लोक गाथाओं का प्रस्तुतीकरण - presentation of folk tales
लोक गाथाओं का प्रस्तुतीकरण - presentation of folk tales
लोक गाथाओं के वाचन श्रवण की परम्परा प्राचीन है। ये लोक-गाथाएँ प्रमुख रूप से लोकानुरंजन के उद्देश्य की पूर्ति के लिए प्रस्तुत की जाती हैं वहीं अप्रत्यक्ष रूप में ये गाथाएँ जनसाधारण को नैतिक शिक्षा प्रदान कर उन्नत जीवन जीने की प्रेरणा भी प्रदान करती हैं। लोक-गाथाओं में श्रोता की रुचि बनाए रखने में इनके प्रस्तुतीकरण की भूमिका महत्त्वपूर्ण होती है। गाथा का प्रस्तुतीकरण जितना प्रभावी होगा वह उतनी ही लोकप्रसिद्ध होगी। अतः इस प्रभाव को बनाए रखने के लिए गाथाकार विशेष परम्परा का निर्वाह करता है। गाथा- प्रस्तुतीकरण के लिए आवश्यक बिन्दुओं का विवरण इस प्रकार है-
1. देशकाल :
लोक गाथाओं के वाचन में देशकाल का विचार किया जाता है। कई गाथाएँ समय विशेष या खास अवसर पर गायी जाती हैं, जैसे- 'आल्हा' का वाचन वर्षा ऋतु में किया जाता है तो विभिन्न धर्म-प्रधान गाथाओं का वाचन अलग-अलग धार्मिक अवसरों पर किया जाता है। नवरात्रि में शक्तिपूजा की परम्परा का निर्वाह करते हुए नौ दिनों तक अखण्ड ज्योति प्रज्वलित की जाती है और विभिन्न देवी-देवताओं की यशोपरक गाथाएँ गायी जाती हैं। श्रद्धा से परिपूर्ण भारतीय लोक समाज इच्छापूर्ति के लिए धर्मगाथा के वाचन की 'बोलवाँ' बोलता है और इच्छापूर्ण होने पर शुभ अवसर देख 'गाथा' बँचवाता है। गाथा वाचन का मूल उद्देश्य लोकानुरंजन है। श्रोताओं की कामना के अनुरूप अवसरानुकूल 'गाथा' का वाचन किया जाता है।
2. जनमानस की उत्सुकता:
जनसाधारण में लोक गाथाओं के प्रति विशेष उत्सुकता और अनुराग होता है। सरल हृदय लोक प्रेम, वीरता, भक्ति से परिपूर्ण लोक-गाथाओं को तल्लीनता के साथ सुनता है और आनन्द-सागर में गोते लगाता है । श्रोतागण की उत्सुकता को बनाए रखने में गाथाकार की भूमिका भी महत्त्वपूर्ण होती है। वह गाथा को जितना रोचकपूर्ण ढंग से सुनाता है, श्रोता उतना ही आनन्द और उल्लास की अनुभूति करता है और गाथा के प्रति उसकी उत्सुकता - जिज्ञासा बनी रहती है।
3. मंच:
लोक गाथाओं के वाचन की परम्परा प्राचीन है। पुराने समय से गाँवों में देवरों या चबूतरों पर ही इन गाथाओं का मंचन किया जाता रहा है। पूर्व निर्धारित कार्यक्रम होने पर इन स्थानों की सफाई कर मांडणा- रंगोली से सजाया जाता है। कनातों का प्रयोग कर मंच को व्यवस्थित रूप प्रदान किया जाता है। खुले आकाश के नीचे प्रकृति के
साहचर्य से लोक-गाथाओं में नैसर्गिक सौन्दर्य की श्री वृद्धि होती है।
4. वाद्य यंत्र
लोक गाथाओं में कथा के साथ गीत-संगीत की त्रिवेणी प्रवाहित होती है। गीत का सौन्दर्य संगीत के प्रयोग से द्विगुणित हो जाता है। अतः गाथा की प्रस्तुति में वाद्ययंत्रों के महत्त्व को नकारा नहीं जा सकता है। लोक गाथा वाचन के दौरान प्रयुक्त वाद्यों में ढोल, चंग, मंजीरे, इकतारा, अलगोजा, खड़ताल आदि प्रमुख हैं। कहीं-कहीं थाली, मटकी (मिट्टी का छोटा घड़ा) का भी वाद्ययंत्र की भाँति प्रयोग किया जाता है। इस प्रकार विविध वाद्ययंत्रों का प्रयोग कर गाथाकार अपनी गाथा प्रस्तुति को अधिक रुचिकर बना देता है।
निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि लोक गाथाएँ भक्ति, शृंगार, नीति, कथा, गायन और संगीत का अनूठा संगम है। इस संगम का अद्भुत आनन्द तभी प्राप्त हो सकता है जब गाथाकार अपनी विलक्षण बुद्धि, चातुर्य और परम्परागत शैली का समन्वय कर सुन्दर स्वरूप में लोक समाज के सक्षम अपनी गाथा का प्रस्तुतीकरण करे । सुन्दर-संतुलित प्रस्तुतीकरण गाथाकार की श्रीवृद्धि में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करता है।
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