रामनरेश त्रिपाठी : व्यक्तित्व एवं कृतित्व - Ramnaresh Tripathi: Personality and Works

रामनरेश त्रिपाठी हिन्दी नवजागरण काव्य के महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं। वे ऐसे रचनाकारों की श्रेणी में शुमार हैं जो जीवन की विविध अनुभूतियों को बड़े ही सरल, सहज व संवेदनशील तरीके से अपने काव्य में प्रस्तुत करते हैं और समसामयिक जीवन में व्याप्त घोर सामाजिक-आर्थिक विषमताओं, असमानताओं और निरर्थकता को काव्य संवेदना के स्तर पर अनुभूति के माध्यम से प्रकट करते हैं। रामनरेश त्रिपाठी ने अपने काव्य में बिम्बों का सार्थक प्रयोग किया है। उन्होंने अपनी सामाजिक चेतना और राष्ट्रीय अनुभूति को बिम्बों के माध्यम से अत्यन्त कौशलपूर्वक प्रस्तुत किया है। स्वयं की और आमजन की अनुभवगत जटिलता के विश्लेषण और बखान को वे अपने कविकर्म का प्रमुख प्रयोजन अंगीकार करते हैं।

व्यक्तित्व


रामनरेश त्रिपाठी का जन्म वर्ष 1889 ई. में उत्तरप्रदेश के जौनपुर जनपद के अन्तर्गत कोइरीपुर नामक गाँव में हुआ। बचपन से ही वे एक मेधावी छात्र थे। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा-दीक्षा गाँव के विद्यालय में सम्पन्न हुई। बाद में अंग्रेजी पढ़ने के उद्देश्य से वे जौनपुर भी गए। कविता का मर्म उन्होंने विद्यार्थी जीवन में ही पा लिया था, जब वे पाँचवीं छठवीं कक्षा के छात्र थे। त्रिपाठीजी का व्यक्तित्व, रचनाधर्मिता और साहित्य-सर्जना अध्ययन, चिन्तन और मनन के प्रति उनकी निष्ठा का प्रतिबिम्ब है।


कृतित्व


रामनरेश त्रिपाठी की रचनात्मक संवेदना में नवजागरण काव्य की मूल प्रवृत्तियाँ इतनी सहजता से समाहित हो गई हैं कि उन्हें नवजागरण काव्य का 'सहज नागरिक' कहा जा सकता है। खड़ीबोली की ओर उनका वास्तविक रुझान ‘सरस्वती’ पत्रिका के माध्यम एवं प्रभावस्वरूप ही हुआ। उनके चार काव्य-संग्रह प्रकाशित हुए - 'मिलन' (1917), 'पथिक' (1920), 'मानसी' (1927) और 'स्वप्न' (1929)।

'मानसी' फुटकर कविताओं का संग्रह है जो मुख्यतः राष्ट्रभक्ति, प्रकृति-चित्रण और नीति निरूपण से सम्बन्धित है। 'मिलन', 'पथिक' तथा 'स्वप्न' उनके कल्पनाधारित कथाश्रित प्रेमाख्यानक खण्डकाव्य हैं, जिनमें व्यक्तिगत सुख और स्वार्थ को त्यागकर राष्ट्र और लोक के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने की प्रेरणा दी गई है। उनकी रचनाओं में यथास्थान प्रकृति के मनोहारी चित्रण भी मिलते हैं। त्रिपाठीजी ने हिन्दी, उर्दू, बांग्ला एवं संस्कृत की कविताओं का संकलन और सम्पादन 'कविता कौमुदी' के आठ भागों में किया। लोकगीतों का संग्रह भी उन्होंने बड़े मनोयोग से किया है। घाघ और भड्डरी पर उनके द्वारा सम्पादित पुस्तक एक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है । है