फिजी की सामाजिक-सांस्कृतिक गतिशीलता (इंडो-फीजियन संदर्भ) - Socio-cultural dynamics of Fiji (Indo-Fijian context)

फिजी की सामाजिक-सांस्कृतिक गतिशीलता (इंडो-फीजियन संदर्भ) - Socio-cultural dynamics of Fiji (Indo-Fijian context)


फिजी की समृद्ध संस्कृति स्वदेशी, भारतीय, चीनी और यूरोपीय परंपरा का मिश्रण है। संस्कृति अनेक पहलुओं से मिलकर बनी है, जिनमें सामाजिक व्यवस्था, परंपरा, भाषा, भोजन, वेशभूषा, विश्वास प्रणाली, वास्तुकला, कला, शिल्प, संगीत, नृत्य और खेल आदि शामिल हैं। आबादी का अधिकांश फीजियन मूल की संस्कृति से प्रेरित है और इसका दर्शन दिन प्रतिदिन के जीवन में होता है। फीजियन संस्कृति पर भारतीय और चीनी संस्कृति के साथ ही यूरोपीय संस्कृति का भी काफी प्रभाव है। इन सभ्यताओं के मिश्रण ने फिजी की संस्कृति को एक अद्वितीय और राष्ट्रीय पहचान दिलाई है।


भारतीय संस्कृति को बनाए रखने के लिए फिजी वासी साथ मिलकर भारतीय रीति रिवाजों को संजोये फिजी में मनोरंजन का कार्यक्रम करते हैं जिससे वहाँ पर अपनी संस्कृति की पहचान बनी रहे। भारत और फिजी गणराज्य ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंधों से जुड़े हुए हैं। 14 मई, 1879 को भारत से पहली बार गिरमिटिया श्रमिकों के साथ 'लेओनिडास' जहाज फिजी के समुद्रतट पर पहुँचा। बाद में भारत से अधिक जहाजों के आगमन के साथ उनकी संख्या में वृद्धि हुई। करारबद्ध कुली प्रथा 1916 ई. में समाप्त हो गई थी।

इस प्रकार 1879 से 1916 तक कुल 37 वर्षों तक भारत से मजदूरों का आयात जारी रहा, जिन्हें ‘गिरमिटिया मजदूर भी कहा जाता था। 37वर्षों में भारत से कुल 87 जहाजी यात्राओं द्वारा कुल 60553 करारबद्ध मजबू फिजी आए थे। फिजी जाने वाले इन मजदूरों में अधिकाशत: बिहार, संयुक्त प्रांत, पश्चिमी संयुक्त प्रांत पंजाब तथा मद्रास के निवासी होते थे। इन मजदूरों में यद्यपि अधिकांशतः पिछड़ी और दलित जातियों जैसे- अहीर, चमार, कहार, कोइरी, कुम्हार, कुर्मी, लोध और तेली जाति के लोग थे, परंतु ब्राह्मणों और राजपूतों जैसी सवर्ण जातियों के लोगों की संख्या भी बहुत कम नहीं थी ।


इन श्रमिकों की संतान जो अब पाँचवी पीढ़ी है, जनसंख्या का लगभग 38 प्रतिशत है और देश के आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक ताने-बाने का हिस्सा हैं।

उन्होंने अपने पारंपरिक भारतीय सांस्कृतिक संबंध बनाए रखे हैं। विदेशों में बसे भारतीयों की उपस्थिति से दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय संबंधों में बहुत योगदान मिला है।


भारतीय सांस्कृतिक केंद्र (आई. सी. सी.), सुवा भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद द्वारा विदेश में 1972 ई. में स्थापित पहला सांस्कृतिक केंद्र था। आई.सी.सी., सुवा कर्नाटक स्वर संगीत, कथक और भरतनाट्यम् नृत्य, भारतीय शास्त्रीय वाद्य यंत्र- सस्वर तबला, हारमोनियम,

