लघुगीत - short song

लघुगीत - short song


लोक-साहित्य की विविध विधाओं में लोक गीत अग्रगण्य हैं। लोक समाज में प्रचलित विविध गीतों का अध्ययन आपने लोक गीत से सम्बन्धित पाठ में किया होगा। लघुगीत को उसके रूपाकार के कारण प्रकीर्ण साहित्य के अन्तर्गत स्वीकार किया जाता है। लघुगीत को हम मोटे तौर पर दो वर्गों में विभाजित कर सकते हैं -


1. शिशुगीत


शिशुगीत से तात्पर्य उन गीतों से है जो नन्हें बच्चों को सुलाने खिलाने और खेलाने के लिए उनकी माता, धाय अथवा स्वजनों द्वारा गाये जाते हैं। शिशु को सुलाने के दौरान गाये जाने वाले गीत को 'लोरी' भी कहते हैं।

ये गीत संगीतात्मकता से परिपूर्ण होते हैं जिनके श्रवण से शिशु शीघ्र ही निद्रा की आगोश में चले जाते हैं। इन लोरियों में माता के हृदय का वात्सल्य भाव सहज ही दृष्टिगोचर होता है। राजस्थान में प्रचलित 'लोरी' इस प्रकार है -


सो जावौ नंदजी रा लाल, गाऊँ थानै हालरियौ ।


सो जावी जसोदा रा लाल, गाऊँ थाने हालरियो । पीपळ तळ बाँधू पालणो, नीचे बिछाऊँ म्हारो चीर, श्यामजी ने हालरियौ । चंदा के रो बण्यो पालणौ, रेशम री लम्बी डोर, श्यामजी ने हालरियो ।


उपर्युक्त लोरी में माँ अपने शिशु में कृष्ण की छवि देखती है और स्वयं को यशोदा मान उससे सोने का आग्रह करती है। लोरियाँ जहाँ एक ओर माता के मातृत्व को तृप्त करती हैं वहीं दूसरी ओर मधुर स्वरों के कारण शिशु के मन-मस्तिष्क पर सकारात्मक प्रभाव डालती हैं। ये लोरियाँ लघु आकार होने पर भी पूरे कुटुम्ब से शिशु का साक्षात्कार कराने की अद्भुत क्षमता से युक्त होती हैं। जैसे-


हालर हूलर लल्ला ने गावाँ,


दूध बताशा लल्ला ने खिलावाँ,


ऐंटी-चूटी बाटकी (कटोरी) भइया ने चटावाँ । भइया नहीं चाटै तो दीदी ने चटावाँ।


इस प्रकार परिवार के समस्त सदस्यों के नाम लिये जाते हैं। ये गीत शिशु को परिवार की पहचान कराने का काम ही नहीं करते वरन् प्रकृति के साथ जोड़ने में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। चाँद को प्रायः प्रत्येक प्रदेश की माँ ने मामा के रूप में इंगित किया है। चाँद से सम्बद्ध गीत इस प्रकार है-


चंदा मामा दूर के, पुए पकाए पूर के । आप खाए थाली में, मुन्ने को दे प्याली में। प्याली गई टूट मुन्ना गया रूठ। बजा-बजा के तालियाँ, मुन्ने को मनाएँगे।


दूध बताशा खाएँगे।


शिशु गीतों में स्वर, लय और ध्वनि के चमत्कार को महत्त्व दिया जाता है और नाद-सौन्दर्य के लिए वर्णों की पुनरावृत्ति की प्रवृत्ति पाई जाती है। इन गीतों से शिशु का मनोरंजन मात्र ही नहीं होता वरन् उन्हें गीत की प्रतिक्रियास्वरूप कुछ करने की प्रेरणा भी मिलती है जिससे उनके शारीरिक-मानसिक विकास पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। उदाहरणार्थ "ताली-ताली नन्दा, भज गोविन्दा ।" इस पंक्ति को गाते हुए जब ताली बजायी जाती है तो उससे आकर्षित और उत्साहित होकर शिशु भी प्रतिक्रियास्वरूप ताली बजाता है। इन गीतों में धार्मिक भावना के भी सहज दर्शन होते हैं। इस प्रकार शिशु को सुलाने खिलाने और खेलाने के गीत जो शिशुगीत कहलाते हैं, रूपाकार में छोटे होकर भी कानों को सुहाने वाले होते हैं। ये गीत माता और शिशु के मध्य एक सुन्दर सुमधुर रिश्ते को कायम करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करते हैं।


