फिजी में इंडो-फिजीयन / भारतीय डायस्पोरा का पहचान निर्माण से संबंधित प्रमुख व्यक्तित्व - Prominent personalities related to identity building of the Indo-Fijian/Indian Diaspora in Fiji

फिजी में इंडो-फिजीयन / भारतीय डायस्पोरा का पहचान निर्माण से संबंधित प्रमुख व्यक्तित्व - Prominent personalities related to identity building of the Indo-Fijian/Indian Diaspora in Fiji


तत्कालीन गवर्नर सर आर्थर हेमिल्टन गार्डन ने भारत से शर्तबंद मजदूरों के मानव-व्यापार के नवीन अध्याय की शुरुआत की जिसके फलस्वरूप 1879 ई. में 'लेओनीदास' नामक जहाज में पहला दल उतारा गया। सन् 1916 ई. तक प्रतिवर्ष यह क्रम जारी रहा। अड़तीस वर्षों में लगभग 61,000 हिंदुस्तानी मजबू एग्रीमेंट (समझौते ) गिरमिटिया कानून के तहत फिजी पहुँचे, जिसमें 10 से 15 प्रतिशत के आस-पास भारत वापस आ गए। इन्हीं भारतीय अनुबंधित श्रमिकों को गिरमिटिया कहा गया। इन भारतवंशियों में प्रमुख रूप से शामिल हैं: बाबा रामचंद्र उर्फ श्रीधर बलवंत जोधपुरकर, तोताराम सनाढ्य, महेंद्र चौधरी, अयोध्या प्रसाद शर्मा, सरदार श्री रामउग्रहजी, श्री सुरेंद्र प्रसाद, बैरिस्टर जय राम रेड्डी, जोगिंदर सिंह कंवलआदि।


बाबा रामचंद्र : बाबा रामचंद्र का जन्म 1864 ई. में बंबई प्रेसिडेंसी (अब महाराष्ट्र) में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। इनका पुराना नाम श्रीधर बलवंत जोधपुरकर था। 1904 ई. में तेरह साल के उम्र से ही वे घर-द्वार छोड़कर भ्रमण पर चले गए। अठारह वर्ष की उम्र में अनुबंध श्रमिक प्रणाली के तहत कृषक श्रमिक बनकर फिजी चले गए। फिजी जाने के लिए इन्होंने अपने ब्राह्मण पहचान को छुपाया और अपना नाम बदलकर रामचंद्र राव कर लिया, क्योंकि उस समय अनुबंध श्रमिक के लिए ब्राह्मण जाति के लोगों को बहुत ज्यादा पसंद नहीं किया जाता था।


बाबा रामचंद्र फिजी में करीब तेरह वर्ष तक (श्रीधर बलवंत जोधपुरकर) अलग-अलग रूपों में रहे।

इन्होंने भारतीय अनुबंध श्रमिकों, औपनिवेशिक सत्ता द्वारा कृषकों के साथ अमानवीय व्यवहार तथा शोषण के विरोध में आंदोलन किया। इसी दौरान बाबा रामचंद्र मणिलाल डॉक्ट के संपर्क में आए मणिलाल डॉक्टर गांधी जी के शिष्य थे तथा आर्य समाज के माध्यम से भारतीय गिरमिटिया मज़बूरों के शोषण के खिलाफ उन्होंने आंदोलन किया। मज़दूरों को एकीकृत कर उन्हें शिक्षित किया। बाबा ने भी, भारतीय गिरमिटिया मज़दूरों को शोषण के खिलाफ संगठित करने के लिए धार्मिक संगठनों, संस्थाओं, मिथकों, धार्मिक ग्रंथों का सहारा लिया। इसके लिए बाबा ने फिजी में रामलीला का मंचन किया और करवाया। रामलीला के मंचन के कारण फिजी के भारतीय समुदाय के बीच एकता का सूत्रपात हुआ। बाबा अपने साथ रामायण लेकर चलते थे।

रामायण पर व्याख्यान भी देते थे। लोगों को बताते थे कि हमारे शोषक शासक रावन के समान हैं और राम ने सभी को एकत्रित करके जिस प्रकार रावण का नाश करके विजय पाई है, उसी प्रकार हम भी औपनिवेशिक शोषकों का नाश करेगें। बाबा ने औपनिवेशिक शोषकों के शोषण से संबंधित एक आलेख बड़ी कठिनाई से लिखा और छिपाकर भारत भेजा जो भारत में कलकत्ता से छपने वाली अखबार 'भारत मित्र' में प्रकाशित हुआ। इस आलेख से औपनिवेशिक शोषकों के कान खड़े हो गए और बाबा को अपनी गिरफ्त में लेने की तैयारी करने लगे। इसी बीच बाबा ने अपने मित्रों की सलाह पर 1916 ई. में फिजी छोड़ दिया और भारत आ गए।