योग और हिंदी में पाठ्यक्रम संचालित करता है। आई. सी. सी. उपकेंद्र, लौतोका भरतनाट्यम नृत्य, भारतीय शास्त्रीय वाद्य यंत्र- सस्वर तबला / हारमोनियम और योग में पाठ्यक्रम संचालित करता है। सभी विषयों का संचालन शुरुआती मध्यवर्ती और उन्नत तीन समूहों में प्रत्येक मानकीकृत पाठ्यक्रम के साथ, अंशकालिक स्थानीय शिक्षकों द्वारा किया जाता है। सभी कक्षाएँ निःशुल्क हैं।


आई.सी.सी. नियमित कक्षाओं की गतिविधियों के साथ-साथ, सांस्कृतिक संध्या प्रदर्शनियों, फिल्म शो, नृत्य और संगीत का प्रदर्शन, सेमिनारों और कार्यशालाओं का आयोजन भी करता है।

आई. सी. सी., सुवा भारतीय संस्कृति और विरासत के पहलुओं पर व्याख्यान एवं प्रदर्शन के साथ ही पुस्तकों एवं संगीत वाद्य यंत्रों का उपहार को जैसी सेवा की गतिविधियाँ भी चलाता है।


फिजी के भारतवंशी आज भी अपने धर्म को लेकर जागरूक हैं। फिजी वासी होने के बावजूद भी सभी भारतवंशी अपने-अपने धर्म को अपनाए हुए हैं और इस तरह की ख़बरों को वहाँ का अखबार विशेषकर शांतिदूत बहुत ही तवज्जो के साथ प्रकाशित करता है।

फिजी में पहुँचे अप्रवासी भारतीयों ने न सिर्फ अपनी सभ्यता और संस्कृति को संरक्षित करके रखा अपितु विविध क्षेत्रों में कामयाबी के परचम भी फहराए। मॉरीशस के बाद फिजी ही ऐसा देश है जहाँ भारतीय मूल के नागरिक वहाँ की लोकतांत्रिक व्यवस्था के सर्वोच्च पद प्रधानमंत्री तक पहुँचे। फिजी में भारतीय और वहाँ के मिश्रित संगीत पर मौलिक धुनें जनमानस के व्यवहार का सामान्य हिस्सा हैं। भारतीय घरों में आरती और हनुमान चालीसा के पाठ आम तौर पर सुने जा सकते हैं। अन्य देशों की तरह भव्यता एवं वैभव का प्रतीक दीपावली यहाँ भी पूरी आस्था और निष्ठा से मनाई जाती है। इस त्यौहार को धार्मिक मान्यताओं के साथ-साथ सांप्रदायिक सौहार्द के रूप में भी मनाया जाता है।


भारत के समान ही फिजी में हिंदू सिख, आर्यसमाजी, मुस्लिम, कबीरपंथी आदि हैं, उनके संगठन और धार्मिक स्थल हैं एवं इनकी सांस्कृतिक धार्मिक गतिविधियाँ भी होती रहती है। इन इंडो- फिजियन लोगों की ये धार्मिक गतिविधियाँ एवं उनके साथ संलग्नता उन्हें समुद्रपारीय देशों में धार्मिक पहचान देते हुए उन्हें अपने मूलदेश से जोड़ने का कार्य करती है। फिजी में चलने वाले अनेक स्कूलों में भारतीय तौर-तरीकों से पढ़ाई की व्यवस्था है। भारत की कई आध्यात्मिक-सामाजिक संस्थाओं की वहाँ सक्रिय शाखाएँ हैं। आर्य समाज का यहाँ के भारतीय जनजीवन में अभूतपूर्व योगदान है। आर्य समाज द्वारा संचालित संस्थाएँ यहाँ की शैक्षिक गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं।

सन् 1904 से यहाँ आर्य समाज अपने विभिन्न आयोजनों द्वारा भारतीयता की अलख जगाए हुए है। वैदिक तौर-तरीकों से यहाँ के प्रत्येक संस्कार संपन्न किए जाते हैं। फिजी की कुल आबादी का 38 प्रतिशत भारतीय समुदाय है। फिजी में आप भारत के साक्षात दर्शन कर सकते हैं।



