भारत के विशिष्ट लोकोत्सव - Special folk festivals of India

भारत के विशिष्ट लोकोत्सव - Special folk festivals of India


भारतवर्ष में अनेक व्रत-उपवास, उत्सव, मेले, महापुरुषों की जयन्तियाँ, त्योहार आदि लोकोत्सव के रूप में मनाये जाते हैं। उनमें से कतिपय विशिष्ट लोकोत्सवों का परिचय इस प्रकार है-


01. गणगौर


यह राजस्थान प्रदेश का प्रमुख उत्सव माना जाता है। 'गण' का अर्थ 'शिव' तथा 'गौर' का अर्थ 'गौरी' या 'पार्वती' है। गणगौर की पूजा कर कुमारियाँ अपने लिए उपयुक्त वर तथा सुहागिनें अखण्ड सौभाग्य की कामना करती हैं। चैत्र कृष्ण प्रतिपदा से चैत्र शुक्ल तृतीया तक यह उत्सव चलता है।

'ईसर' व 'गवर' की मिट्टी से बनी मूर्तियों को स्थापित कर उनका शृंगार किया जाता है। प्रतिदिन इनकी पूजा की जाती है व भोग लगाया जाता है। स्त्रियाँ सुसज्जित होकर पूजा-अर्चना करती हैं व गणगौर के गीत गाती हैं। स्त्रियों द्वारा व्रत भी रखे जाते हैं। इसके अन्तिम दिन अर्थात् चैत्र शुक्ला तृतीया को गणगौर की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है व गणगौर की सवारी निकाली जाती हैं । तत्पश्चात इन मूर्तियों को जल में विसर्जित कर दिया जाता है।


हरियाणा व ब्रज प्रदेश में भी 'सांझी' नाम से लगभग इसी तरह का उत्सव स्त्रियाँ मनाती हैं, वहाँ सांझी के मेले भी लगते हैं।


02. रामनवमी


चैत्र शुक्ला नवमी को दशरथपुत्र राम का जन्मोत्सव सम्पूर्ण भारत में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। इस दिन राम दरबार की सवारी / झाँकी शाही ठाठ-बाट के साथ निकाली जाती है। घरों में नाना प्रकार के मिष्ठान्न बनाकर भोग लगाया जाता है। चैत्र नवरात्रि का अन्तिम दिन होने के कारण इस दिन नौ कुँवारी कन्याओं को नवदुर्गा का रूप मानते हुए उनकी पूजा की जाती है व उन्हें भोजन कराया जाता है।


03. अक्षयतृतीया


अक्षय तृतीया या आखा तीज वैशाख मास में शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को कहते हैं।

सर्वसिद्ध मुहूर्त के रूप में प्रसिद्ध इस दिन शुभ व मांगलिक कार्य जैसे विवाह गृह प्रवेश, वस्त्र आभूषणों की खरीददारी आदि कार्य किए जाते हैं। इस दिन पितरों को किया गया तर्पण तथा किसी और प्रकार का दान, अक्षय फल प्रदान करता हैं। लोक में इस दिन से शादी-ब्याह करने की शुरुआत हो जाती है। बड़े-बुजुर्ग अपने पुत्र-पुत्रियों के लगन का मांगलिक कार्य आरम्भ कर देते हैं। अनेक स्थानों पर छोटे बच्चे भी पूरी रीति-रिवाज के साथ अपने गुड्डा-गुड़िया का विवाह रचाते हैं। कुँवारी कन्याएँ अपने भाई, पिता तथा गाँव-घर और कुटुम्ब के लोगों को शगुन बाँटती हैं और गीत गाती हैं। अक्षय तृतीया सामाजिक व सांस्कृतिक शिक्षा का अनूठा त्यौहार है। कृषक समुदाय में इस दिन एकत्रित होकर आने वाले वर्ष के आगमन, कृषि पैदावार आदि के शगुन देखते हैं ।


04. गुरुपूर्णिमा


आषाढ़ शुक्ला पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा उत्सव मनाया जाता है। इस दिन गुरुदेव के प्रति अपनी श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करते हुए उनकी पूजा की जाती है व उनसे आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है।


05. रक्षाबन्धन


भाई बहिन के पवित्र प्रेम का प्रतीक यह त्योहार सम्पूर्ण भारत में श्रावण मास की शुक्ला पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। इस दिन बहनें सुसज्जित होकर अपने भाइयों की कलाई पर रक्षा सूत्र रूपी राखी बाँधती हैं और भाई की आरती उतारते हुए उसे मिठाई खिलाती हैं।

भाई सदैव उसकी सुरक्षा करने का वचन देते हुए उन्हें भेंटस्वरूप उपहार प्रदान करते हैं।


