राजीव गांधी का युग और भारतीय डायस्पोरा नीति - Rajiv Gandhi's Era and Indian Diaspora Policy

राजीव गांधी का युग और भारतीय डायस्पोरा नीति - Rajiv Gandhi's Era and Indian Diaspora Policy


राजीव गांधी समय में प्रवासी नीतियों को नेहरू और इंदिरा गांधी के नीतियों से भिन्न रूप में देखा गया। वह अपने पूर्ववर्ती नेताओं के समय से चली आ रही भारतीय डायस्पोरा नीति को काफी हद तक बदलना चाहते थे ताकि कूटनीतिक स्तर पर भारत की स्थिति मजबूत हो सके। राजीव गांधी पहले प्रधान मंत्री थे, जिन्होंने विदेशों में जो भारतीय मूल के लोग बसे हुए थे उनको भारत बुलाकर राष्ट्र निर्माण में सहयोग देने के लिए आवाहन किया। इसी नीति के तहत उन्होंने अमेरिका में बसे भारतीय मूल के सैम पित्रोदा को राष्ट्र निर्माण में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया।

उनको भारत में दूसंचार के आधुनिकीकरण का काम सौंपा गया था। भारतीय और विदेश में बसे भारतीय लोगों को एक दूसरों को समझने के प्रयास में उन्होंने अपने शासन काल में विदेशी प्रभाग में एक अलग मंत्रालय (The Indianooverseas department of India) का गठन किया और जिसका अध्यक्ष 1984 में सैम पित्रोदा को बनाया। राजीव गांधी जी ने 1985 में अमेरिका की यात्रा की। इस यात्रा का उद्देश्य भारत- अमेरिका संबंधों को मजबूत बनाना तथा भारतीय प्रतिभा जो अमेरिका में जा बसे हैं, उन्हें भारत के नवनिर्माण के लिए अपनी प्रतिभा का प्रयोग के लिए प्रोत्साहित करना ।


राजीव गांधी के शासनकाल में डायस्पोरा नीति के नये युग की शुरुआत हुई राजीव गांधी सरकार के समय डायस्पोरा नीति का पहला परीक्षण 1987 में देखने को आया जब उन्होंने फीजी के भारतीय संकट में सहायता पेशकश की। सितिवेनी रबाका ने भारतीय मूल के प्रधानमंत्री महेंद्र चौधरी की बहुसंख्यक फीजी सरकार का तख्तापलट कर दिया गया। राजीव गांधी ने इसकी कड़ी आलोचना की और फीजी के • खिलाफ व्यापारिक प्रतिबंध लगाए। परिणामस्वरूप फीजी को राष्ट्रमंडल से निष्कासित कर दिया गया और संयुक्त राष्ट्रसंघ में फीजीके मुद्दे को उठाया।


इस समय श्रीलंका में प्रवासी भारतीय तमिल समस्या ने उग्र रूप धारण किया। श्रीलंकन सिंहली • और भारतीय तमिल समुदाय के बीच श्रीलंका में गृहयुद्ध चल रहा था। भारतीय तमिलों के प्रश्न पर पूरी तरह से समाधान के लिए राजीव गांधी ने श्रीलंका की ऐतिहासिक यात्रा की । 30 जुलाई 1987 को कोलबो में शांतिपूर्ण समझौता किया। इस समझौते के द्वारा श्रीलंका सरकार तमिल बुद्ध भारतीयों को अधिकाधिक स्वायत अधिकार देने के लिए राजी हो गई।