'देखी तुमरी कासी' में अभिव्यक्त समाज - Society expressed in 'Dekhi Tumri Kasi'

'देखी तुमरी कासी' में अभिव्यक्त समाज - Society expressed in 'Dekhi Tumri Kasi'


'देखी तुमरी कासी' नामक कविता भारतेन्दु के प्रमुख नाटक 'प्रेमजोगिनी' (1875 ई.) का अंश है। इसमें भारतेन्दुने 'परदेशी' के द्वारा तत्कालीन काशी की दुर्दशा का वर्णन किया है। वस्तुतः यह कविता काशी के बहाने से अंग्रेजी शासन के समय के भारतीय समाज का नग्न यथार्थ प्रस्तुत करती है। इसमें "भारतेन्दु ने अंग्रेजी शासन में भारतीय समाज में होने वाले अनर्थकारी परिवर्तन की ओर ध्यान दिलाया है। "25


भारतीय समाज की दुर्दशा के लिए भारतेन्दु ने अनेक कारणों को जिम्मेदार माना । जैसे अंग्रेजी शासन की नीतियाँ, भारतीय समाज में व्याप्त सामाजिक-धार्मिक आडम्बर और रूढ़ियाँ, भारतीय लोगों का आलस्य,

अकर्मण्यता, नशाखोरी तथा कायरता 'देखी-तुमरी कासी' कविता में भारतेन्दु ने बिना किसी लाग-लपेट के इन मुद्दों को उठाया है और तत्युगीन काशी के जर्जरतन्त्र को भारतेन्दु ने बेपर्दा कर दिया है। यह कविता काशी के समाज के अमीर-गरीब, ब्राह्मण, संन्यासी, रंडी, भाट, दलाल सबके विकृत मानस को उजागर करती है। मन्दिरों, सड़कों, बाज़ारों, घाटों की दुर्दशा, ब्रिटिश प्रशासन की अराजक स्थिति, कचहरियों में व्याप्त भ्रष्टाचार और धार्मिक क्षेत्र में व्याप्त अकाल को 'देखी तुमरी कासी' के माध्यम से समझा जा सकता है-


आधी कासी भाट भंडेरिया बाम्हन औ संन्यासी । आधी कासी रंडी मुंडी रॉड़ खानगी खासी ॥


लोग निकम्मे भंगी गंजड़ लुच्चे बे- बिसवासी । महा आलसी झूठे शुहदे वे फिकरे बदमासी ॥


आप काम कुछ कभी करें नहिं कोरे रहें उपासी । और करे तो हँसे बनावें उसको सत्यानासी ॥ *


इस तरह भारतेन्दु ने इस कविता के माध्यम से तत्कालीन काशी और समूचे भारत की जर्जर स्थिति को पाठकों के समक्ष प्रतिबिम्बित किया है। यह कविता भारतेन्दुयुगीन समाज का कटु यथार्थ है ।