लोक-गीतों का प्रतिपाद्य - repertory of folk songs

लोक-गीतों का प्रतिपाद्य - repertory of folk songs


जीवन की सुमधुर झंकार हृदय का प्रेम, मन की पुकार, माँ का दुलार, विरह का विलाप, सावन की फुहार, बसन्त की बहार जैसे सरल सहज, साफ-सुथरे अनगिनत गेयात्मक तथा लयात्मक भावों की अभिव्यक्ति का नाम लोक गीत है। हृदय की गहराइयों से सहज रूप में फूट पड़ने वाले ये लोक गीत लोक-मानस की लोक-लहर हैं। लोक-गीतों के इस सौन्दर्य में मनुष्य जीवन के समस्त रंग समाहित हैं। मनुष्य का बचपन लोरियों में झूलता है, यौवन प्रेममय रंगों से रंगीन रहता है तथा बुढ़ापे की जीवन यात्रा इन गीतों में विश्राम पाती है। सच्चे अर्थों में, लोक गीत ही लोक-संस्कृति के उन्नत दर्पण होते हैं। लोक गीत प्राचीन होते हुए भी नितप्रति नूतन हैं।


लोक गीत लोक-मानस का वह केन्द्र स्थल है, जिसमें मनुष्य की कल्पनाएँ और भावनाएँ अंकुरित और पल्लवित होती हैं। लोक-गीतों में जीवनानुभूत सच्चाई, प्रणय की मधुर व्यंजना, विरह-वेदना की पीड़ा साहित्य, संगीत तथा कलात्मक वैभव के साथ-साथ संस्कार रूपी झरने व सामाजिक रीति-रिवाज तथा परम्पराओं के महानद हिलोरे लेते हैं। लोक-गीतों की सृष्टि में शास्त्रीय गायन से विलग भावों की सौंधी महक से सामूहिकता की इन्द्रधनुषी छटा बिखरी पड़ी है। डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी के कथनानुसार "लोक गीत की एक- एक बहू के चित्रण पर रीतिकाल की सौ-सौ मुग्धाएँ और खण्डिताएँ न्योछावर की जा सकती हैं क्योंकि ये निरलंकार होते हुए भी प्राणमयी हैं और वे अलंकारों से विभूषित होने पर भी निष्प्राण हैं।

ये अपने जीवन के लिए किसी शास्त्र विशेष की मुखापेक्षी नहीं हैं। ये अपने आप में पूर्ण हैं।"


लोक गीत भावशील मनुष्य का रागात्मक स्वभाव है। ये भारतीय संस्कृति के समृद्ध भण्डार हैं, जिसमें भारतीय जन-जीवन प्रतिबिम्बित हो उठा है। मानव जीवन का कोई भी कोना इनसे अछूता नहीं रह पाया है। इसी कारण लोक गीत मात्र मनोरंजन तक ही सीमित नहीं हैं बल्कि इसका मूल प्रयोजन मनुष्य जीवन से जुड़ा हुआ है। लोक-गीतों के इस महत्त्वपूर्ण पक्ष को उजागर करते हुए शान्ति जैन ने लिखा है- "लोक-गीतों में लोक का समस्त जीवन चित्रित होता है। शिशु के प्रथम क्रन्दन से लेकर जीवन की अन्तिम कड़ी तक के भाव चित्र इनमें हैं।

भाई से मिलने को व्याकुल बहन की व्यथा-कथा, स्त्रियों का आभूषण प्रेम, सास, ननद तथा सौत के अत्याचारों से पीड़ित स्त्री की मनोव्यथा, कृषक परिवार की विपन्नता, वीरों की शौर्य गाथा तथा विरह के रंगारंग भाव इन गीतों में मिलते हैं। दूसरे शब्दों में इन लोक-गीतों में जीवन का शाश्वत सत्य झलकता है।"


महादेवी वर्मा के मतानुसार "सुख-दुःख की भावावेशमयी अवस्था विशेष को गिने-चुने शब्दों में स्वर- साधना के उपयुक्त चित्रित कर देना ही गीत है और इस गीत में सहज चेतना जुड़ जाती है तो वह लोक गीत बन जाता है।

लोक गीत गगनचुम्बी हिम-श्रेणियों के बीच में एक ऐसा सजल आलोकोज्ज्वल मेघखण्ड है, जो न तो इनके टूट-टूटकर गिरने वाले शिलाखण्डों से दबता है और न इन श्रेणियों की सीमाओं में आबद्ध होकर ससीम बनता है, प्रत्युत इन चोटियों का शृंगार करता है और संगीत लहरी के प्रत्येक स्पन्दन- कम्पन के साथ उड़कर उस विशालता के कोने-कोने की मादकता का सागर प्रस्तुत करता है।"


लोक-गीतों के रचनाकार, रचनाकाल और रचना-स्थल अज्ञात होते हैं। लोक गीत लोक की आत्मा हैं। ये जनता के वे मौखिक आख्यान हैं,

जो एक कण्ठ से दूसरे कण्ठ तक, एक हृदय से दूसरे हृदय तक गुंजायमान होते हुए पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तान्तरित होते हुए चले आ रहे हैं। हजारीप्रसाद द्विवेदी का कथन है- "लोक गीत जिसमें विराट् प्राण स्वयं गा उठता है। इसे सच ही Poetry of the people that Sings it self' कहा गया है। यह इसी कारण अलिखित और अनाम भी होता है।" लोक गीत अमर हैं तथा इनकी मर्मस्पर्शी गहराइयों को किसी भी देशकाल या परिस्थिति की विभाजन रेखा में नहीं बाँधा जा सकता है। लोक गीत लोकजीवन से पुष्ट होते हैं तथा लोकजीवन को सरसता भी प्रदान करते हैं। लोक-गीतों में जीवन रसाप्लावित होकर प्रकट हुआ है और इसीलिए लोक-गीतों का अपना बड़ा रंग-बिरंगा व महान् संसार है।