06. हरियाली तीज व कजली तीज


ये दोनों उत्सव क्रमशः सावन मास की शुक्ल तृतीया व भाद्रपद की कृष्ण तृतीया को मनाए जाते हैं। इस दिन सुहागिनें अपने सुहाग की दीर्घायु की कामना करते हुए व्रत रखती हैं तो कुंवारी कन्याएँ अपने लिए सुन्दर व सुशील वर की प्राप्ति हेतु तीज माता का व्रत रखती हैं। कुछ स्थानों पर हरियाली तीज का व्रत रखा जाता है तो वहीं कुछ स्थानों पर कजली तीज का इस दिन स्त्रियाँ सुन्दर वस्त्रों व आभूषणों से सजधज कर बागों में झूले झूलती हैं, गीत गाती हैं,

कई प्रकार में मनोरंजक खेल खेलती हैं, संध्या समय तीज माता की कथा श्रवण करती हैं, व पूजा करती हैं। तत्पश्चात चन्द्र-दर्शन कर, सत्तु आदि का भोग लगाती हैं व अपना व्रत खोलती हैं।


कार्तिक मास की कृष्ण चतुर्थी को भी लगभग इसी तरह का व्रत 'करवा चौथ' भी महिलाएँ रखती हैं, जिसमें वे पूरे दिन अन्न-जल ग्रहण नहीं करती हैं। संध्या समय चन्द्र-दर्शन करने व उसे अर्घ्य देने के पश्चात् ही वे जलपान करती हैं व अपना व्रत खोलती हैं।


07. नागपंचमी


नाग पंचमी का उत्सव भाद्रपद कृष्ण पक्ष की पंचमी को मनाया जाता है।

इस दिन घरों में दीवारों पर काजल व कुंकुम से नाग की आकृति बनाई जाती है व उसकी पूजा की जाती है। दूध व खीर का भोग लगाकर नाग देवता को प्रसन्न किया जाता है।


08. जन्माष्टमी


जन्माष्टमी का उत्सव सम्पूर्ण भारतवर्ष में भाद्रपद की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को कृष्ण जन्मोत्सव के रूप में बहुत ही श्रद्धा व उल्लास के साथ मनाया जाता है। इस दिन सुबह से लेकर कृष्ण जन्म के समय अर्थात् रात्रि बारह बजे तक उपवास रखा जाता है।

जन्माष्टमी के दिन 'माखन हांडी' जैसे विशेष अयोजन होते हैं। रात बारह बजे बालकृष्ण को दूध, दही, घी, तुलसी पत्र और शहद के पंचामृत का भोग लगाया जाता है। साथ ही विशाल घण्टाध्वनि से कृष्ण जन्म का हर्ष प्रकट किया जाता है। मथुरा का जन्माष्टमी उत्सव देशभर में प्रसिद्ध है।


09. गणेशचतुर्थी


गणेश चतुर्थी का उत्सव भाद्रपद की शुक्ला चतुर्थी को गणेश जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। स्थान-स्थान पर गणेश की मिट्टी से निर्मित मूर्तियाँ स्थापित की जाती हैं।

विशेष प्रकार के मोदक से गणेश को भोग लगाया जाता है व उनकी पूजा-अर्चना की जाती है। वैसे तो बहुत ही हर्षोल्लास के साथ यह त्योहार उत्तरभारत में लगभग सभी जगह मनाया जाता है परन्तु महाराष्ट्र का गणेशोत्सव अपनी विशिष्ट पहचान रखता है। गणेशोत्सव के अन्तिम दिन गणेश की मूर्ति को जल में विसर्जित कर दिया जाता है।


10. नवरात्रि


चैत्र एवं आश्विन मास की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमी तक प्रतिदिन नवदुर्गा के अलग-अलग रूपों की पूजा-अर्चना की जाती है।

लोग बहुत ही श्रद्धा के साथ इन नौ दिनों तक व्रत-उपवास रखते हैं व माता के भजन-कीर्तन करते हुए जागरणों का आयोजन करते हैं। यह समयावधि नवरात्रि के नाम से जानी जाती है। उत्तरभारत में वैसे तो नवरात्रि उत्सव सभी जगह बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है, परन्तु गुजरात प्रदेश में विशेष उत्साह के साथ माँ दुर्गा की मूर्ति स्थापित कर उनकी पूजा की जाती है तथा माँ दुर्गा की मूर्ति के समक्ष संध्याकाल में नौ दिन तक लगातार 'गरबा' नृत्य कर माँ को प्रसन्न किया जाता है।


11. दशहरा या विजयादशमी


बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक यह उत्सव आश्विन शुक्ल दशमी को प्रतिवर्ष मनाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि दाशरथि राम ने इसी दिन ने रावण का वध कर असत्य पर सत्य को विजय दिलाई थी।

उसी स्मृति में यह दिन विजयादशमी के रूप में मनाया जाता है। इस दिन राम परिवार की सुसज्जित झाँकियाँ निकाली जाती हैं व संध्याकाल में रावण का पुतला जलाया जाता है।