भारत में बाबा एक साधू के वेष में अयोध्या में बसे, परंतु बाद में भारत के किसानों की समस्या से वे आहत हुए और किसानों के शोषण के खिलाफ आवाज उठाने लगे। भारतीय किसानों का शोषण जमींदार, तालुकदार और ब्रिटिश औपनिवेशिक नीतियों के सहारे करते थे। ब्रिटिश राज के किसान विरोधी नीतियों का विरोध करने के लिए बाबा ने 1920-21 ई. में 'अवध किसान सभा' का गठन किया। इस सभा की सहायता एवं समर्थन के लिए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस व जवाहर लाल नेहरू से भी बाबा ने संपर्क किया। 'अवध किसान सभा की मुख्य माँग थी- मालगुजारी में कमी, बेगारी प्रथा की समाप्ति,

शोषक भू-स्वामी का सामाजिक बहिष्कार आदि। बहुत जगह पर बड़े भूस्वामियों का धोबियों, नाइयों ने बहिष्कार किया। प्रारंभिक समय में किसानों के मुद्दे पर बाबा को जवाहर लाल नेहरु तथा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अन्य नेताओं का साथ एवं समर्थन मिला परंतु बाद के दिनों में बाबा के किसान आंदोलन का मार्ग हिंसक हो गया। इस कारण बाबा को बाद के दिनों में न ही नेहरू और न ही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का ही साथ मिला।


तोताराम सनाढ्य : तोताराम सनाढ्य का जन्म 1876 ई. में हिरन गाँव जिला फिरोजाबाद उत्तर प्रदेश में हुआ था। तोताराम सनाढ्य हिरन गाँव की पाठशाला के तीसरे दर्जे में प. कल्याण प्रसाद के पास पढ़ते थे।

1887 ई. में उनके पिता का देहांत हो गया। परिवार की दशा अत्यंत दयनीय रही, जिससे तोताराम 1893 ई. में घर छोड़कर काम की तलाश में बाहर निकल गए। तोताराम को हिंदुस्तान से फिजी गिरमिटिया श्रमिक बनाकर और धोखे से 23 मई, 1893 ई. को फिजी ले जाया गया। उनसे 5 वर्ष तक बंधुआ मजदू के रूप में काम कराया गया, किंतु वे अपने अधिकारों के लिए निडर होकर संघर्ष करते रहे। करार की अवधि समाप्त होने पर उन्होंने एक छोटे किसान और पुजारी का जीवन शुरू किया और उसके साथ-साथ अपना अधिकांश समय उन लोगों की सहायता में लगे रहे जो गिरमिटिया मजदूर के रूप में वहाँ काम कर रहे थे।


वे भारत की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष कर रहे भारतीय नेताओं के संपर्क में रहे और भारत से अधिक संख्या में शिक्षक, वकील, कार्यकर्ता आदि भेजने का अनुरोध किया, ताकि फिजी के भारतीय लोगों की दुर्दशा को कम किया जा सके। 21 वर्ष तक फिजी प्रवास में पहले गिरमिटिया के रूप में मजदूरी की फिर किसान बने और बाद में कथावाचका विवाह अनुबंधित श्रमिक की बेटी से किया, 1914 में पत्नी और सासू माँ के साथ भारत लौटे। भारत में गांधी जी के आश्रम में रहकर भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया।


फिजी प्रवास के अनुभवों को एकत्रित कर फिजीद्वीप में मेरे इक्कीस वर्ष' नाम से एक पुस्तक लिखी।

वे अपनी आत्मकथा पुस्तक 'फिजीद्वीप में मेरे 21 वर्ष में चर्चा करते हैं कि 28 मई, 1893 को फिजी के नौसोरी प्लांटेशन के बैरक निवास में पहुँचे, जहाँ वे 141 अनुबंधित भारतीय मजदूरों के लिए बने एक कतार वाले घरों में रहते थे। प्रत्येक बैरक में 24 कमरे थे प्रत्येक कमरा 12 फीट लंबा और 8 फीट चौड़ा (3.66 मीटर x 2.44 मीटर) था, कमरे में तीन लोग एक साथ रहते थे। अगर पत्नी साथ में हो तो एक रूम परिवार के लिए तथा और एक बच्चा रहने पर भी एक रूम। इस तरह एक कतार में 1500 औरत और मर्द रहते थे। फिजी में कोलोनियल शुगर रिफाइनिंग कंपनी में काम करते थे।


