हिन्दी की जनपदीय बोली - कुमाऊँनी , गढ़वाली - Regional dialect of Hindi - Kumaoni, Garhwali

हिन्दी की जनपदीय बोली - कुमाऊँनी , गढ़वाली - Regional dialect of Hindi - Kumaoni, Garhwali


कुमाऊँ शब्द की व्युत्पत्ति कुर्मांचल से हुई है। इसका क्षेत्र नैनीताल अल्मोड़ा और पिथौरागढ़ के जिले हैं। ग्रियर्सन ने कुमाऊँनी की बारह उपबोलियाँ गिनायी हैं। इसका उद्गम खस है। इसके लोककवियों में गुमनियत और कृष्ण पाण्डेय प्रसिद्ध रहे हैं। कुमाऊँनी पर दरद, खस, राजस्थानी, खड़ीबोली हिन्दी आदि भाषाओं के अतिरिक्त किरात, भोट तथा तिब्बत्च्छनीय परिवार की भाषाओं का भी प्रभाव है। इसकी सांस्कृतिक शब्दावली हिन्दी से ली जाती है।



हिन्दी की जनपदीय बोली - गढ़वाली


कुर्मांचल की पश्चिमी सीमा पर यमुना तक का प्रदेश केदारखण्ड कहलाता है। इसके अन्य प्राचीन नाम तपोभूमि, इलावृत्त, देवभूमि तथा उत्तराखंड थे। 15वीं शती में पवार राजपूतों ने और बाद में बांग्ला के पाल राजाओं ने यहाँ पर राज किया। ठाकुरों के बावन गढ़ियों में विभक्त होने के कारण गढ़वाल या बारना नाम पड़ा जिसे आज उत्तराखंड कहा जाता है। इसके क्षेत्र गढ़वाल, चमोली, उत्तरकाशी, रुद्रप्रयाग, देहरादून और मसूरी हैं। टेहरी गढ़वाल की बोली आदर्श मानी जाती है। इस बोली में भोटिया, शक, किराक, नाँगा और खस जातियों की भाषाओं के नाना रूप एवं तथ्य सम्मिलित हैं। गढ़वाली लोक-गीतों के कई संग्रह प्रकाशित हुए हैं। गढ़वाली में प्यार के स्थान पर व्यार, सात के स्थान पर साँत, छाया के स्थान पर छाँया हो जाता है।