12. दीपावली


दीपावली का त्योहार कार्तिक अमावस्या को दीप जलाकर लक्ष्मी पूजन करके मनाया जाता है। दीपावली के पूर्व से ही घरों में साफ-सफाई का कार्य आरम्भ हो जाता है। दीपावली तक सफाई कार्य पूर्ण करके, रंग-रोगन कर घरों को नये जैसा चमका दिया जाता है। इस दिन घरों को दीपमाला से सजाया जाता है।

पूरा वातावरण दीपकों से जगमगा उठता है। नए वस्त्र धारण करके लोग लक्ष्मी पूजन करते हैं। बच्चे पटाखे छोड़ते हैं। घरों में नाना प्रकार के मिष्ठान बनाए जाते हैं। लोग एक-दूसरे के घर जाकर दीपावली की बधाइयाँ देते हैं। आपसी भाईचारे व सौहार्द की भावना को समेटे हुए यह भारतीय जनजीवन का एक अत्यन्त उल्लासमय त्योहार है।


13. भाईदूज


दीपावली के दूसरे दिन अर्थात् कार्तिक शुक्ला द्वितीया को यह त्योहार मनाया जाता है। इस दिन बहिनें अपने भाइयों की आरती उतारकर उनकी पूजा करती हैं, मिठाई खिलाती हैं।

भाई अपनी बहिनों को उपहार देते हैं। कई स्थानों पर बहिनें भी अपने भाइयों को उपहार भेंट करती हैं। यह भाई बहिन के स्नेह का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण त्योहार है, जिसे उत्तरभारत में, विशेषकर उत्तरप्रदेश में बहुत उत्साह के साथ मनाया जाता है।


14. शिवरात्रि


माघ कृष्ण त्रयोदशी को शिवरात्रि का उत्सव मनाया जाता है। इस दिन भगवान् शिवशंकर ने हलाहल- पान किया था, उसी स्मृति के रूप में शिवरात्रि मनाई जाती है। श्रद्धालु भक्तजन इस दिन उपवास रखते हैं।

शिवालयों को फूलों द्वारा सुन्दर सजाया जाता है, लोग शिवलिंग की पूजा करते हैं, प्रसाद चढ़ाते हैं। रात्रि में भजन कीर्तन करते हुए जागरण किये जाते हैं। इस दिन समस्त वातावरण भक्तिमय हो उठता है।


15. मकरसंक्रांति


मकर सक्रांति का पर्व 14 जनवरी को मनाया जाता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इस दिन मकर से सूर्य उत्तरायण हो जाता है जिसके फलस्वरूप दिन बड़े व रातें छोटी होने लगती हैं। यह उत्सव विशेष दान-पुण्य करते हुए मनाया जाता है । इस दिन गुड़ व तिल का सेवन करना स्वास्थ्यकर माना जाता है।

गुड़ व तिलों का दान भी इस दिन खूब किया जाता है। उत्तरभारत में इस दिन पतंगबाजी विशेष रूप से की जाती है। हरिद्वार आदि धार्मिक स्थलों पर मेले लगते हैं एवं अत्यन्त उत्साहपूर्वक दान-पुण्य किया जाता है।


16. बसन्तपंचमी


बसन्त पंचमी माघ शुक्ला पंचमी के दिन मनाई जाती है। यह दिन माँ सरस्वती के जन्मोत्सव के रूप में प्रतिवर्ष मनाया जाता है। इस दिन पीले वस्त्र पहने जाते हैं तथा विद्या की देवी सरस्वती की पूजा-उपासना की जाती


17. होली


प्रेम, मस्ती और रंगों का त्योहार होली हिन्दुओं का एक प्रमुख त्योहार माना जाता है। वैसे तो बसन्त पंचमी से ही ढोल व चंग की गूंज सुनाई देने लगती है। परन्तु होली के दिन तो सुबह से ही ढोल चंग व नगाड़े बजने लगते हैं। लड़कों का झुण्ड एक-दूसरे को तिलक लगाकर ढोल बजाता है। घरों में भाँति-भाँति के व्यंजन बनते हैं। बच्चे गुलाल उड़ाते और एक-दूसरे पर रंग डालते हैं। सायं काल मैदान में लकड़ियाँ उपले आदि इकट्ठे कर रखे जाते हैं तथा उनके बीचों-बीच पेड़ की लकड़ी प्रहलाद के रूप में रखी जाती है।

जब होलिका दहन किया जाता है तो प्रहलाद को बाहर निकाल दिया जाता है। इसका यही कारण है कि जब भक्त प्रहलाद को उसकी बुआ होलिका गोद में लेकर बैठ गई और दहन किया गया तो होलिका तो जल गई और प्रभु कृपा से प्रहलाद बच गए। उसी स्मृति में होलिका दहन किया जाता है। दहन के समय ढोल-नगाड़े बजते हैं। लोग टोलियाँ बनाकर चंग बजाते व फाग गाते हुए होली का आनन्द लेते हैं। दूसरे दिन 'धुलंडी होती है इस दिन रंगों से परस्पर होली खेली जाती है। शाम को लोग एक-दूसरे के घर जाकर होली की बधाई देते हैं।