भारतेन्दु की कविताओं में अभिव्यक्त सामाजिक चेतना - Social consciousness expressed in the poems of Bhartendu

भारतेन्दु की कविताओं में अभिव्यक्त सामाजिक चेतना - Social consciousness expressed in the poems of Bhartendu


भारतेन्दु के समय का समाज अनेक धार्मिक और सामाजिक आडम्बरों से ग्रस्त था। जाति-पाँति, छुआ- छूत, सतीप्रथा, बालविवाह, विधवाओं से भेदभाव, स्त्री-अशिक्षा, धार्मिक कर्मकाण्ड जैसी अनेक समस्याओं से समाज जूझ रहा था। ऐसे में ब्रह्म समाज, आर्य समाज, तदीय समाज और प्रार्थना समाज जैसे अनेक सामाजिक- सांस्कृतिक संस्थानों ने इन कुरीतियों के विरोध के माध्यम से सामाजिक सुधार का आन्दोलन खड़ा किया। इसी समय भारतेन्दु ने भी अनेक सामाजिक विकृतियों का विरोध करते हुए आम जनता की चेतना को जाग्रत किया।


भारतेन्दुयुगीन समाज में छुआछूत और ऊँच-नीच का विचार एक गम्भीर समस्या थी । भारतेन्दु ने अपने काव्य-सृजन में इसका पुरजोर विरोध किया। इसके साथ ही समाज की दूसरी बड़ी समस्या नारी विषयक थी। ऐसे समाज में कन्यावध, बालविवाह, विधवाओं की दुर्दशा और स्त्री - अशिक्षा जैसी भयानक समस्याओं से नारियों की दशा अत्यन्त दयनीय बनी हुई थी। भारतेन्दु ने स्त्री-शिक्षा और विधवा विवाह के समर्थन में खुलकर लिखा। वे बाल-विवाह के विरोधी थे । वे स्त्री और पुरुष की समानता के पक्षधर थे। इस सन्दर्भ में उनकी 'बाला बोधिनी' के मुखपृष्ठ पर अंकित पंक्तियाँ उल्लेखनीय हैं-


जो हरि सोई राधिका जो शिव सोई शक्ति । जो नारी सोई पुरुष यामैं कुछ न विभक्ति ॥ "


उस समय के समाज की अनेक बुराइयों के पीछे समाज की रूढ़िवादी सोच और धार्मिक अन्धविश्वास था । भारतेन्दु ने इन दोनों पर आघात किया। धार्मिक अन्धविश्वासों का पर्दाफाश उन्होंने 'भारत दुर्दशा' नाटक में इस प्रकार किया है-


जाति अनेक करी नीच अर ऊँच बनाओ। खान पान सम्बन्ध सो वरजि छुड़ायो । जन्म पत्र विधि मिले ब्याह नहिं होन देत अब । बालकपन में व्याहि प्रीतिबल नास कियो सब ॥



करि कुलान के बहुत ब्याह बल बीरज मार्यो । विधवा ब्याह निषेध कियो विभिचार प्रचार्यो ।

रोकि विलायत गमन कूपमण्डूक बनायो । औरब को संसर्ग छुड़ाइ प्रचार घटायो । बहु देवी-देवता भूत प्रेतादि पुजाई । ईश्वर सो सब विमुख किए हिन्दू घबराई ॥


भारतेन्दु ने समकालीन समाज की अनेक विकृतियों का खुलकर विरोध तो किया ही साथ ही आम जनता को जाग्रत करने का प्रयास भी किया। उन्होंने धर्म और समाज की अनेक रूढ़ियों को छोड़कर नये ज्ञान-विज्ञान और तकनीक से जुड़ने के लिए जनता को बार-बार प्रेरित किया। जाहिर है भारतेन्दु का समाज बोध किसी जाति, वर्ग या धर्म तक संकुचित नहीं है बल्कि समूचे भारतीय समाज के मंगल का बृहत् स्वप्न गढ़ने वाला है।