2. खेलगीत :


खेल बाल्यावस्था की वह महत्त्वपूर्ण गतिविधि है जो बालकों के शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक विकास और सामाजिकता के लक्षणों का विकास करती है। बालवृन्द विविध खेल खेलते हुए जो गीत गाते हैं, उन्हें खेल- गीत कहते हैं। इन गीतों में नृत्य, अभिनय, बुद्धि परीक्षा, वाक् चातुर्य, लोक व्यवहार, मनोरंजन, शिक्षा आदि का समावेश पाया जाता है। खेल के दौरान इन गीतों को गाने से बालकों का उत्साह सुना हो जाता है। विविध खेलों के दौरान गाये जाने वाले गीत इस प्रकार हैं-

अक्कड़-बक्कड़ बम्बे बो,


अस्सी नब्बे पूरे सौ


सौ में लगा धागा, चोर निकल कर भागा।


और भी,


कोड़ा जमालशाही, पीछे देखे मार खाई।


बाल्यावस्था चंचलता और चपलता से युक्त होती है। इस अवस्था में बालक विभिन्न परिस्थितियों में हास्य के अवसर ढूँढ़ते हैं। वर-यात्रा को देखकर बाल-मन हास्य के लिए बोल पड़ता है- -


बींद राजा खावै खाजा,


खाजा में पड़गी माखी, बींद राजा डाकी ।


(बींद दूल्हा, माखी मक्खी, डाकी = पेटू) = =


इन लघुगीतों में लोकप्रचलित मान्यताओं और त्योहारों का भी स्वाभाविक चित्रण मिलता है। उदाहरण के लिए राजस्थान में बाल-विवाह की परम्परा रही है। अक्षय तृतीया को विवाह का अबूझ श्रेष्ठ मुहूर्त माना जाता है। इस दिन कई नन्हें-मुन्ने बालक-बालिका विवाह बन्धन में बाँध दिए जाते थे। वर्तमान में इस प्रथा का चलन नहीं है तथापि बालक-बालिकाएँ दूल्हा-दुल्हन का वेश धारण कर घर-घर जाते हैं और त्योहारी प्राप्त करते हैं। इस दौरान वे ये गीत गाते हैं-


आखा तीज, बांडा बीज ।


गळवाणी रो, गळ्यो खीच ।


आयी म्हारी आखातीज ||


वर्षा ऋतु में बारिश में भीगते, उछलते-कूदते बालकों की टोलियाँ बादलों को सम्बोधित करते हुए गाती


है-


मेह बाबा आ जा, घी ने रोटी खा जा। आयो बाबो परदेसी, अबै जमानो कर देसी । ढाकणी में ढोकळो, मेह बाबो मोकळो ॥


इस प्रकार विविध प्रकार के खेल, त्योहार और ऋतुओं से सम्बन्धित लघुगीत प्रायः प्रत्येक प्रदेश में थोड़े- बहुत अन्तर के साथ उपलब्ध हो जाते हैं। ये खेलगीत, शिशुगीत यद्यपि अर्थ चमत्कार से युक्त नहीं होते हैं किन्तु इनमें विद्यमान सरलता और माधुर्य सहज ही अपनी ओर आकृष्ट करने की विशेष क्षमता रखते हैं। अतः कहा जा सकता है कि ये लघु गीत रूपाकार में छोटे होकर भी बालमन के असंख्य मनोभावों और माताओं के वात्सल्य को अपने में आत्मसात् किये हुए हैं।