लोकोक्तियों और मुहावरों में लोक संस्कृति का प्रतिबिम्ब - Reflection of folk culture in proverbs and idioms
लोकोक्तियों और मुहावरों में लोक संस्कृति का प्रतिबिम्ब - Reflection of folk culture in proverbs and idioms
लोकोक्ति और मुहावरे लोक समाज में विशेष महत्त्व रखते हैं। लोक अपनी बात को प्रभावी, रोचक और प्रमाणित बनाने के लिए मुहावरों और लोकोक्तियों का प्रयोग करता है। ये मुहावरे और लोकोक्तियाँ लोक समाज की संस्कृति और अनुभूति को आत्मसात् किये हुए हैं। लोक समाज का दैनिक व्यवहार, आस्था, संस्कार और जीवनशैली का स्पष्ट चित्रण इन मुहावरों और लोकोक्तियों में चित्रित है। दूसरे शब्दों में कहें तो मुहावरे और लोकोक्ति वह आरसी है जिसमें लोक-संस्कृति का प्रतिबिम्ब स्पष्ट दिखलाई पड़ता है।
1. संस्कारों का प्रतिबिम्ब:
मुहावरों और लोकोक्तियों में जन समाज में प्रचलित विविध संस्कारों का उल्लेख मिलता है।
जैसे- 'थाली बजाना', 'हल्दी लगाना', 'भाँवर डालना', 'चट मंगनी पट ब्याह', 'जिसे पिया चाहे वही सुहागिन' आदि मुहावरों और लोकोक्तियों में विविध संस्कारों का उल्लेख मिलता है।
2. पौराणिक विश्वास और कथाओं की झलक :
भारतीय समाज धर्मानुरागी है। पुराणों में उल्लिखित पाप-पुण्य, स्वर्ग-नरक, कर्मभोग आदि में उसकी गहरी आस्था है। ये आस्था विश्वास और पुराणों में वर्णित कथाओं के सूत्र यहाँ प्रचलित मुहावरों और लोकोक्तियों में सहज सुलभ हैं।
जैसे- 'पाप धोना', 'माया रचना', 'हंस उड़ जाना', 'होई है सोई जो राम रचि राखा', 'घर का भेदी लंका ढाए' में पौराणिक विश्वास और कथाओं के दर्शन होते हैं।
3. ऐतिहासिकता का प्रतिबिम्ब:
लोक समाज इतिहास से सबक सीखता है और उसे वर्तमान में याद रखता है। साथ ही इतिहास की घटनाओं को भी वह विविध रूपों में स्मरणीय बनाता है। इस कार्य में मुहावरे और लोकोक्तियाँ भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं । इतिहासप्रसिद्ध घटनाओं को अपने में समेटे लोकोक्तियाँ और मुहावरे द्रष्टव्य हैं- 'सती होना', 'जयचन्द होना',
'सत्यवादी हरिश्चन्द्र होना', 'अंग्रेजी राज में पहनने को कपड़ा न खाने को अनाज आदि ।
4. जातिवाद का प्रतिबिम्ब :
लोक प्रचलित मुहावरों और लोकोक्तियों में हमें भारत में विद्यमान जाति-व्यवस्था का सहज बोध होता है। अनेक मुहावरे और लोकोक्तियाँ जाति विशेष के गुणों, व्यवहार को दर्शाते हैं। जैसे 'सौ सुनार की एक लुहार की', 'ठग मारे अनजान बनिया मारे जान', 'हजामत बनाना' आदि। इनमें कहीं जाति विशेष के गुणों का बखान होता है तो कहीं उन पर कटाक्ष भी देखने को मिलता है।
5. नैतिकता का प्रतिबिम्ब:
लोक समाज में प्रचलित मुहावरे और लोकोक्तियाँ नैतिकता को भी प्रतिबिम्बित करते हैं। जैसे- 'जैसा प्रदेश वैसा वेष', 'अधजल गगरी छलकत जाय', 'धूप में बाल सफेद न होना', 'ठेस लगे बुद्धि बढ़े' आदि से समाज की नीतियों का ज्ञान होता है।
6. आर्थिक स्थिति का प्रतिबिम्ब :
लोकोक्तियाँ और मुहावरे समाज की आर्थिक स्थिति को भी स्पष्ट करते हैं। अर्थ के महत्त्व को दर्शाते अनेक मुहावरे और लोकोक्तियाँ उपलब्ध हैं। जैसे- 'टका हो जिसके हाथ में वह है बड़ा जात में', 'घर में नहीं दाने अम्मा चली भुनाने', 'आटे दाल का भाव मालूम होना', 'छप्पर फाड़ कर देना' आदि।
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