हिन्दी की जनपदीय बोली - भोजपुरी - Regional dialect of Hindi - Bhojpuri

 हिन्दी की जनपदीय बोली - भोजपुरी - Regional dialect of Hindi - Bhojpuri


भोजपुर बिहार के शहाबाद जनपद में स्थित एक गाँव का नाम है, जो किसी समय उज्जैन के राजा भोज की राजधानी थी। इन्हीं की ख्याति और ऐश्वर्य के आधार पर इस प्रदेश को भोजपुर कहा गया और यहाँ बोली जाने वाली भाषा भोजपुरी कही गई। बौद्धकाल में यह 'मल्ल' जनपद भी था। राजा भोज के वंशजों ने, जिनकी उपाधि भोज थी तथा जिनके लिए उज्जैनी भोज कहा जाता था, उन्होंने जिस नगर को अपनी राजधानी बनाया, वह भोजपुर कहलाया । यह बिहार में डुमराव के निकट स्थित है। इन्हीं के वंशज वीर कुँवरसिंह 1857 में अंग्रेजों के विरुद्ध बगावती युद्ध लड़े जिनकी शौर्यगाथा इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित है। मध्यकालीन सत्ता से विद्रोह लेते- लेते यह राजवंश समाप्त हुआ।


सन् 1868 में इस क्षेत्र के लोगों की भाषा को भोजपुरी कहा गया। मुगल और अंग्रेज यहाँ के सैनिकों को बक्सरिया कहते थे। राहुल सांकृत्यायन ने 'मल्ली' शब्द का प्रयोग किया है। लेकिन कृष्णदेव उपाध्याय ने इसे अव्यवहारिक बताया है । जो भी हो, यह तो स्पष्ट है कि 'भोजपुरी' की पृष्ठभूमि 'मल्ली' है। भोजपुरी की 04 उपबोलियाँ हैं - (i) उत्तरी भोजपुरी, (ii) पश्चिमी भोजपुरी, (iii) दक्षिणी भोजपुरी और (iv) नागपुरिया भोजपुरी । ये बिहार के पश्चिमी जिलों में तथा उत्तरप्रदेश के पूर्वी जिलों में व्यवहार में लाई जाती हैं। विदेशों में मॉरिशस, फिजी तक तक इनका प्रचलन है। बोलियों में सर्वाधिक प्रयोग इसी भाषा का किया जाता है।

कृष्णदेव उपाध्याय के अनुसार "इसकी सीमा रेखा गंगा नदी से उत्तर में मुजफ्फरपुर जिले की पश्चिमी भाग जहाँ की भाषा मैथिली है। फिर इस नदी के दक्षिण में इसकी सीमा गया और हजारीबाग की मगही से मिल जाती है। यहाँ से हजारीबाग की मगही से घूमकर यह सम्पूर्ण राँची जिले के अधिकांश भागों में फैल जाती है। दक्षिण की ओर यह सिंहभूमि की उड़िया और गंगपुर की भाषा से परिसीमित होती है। यहाँ से भोजपुरी की सीमा जसपुर रियासत के मध्य से होकर रांगी पठार के सरहद के साथ-साथ दक्षिण की ओर जाती है। जिससे सरगुजा और पश्चिमी जसपुर की छत्तीसगढ़ी भाषा से इसका विभेद होता है। पलामू के पश्चिमी प्रदेश से गुजरने के बाद भोजपुरी भाषा की सीमा उत्तरप्रदेश के मिर्जापुर जिले के दक्षिण प्रदेश में फैलकर गंगा तक पहुँचती है।

यहाँ यह गंगा के बहाव के साथ पूर्व की ओर घूमती है और बनारस के निकट पहुँचकर गंगा पार कर जाती है।... मिर्जापुर के दक्षिण में छत्तीसगढ़ी से इसकी भेंट होती है। परन्तु उस जिले के पश्चिमी भाग के साथ-साथ उत्तर की ओर घूमने पर इसकी सीमा पश्चिम में पहले बघेलखण्ड की बघेली और अवधी से जा लगती है। "3 इसकी व्याप्ति बिहार के छपरा, चंपारण, आरा के साथ- साथ उत्तरप्रदेश के जौनपुर, मिर्जापुर, बनारस, बलिया, मउ, गाजीपुर, आजमगढ़, गोरखपुर, देवरिया कुशीनगर, सारन, चंपारण और बस्ती आदि जिले तक थी। संक्षेप में भोजपुरी के उत्तर में नेपाली, दक्षिण में उड़िया और छत्तीसगढ़ी, पूर्व में मैथिली और मगही तथा पश्चिम में अवधी और बघेली बोली तक परिसीमित है।


भोजपुरी की बोलियों के 03 भेद हैं- आदर्श भोजपुरी, पश्चिमी भोजपुरी और नागपुरिया । इसकी उपबोलियों में मधेसी तथा थारू हैं। इन बोलियों में मुख्य अन्तर 'ड' का रहता है। इसे कहीं 'र' या कहीं 'ड्र' बोला जाता है। जैसे घर के स्थान पर घड़, सड़क के स्थान पर सरक आदि ।


1. नगपुरिया भोजपुरी यह छोटा नागपुर में बोली जाती है। इसके शब्द, धातु और रूप छत्तीसगढ़ी के हैं। यह छत्तीसगढ़ी से प्रभावित है। छत्तीसगढ़ी बोली को बोलने वाला व्यक्ति नगपुरिया भोजपुरी को आसानी से समझ सकता है।


ii. मधेसी बोली इसका तात्पर्य है मध्यदेश की बोली से है। चंपारण जनपद की बोली को मधेसी कहते हैं।


