में चार चाँद लगा देते हैं।
लोक नृत्य गीत भी लोक नृत्य प्रस्तुति में अहम भूमिका निभाते हैं। लोक नृत्य गीतों का सरल प्रवाहमान संगीत, नृत्य की ताल-लय को कला प्रदान करता है और तब दर्शक की आत्मा मंत्रमुग्फ्सी अलौकिक आनन्द का रसास्वादन करने लगती है। लोक गीत व लोक नृत्य परस्पर पूरक का कार्य करते हैं।
लोक-नृत्यों की प्रस्तुति के समय जो वाद्ययंत्र बजाए जाते हैं, वे भी नृत्यकारों में जोश और उत्साह भरकर उनमें स्फूर्ति का संचार करते हैं व लोक नृत्यों की दमदार प्रस्तुति में सहायता करते हैं। ये लोक वाद्य दर्शकों में भी नृत्य का उन्माद भर देते हैं व सम्पूर्ण वातावरण को नृत्यमय बना देते हैं। ढोल, मंजीरा, ढोलक, थाली, नगाड़ा, तुरही, खँजड़ी, हुड़का झाल, ताशा, सारंग, बाँसुरी, मटकी, करताल, चंग, दहकी, चिमटा, झाँझ आदि प्रमुख लोक वाद्ययंत्रों का वादन लोक नृत्य की प्रस्तुति के अवसर पर होता है। वाद्ययंत्र का प्रयोग और इनके प्रयोग की शैली अवसर और जातीय प्रभाव से प्रभावित होती है। लोक-नृत्यों की प्रस्तुति में कटि और पद संचालन पर विशेष ध्यान दिया जाता है।
हस्त- संचालन की भी भावानुसार स्वतन्त्रता रहती है। आंगिक अभिनय भावों के अनुसार साथ-साथ चलता है। जातीय नृत्यों में नर्तक बीच में नाचता है तो गायक व वादक उसके चारों ओर वृत्ताकार रूप में खड़े रहते हैं। बिरहा गायक नर्तक कान पर हाथ रखे हुए गाता है व गायक-टोली उसका दुहराव करती है। इसमें घुमरी द्वारा नृत्य को तीव्र गति और त्वरा प्रदान की जाती है। नर्तकों की पोशाक में खूब घेरदार लहँगा होता है और कमर में घण्टियाँ तथा पाँवों में घुँघरू बँधे होते हैं। घुमरी करते समय यह लहँगा पूर्णवृत्त बनाता हुआ मनोहारी रूप में घूमता है। पद संचालन की गति के तीव्र होते ही गायन व वादन की गति भी द्रुत व द्रुततर होती जाती है और पाँवों में बंधे घुंघरुओं की छनछनाहट से वातावरण झंकृत हो उठता है।
लोक नृत्यों की प्रस्तुति को क्षेत्रीय परिस्थितियाँ व वातावरण भी प्रभावित करते हैं। जिन पहाड़ी जातियों को शेर, सुअर, रीछ आदि का सामना करना पड़ता है या जहाँ इन पशुओं का बाहुल्य रहता है, वहाँ के लोक-नृत्यों में इन पशुओं के अभिनय या स्वाँग का प्रयोग भी होता है। उनकी आकृति-वेश आदि बनाकर नृत्य प्रस्तुत किया जाता है। मध्यप्रदेश में मुरिया सिर पर सींग लगाते हैं। पहाड़ी लोग याक नृत्य करते हैं।
सामाजिक जीवन व मान्यताएँ भी इनकी प्रस्तुति को प्रभावित करती हैं। जिन भागों में जातीय जीवन में संगठन व एकता की भावना अधिक मिलती है और ऊँच-नीच का भेदभाव नहीं होता वहाँ लोक नृत्य की प्रस्तुति भी सामूहिक होती है।
राजस्थान आदि प्रदेशों में पर्दा प्रथा का प्रचलन है। वहाँ नृत्य में घूँघट की भी कई कलाएँ व्यक्त की जाती हैं। साथ ही, उनके नृत्य भी चकरी प्रधान होते हैं ताकि घाघरे का घेर मर्यादा का अतिक्रमण न कर जाए।
लोक नृत्यों की प्रस्तुति अपने क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करती है। राजस्थान प्रदेश वीर भूमि रहा है। राजस्थानी लोक-नृत्यों, जैसे कच्छी घोड़ी, जालौर व भरतपुर का ढोल नृत्य, भीलों के गौरी आदि नृत्य की प्रस्तुति बड़ी पौरुषपूर्ण होती है। ये नृत्य बड़े फड़कते हुए होते हैं। इन नृत्यों की तालों में उत्तेजना है। ये नृत्य युद्ध के वातावरण की सी झलक उपस्थित करते हैं। राजस्थान के ही भवाइयों के नृत्यों की प्रस्तुति में चमत्कार का अंश अधिक होता है।
जलती बोतल को सिर पर रख कर नाचना, मटके सिर पर रख कर नाचना, कालबेलिया स्त्रियों द्वारा नृत्य के दौरान भाँति-भाँति की कलाबाजियाँ प्रदर्शित करना भी इन लोक नृत्यों की प्रस्तुति को रोचकता प्रदान करता है। धार्मिक व भक्ति भावना से ओत-प्रोत लोक नृत्यों की प्रस्तुति में कला का अंश कम है। यहाँ भाव ज्यादा देखे जा सकते हैं। जैसे हाल की हालत में आ जाना, बेहोश हो जाना अथवा शरीर का कम्पन, उछल-कूद, शरीर का ताड़न, छाया आना आदि क्रियाएँ, इन लोक नृत्यों की प्रस्तुति में अधिक रहती हैं।
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