लोक कथा कथन में कथक्कड़ की भूमिका - Role of Kathak in folk story telling
लोक कथा कथन में कथक्कड़ की भूमिका - Role of Kathak in folk story telling
लोक कथा युगों से मौखिक परम्परा के रूप में प्राप्त वह विरासत है जो अत्यन्त विपुल और वैविध्यमय है। इसमें पुराण, इतिहास, समाज, धर्म, नीति, शौर्य, शृंगार सभी का समावेश हुआ है। लोकजीवन का ऐसा कोई प्रसंग नहीं, जो इसमें छूट गया हो। दूसरे शब्दों में कहें तो लोक-कथाओं में मनुष्य का आन्तरिक और बाह्य जगत् पूर्णरूप से प्रतिबिम्बित होता है। अर्थात् 'साहित्य समाज का दर्पण है' की उक्ति लोक कथाओं पर पूर्णतया चरितार्थ होती है। लोक कथा का वाचन मात्र लोकानुरंजन के लिए ही नहीं होतावरन इसके द्वारा नैतिक शिक्षा के लक्ष्य की भी पूर्ति होती है। यह लक्ष्य-पूर्ति तभी निश्चित हो सकती है जब वह अत्यन्त सरलता, सहजता और रोचकता के साथ लोक मानस और हृदय तक सम्प्रेषित,
संचरित हो जाए। तात्पर्य यह है कि कथा को प्रभावी बनाने और जन-जन तक पहुँचाने में कथा की वाचन शैली की भूमिका अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होती है।
लोक कथा का वाचन करने वाले कथाकार को 'कथक्कड़' कहते हैं। राजस्थानी में इनके लिए 'बातपोश' संज्ञा का भी प्रयोग होता है। कथक्कड़ की कथा वाचन की विशेष शैली होती है। अवसरानुकूल भाषा का प्रयोग, पात्रानुरूप अंगसंचालन, मर्मस्पर्शी दृष्टान्त योजना, उपयुक्त स्थान पर पद्योच्चारण, भावानुकूल स्वरारोह तथा विभिन्न प्रकार की मुखाकृति बनाना कथक्कड़ के विशिष्ट गुण माने जाते हैं जिनके द्वारा वह अपनी कथा को संगीतमय,
नाटकीय रोचक और प्रभावशाली बनाता है। कथक्कड़ के यही गुण उसे जन समाज में प्रतिष्ठित करते हैं। प्राचीनकाल में राज दरबारों में इन कथक्कड़ों को उचित स्थान और पर्याप्त आदर मिलता था। कथा कहने में कुशल कथक्कड़ ऐसे वातावरण की सृष्टि करता है कि श्रोता जिज्ञासावश एकाग्रचित होकर लोक कथा को सुनता है।
जैसा कि पूर्व में विवेचित है कि लोक कथा के निर्माण-तन्तु के रूप में अभिप्रायों का विशेष महत्त्व होता है। इन अभिप्रायों में पर्याप्त समानताएँ होने पर भी कथक्कड़ अपनी रचनाशीलता से कई प्रकार की लोक-कथाओं की उत्पत्ति संभाव्य बना देता है।
ब्लूम फील्ड के शब्दों में "सर्वत्र प्रत्येक कथक्कड़ और संग्रहकर्त्ता मानों ऐसा लगता है कि इन अभिप्रायों की समूची माला उठाता है जिसकी तुलना हम मनके की माला से कर सकते हैं उसे वह छिन्न-भिन्न कर देता है। जिससे मनके चतुर्दिक् बिखर जाते हैं और प्रारम्भ से वह इन मनकों को पिरोता है।" यहाँ यह बात भी उल्लेख्य है कि कथक्कड़ की मनोवृत्तियाँ, संस्कृति, आचार-विचार, आस्थाएँ और धार्मिक मान्यताएँ अभिप्रायों के परिवर्तन में बहुत सहायक होती हैं।
लोक कथा में कथक्कड़ के साथ ही श्रोता का भी महत्त्व होता है। श्रोता और कथक्कड़ के मध्य बेहतरीन तादात्म्य जहाँ सरसता का संचार करता है, वहीं इसकी कमी कथा को नीरस बना देती हैं।
इस तादात्म्य की आधारभूमि कथक्कड़ की वह विलक्षण प्रतिभा होती है, जो श्रोता के ध्यान को अपनी ओर केन्द्रित कर पाती है। इस प्रकार कथक्कड़ श्रोता के साथ तादात्म्य स्थापित करते हुए कथा का वाचन करता है और अपने मूल उद्देश्य को प्राप्त करता है। यहाँ कथक्कड़ की स्मृति प्रतिभा का उल्लेख करना भी अनिवार्य प्रतीत होता है। कथक्कड़ों की स्मरण शक्ति विलक्षण होती है। कई लोक-कथाओं का कलेवर इतना विस्तृत होता है कि उनका वाचन कई- कई रातों तक होता है।
विस्तृत कथानक को स्मरण रखने और उसे पुनः उसी रूप में सुनाने के लिए विलक्षण स्मरण शक्ति का होना भी आवश्यक होता है। कथक्कड़ इसमें भी पारंगत होते हैं और अपनी इसी क्षमता के आधार पर बड़े-बड़े कथानकों को याद रख जन मानस को आनन्दानुभूति कराते हैं।
स्पष्ट है कि श्रवण वाचन की परम्परा से जुड़ी लोक कथाओं के कथन में कथक्कड़ की भूमिका अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होती हैं। वह अपनी प्रतिभा के बल पर साधारण कथानक को भी विशिष्ट बना देता है। अपनी कथा के माध्यम से वह समाज में नैतिकता और व्यावहारिक ज्ञान का प्रकाश फैलाता है। कथक्कड़ अपनी कथा के माध्यम से प्राचीन और नवीन में सुन्दर समन्वय स्थापित करता है।
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