इसकी लिखावट कैथी लिपि की वर्णमाला में होती है। iii. थारू : नेपाल की तराई और बहराइच से चंपारण तक थारू लोगों की यही भाषा है। इसे भोजपुरी का ही विकृत रूप कहते हैं।


भोजपुरी साहित्य में भौगोलिक उथल-पुथल तथा जीवन मूल्यों के उत्कर्ष - अपकर्ष विद्यमान हैं। भोजपुरी साहित्य में इस क्षेत्र का सम्पूर्ण इतिहास, भौगोलिक स्थिति, सामाजिक जीवन सचित्र अपना अक्स दर्शाता है। अनपढ़ स्त्रियाँ अतीत से वर्तमान तक का दर्शन लोक-साहित्य के माध्यम से दर्पण की भाँति कराती हैं। बाबू कुँवरसिंह की गाथा यहाँ की प्रमुखलोक गाथा है। बाबू कुँवरसिंह द्वारा अंग्रेजोंसे संघर्ष का वर्णन सुन हृदय रोमांच से परिपूर्ण हो उठता है।

एक अन्य कथा कुसुमादेई की कथा है जो तुर्कों की विषय- लोलुपता से जुड़ी है। कुसुमादेई ने अपने प्राण देकर अपनी लाज की रक्षा की थी। ये घटनाएँ ही भोजपुरी इतिहास को बखूबी लिखती हैं। लोक- गायक अपने क्षेत्र की घटना को अपने भीतर संजोकर अपने कण्ठ से मुखरित करता है। अंग्रेजी शासन के विरुद्ध गाँधी आन्दोलन इसी क्षेत्र से प्रारम्भ होता है। उस काल की स्थिति को प्रस्तुत लोक गीत में देखा जा सकता है।


गाँधी क आइल जमाना, देवर जेलखाना अब गइलें । जब से तपे सरकार बहादुर, भारत मरे बिन दाना ॥


स्त्रियों ने अपने लोक-गीतों में गाँधी, जवाहर, सुभाष की देशसेवा देखकर स्वयं को भी स्वतन्त्रता आन्दोलन में सम्मिलित करना चाहा है। लोक-गीतों में स्त्रियाँ देश की परतन्त्र दशा को देखकर कहती हैं- "ऐ विदेशी ! तुम्हारे राज में हम काठ के बर्तन को तरसते हैं जबकि पहले हम सोने थाली में जेवना परोसती थीं । भारत के लोग अन्न बिना मर रहे हैं और लंदन के कुत्ते हलवा-पूड़ी खा रहे हैं।”


इन लोक-गीतों में प्राचीन स्थानों के नाम तथा उन स्थानों की प्रसिद्ध वस्तुओं का वर्णन मिलता है। जैसे- मगही मगह का पान, मोरंग देश की सुपारी,

बनारस का बैद्य, पटना का हाथी और जरी, बनारस की साड़ी, जयपुर की रजाई, सकलाती अर्थात् सूरत का जूता, गुजराती मोतियों के गहने, सूरत के जौहरी की कला का वर्णन है। हाजीपुर का बाजार सर्वप्रसिद्ध है। जहाँ दहेज का सारा सामान मिलता है। भोजपुरी लोक गीतों में पूर्वी बनेजिया (कलकत्ता) में व्यापार करने जाने का प्रसंग लगभग सभी गीतों में मिलता है।


कलकतवा से मोर बलमु अइले हो राम ।


भोजपुरी लोक गीतों में अभिव्यक्त समाज का चित्रण किसी भी चैतन्य समाज का प्रतिनिधित्व करता है। भोजपुरी लोक गीत एवं लोक नाट्य में भिखारी ठाकुर का नाम सर्वविदित है। भोजपुरी एक व्यापक क्षेत्र की बोली है और इसका लोक-साहित्य भी उतना ही व्यापक हैं।

स्त्री-विमर्श के कुछ बिन्दु मौलिक रूप से बीज रूप में भोजपुरी लोक गीतों में विद्यमान हैं। भिखारी ठाकुर-कृत लोक गीत द्रष्टव्य है -


गमछा बिछाई दिहिल, रुपिया बटोरि लिहल, गइया के पगहा बनवल ऐ बाबूजी ।


बेटी का जन्म त्रियों के लिए कभी शुभ नहीं रहा, किसी ने शुभ नहीं माना। कभी सोहर नहीं गाया गाया, कोई थाली नहीं बजायी गई.


जो हम जनतीं कोखी, बेटी जनमिहें हो,


खड़तीं मरीचिया झरार हो।


बेटी का विवाह भी पिता के लिए किसी ग्रहण से कम नहीं। विवाह मण्डप में वह इस भय में रहता है कि न जाने कब कौन-सी माँग वर पक्ष की ओर से कर दी जाए-


चान गरहनवा बेटी साँझ ही लागेला, सुरुज गरहनवा भिनसार । धियवा गरहनवा मंडवा में लागेला, कबहोनी उगरह होइये ॥ समकाल में वही पिता का विद्रोही हो जाता है। जो हम जनती बेटी लागी हतियारी, तोहके रखर्ती कुंआर । चहे जमाना देइत हमरा के गारी, तोहके रखतीं कुंआर ॥


स्त्री अपनी अस्मिता की बात भी लोक-गीतों में कहती है। जेवनार गीत का उदाहरण देखिए-


अइसन राम के मुँह कइसे देखबि, गरभ दिहिले बनबास जी । फटती धरतिया बेवर होइ जइति हो, बलु सीता जइति समाइ हो ।