फिजी की अनुबंधित मजदूरी की प्रथा को समाप्त करने में इस पुस्तक में वर्णित अनुभव बहुत सहायक सिद्ध हुए।

इस पुस्तक को भारती भवन द्वारा प्रकाशित कराकर भवन की ख्याति को बढ़ाया। इस पुस्तक का अंग्रेजी अनुवाद कराकर दीनबंधु सी. एफ. एंड्रयूज फिजी ले गए। 


महेंद्र चौधरी


महेंद्र चौधरी के दादा 1912 ई. में भारत से फिजी गए थे। वहाँ गन्ने के खेत में उन्होंने मज़दूरी की। 1999 ई. में पहली बार महेंद्र चौधरी फिजी के प्रधानमंत्री बने। फिजी में वे भारतीय मूल के पहले प्रधानमंत्री थे। मूलतः भारत के उत्तरी राज्य हरियाणा के निवासी रहे महेंद्र चौधरी आज भी अपनी जड़ों से जुड़े हैं।

बहुजमाल पार गाँव में रही अपनी बहन से मिलने वे 1997 में वहाँ गए थे।


फिजी में सत्तापलट के बाद अपदस्थ प्रधानमंत्री महेंद्र चौधरी इस पूरे प्रकरण से बड़े ही परिपक्वता से निपटे। दो महीनों तक बंधक बनाकर रखे जाने के बावजूद उनके मन में बंधककर्त्ताओं के लिए द्वेष की कोई भावना नहीं दिखती। फिजी के बागी नेता जार्ज स्पेट ने महेंद्र चौधरी को बंदूक के दम पर कब्ज़े में रखा, लेकिन इस दौरान चौधरी का सत्ता में वापस आने का इरादा लगातार बुलंद होता रहा। भारतीय मूल के फिजी के इस पूर्व प्रधानमंत्री का कहना है कि उन्होंने फिजी के भविष्य को संवारने का एक सपना देखा है, लेकिन उन्हें इस बात का दुख है कि उसे पूरा करने का मौका उन्हें नहीं मिल पाया। हालाँकि वो मानते हैं कि इसके बावजूद वे फिजी के लोगों की सेवा में समर्पित रहेंगे।

ये पहला मौका नहीं है जब चौधरी के खिलाफ सत्तापलट की कोशिश हुई। 1987 में फिजी की सरकार का तख्ता पलटा गया। इस सरकार में ज्यादातर भारतीय मूल के लोग थे। तब चौधरी वित्त मंत्री थे। उसी समय उन्हें कुछ समय तक कैद भी कर लिया गया था।


एक ऑडिटर के तौर पर काम करने वाले चौधरी ने फिजी में व्याप्त भ्रष्टाचार को हटाने के लिए काम करना शुरू किया। प्रधानमंत्री का कार्यभार संभालने के बाद उन्होंने फिजी में करों की वसूली शुरू की। कई सालों से ये वसूल नहीं किए गए थे।

फिजी की घटनाओं के बाद महेंद्र चौधरी फिजी के भारतीय बहुल निवासियों की आकांक्षाओं के प्रतीक बन गए हैं। फिजी की 44 प्रतिशत जनता चौधरी में एक ऐसे राजनेता को देखती है जो प्रजातंत्र और कानून व्यवस्था के प्रति समर्पित है। शायद यही वो कारण है जिससे महेंद्र चौधरी अपनी प्रेरणा ग्रहण करते हैं। चौधरी मानते हैं कि फिजी में प्रजातंत्र की स्थापना के प्रति वो प्रतिबद्ध हैं। क्योंकि ऐसा नहीं करना फिजी में अराजकता को बढ़ावा देने वाली बात होगी और ये


उनके उसूलों के विरुद्ध है। जोगिन्दर सिंह कंवल : फिजी में हिंदी लेखन के भीष्म पितामह हैं। 88 वर्ष की आयु में चहल-पहल, महत्वाकांक्षाओं से दू पहाड़ियों में साहित्य साधना में विलीन हैं। जीवन के इस लंबी दौड़-धूप और यात्रा में उन्होंने अपनी मुस्कान नहीं खोई है, साहित्यकारों को सामान्य रूप से मिलने वाली सांसारिक असफलताओं के कारण उनमें कोई कटुता नहीं आई, उदासीनता और निराशा तो उनसे कोसों दूर हैं।


उनकी पहली पुस्तक 'मेरा देश मेरी धरती' 1947 में प्रकाशित हुई थी। वे 40 वर्ष से निरंतर साधनारत हैं।