यहाँ अंग्रेजी, फिजी हिंदी आदि कई भाषाएं बोली एवं प्रयोग में लाई जाती है। फिजी में बोली जाने वाली हिंदी अवधी भाषा का ही स्वरूप है। फिजी में अवध क्षेत्र का बहुत प्रभाव है, वहाँ रामायण का बोली में भी बहुत प्रभाव है।

अवध में प्रयुक्त शब्दावली आज भी ज्यों की त्यों यहाँ प्रचलित है, जैसे सब्जी पेठा / सीताफल को कोहड़ा, पूड़ी को सोहारी, पैर को गोड़ आदि कहा जाता है। इसका मूल कारण वहाँ भारतीय अनुबंधित गिरमिटिया लोग भारत के मुख्यतः अवध क्षेत्र के थे। राष्ट्रकवि पंडित कमला प्रसाद मिश्र, हिंदी सेवी व मंत्री स्व श्री विवेकानंद शर्मा, प्रो. सत्येन्द्र नंदन आदि सभी की जड़ें भारतीय अवध क्षेत्र में है। इनके पूर्वज फैज़ाबाद, सुल्तानपुर, जौनपुर आदि जनपदों से गए थे। इसी कारण यहाँ की भाषा अवधी के रूप में विकसित हुई है और आज स्थानीय प्रभाव के कारण जिसे फिजी हिंदी कहते हैं।


फिजी हिंदी फिजी में बोली जाने वाली प्रमुख भाषा है। इसे फिजियन हिंदी या फिजियन हिंदुस्तानी भी कहते हैं।

यह फिजी की आधिकारिक भाषाओं में से एक है। यह अधिकांशतः भारतीय मूल के फिजी लोगों द्वारा बोली जाती है। फिजी हिंदी देवनागरी लिपि और रोमन लिपि दोनों में लिखी जाती है। यह मुख्य रूप से अवधी और हिंदी की अन्य बोलियों से व्युत्पन्न है जिसमें अन्य भारतीय भाषाओं का भी समावेश है। इसमें फिजी और अंग्रेजी से बड़ी संख्या में शब्द उधार लिए गए हैं। फिजी हिंदी में बड़ी संख्या में ऐसे अनूठे शब्द भी हैं, जो फिजी में रह रहे भारतीयों के नए माहौल में ढलने के लिए जरूरी थे। फिजी भारतीयों की पहली पीढ़ी,

जिसने इस भाषा को बोलचाल के रूप में अपनाया इसे 'फिजीबात' कहते थे। भाषाविदों के हाल के अध्ययन में इस बात की पुष्टि हुई है कि फिजी हिंदी भारत में बोली जाने वाली हिंदी भाषा पर आधारित एक विशिष्ट भाषा है, जिसमें फिजी के अनुकूल विशेष व्याकरण और शब्दावली है। आज फिजी में कई हिंदी लेखकों की फिजी हिंदी में साहित्यिक रचनाएँ निरंतर प्रकाशित हो रही है। प्रो. सुब्रमनी (डउका पुरान), प्रो. रेमण्ड पिल्लई ( अधूरे सपने), प्रो. ब्रिज विलास लाल, श्री महेंद्र चंद्र शर्मा 'विनोद' तथा बाबूराम शर्मा ने फिजी हिंदी को साहित्यिक गौरव प्रदान किया है।


मनोरंजन के क्षेत्र में चटनी संगीत भारतीय फिल्मों के अलावा इंडो फिजीयन विमल रेड्डी और सतीश राय द्वारा निर्मित फ़िल्में महत्वपूर्ण हैं। विमल रेड्डी ने हाई तो सुवा, अधुरा सपना, धार-परदेश जैसी फ़िल्में फिजी हिंदी भाषा में बनाई। सतीश राय फ़िल्मकार, निर्देशक और टी. वी. निर्माता हैं। सतीश राय की मनोरंजन के क्षेत्र में इन एक्साइल एट होम-ए फिजी इंडियन स्टोरी, एक पल, रिया, स्वर्ग से उडान, ख्यायिशें हजार मंजिल कहाँ, मिलाप, सहारा, स्पाईस ऑफ लाइफ (टी. वी. कार्यक्रम) आदि प्रमुख उपलब्धियाँ हैं।