लोक-साहित्य की अध्ययन-प्रक्रिया - study of folklore
लोक-साहित्य की अध्ययन-प्रक्रिया - study of folklore
लोक-साहित्य का अध्ययन एक जटिल कार्य है। इसके लिए अध्येता को सर्वप्रथम लोक भाषा का अध्ययन करना आवश्यक होता है। लोकभाषा के अन्तर्गत लोक-प्रचलित सम्पूर्ण साहित्य का अंकन किया जाता हैं। लोकभाषा ही प्रवेश द्वार है जिससे होकर ही लोक-साहित्य के विस्तृत अध्ययन क्षेत्र में प्रवेश किया जा सकता है। जिस क्षेत्र के लोक-साहित्य का अध्ययन करना हो सर्वप्रथम उस क्षेत्र की लोकभाषा से परिचित होना आवश्यक है अन्यथा उसमें सामर्थ्य ही नहीं होगा जो लोक-साहित्य की अध्ययन-प्रक्रिया को समझ सके ।
लोक-साहित्य की व्याप्ति अत्यन्त विस्तृत है । इतने व्यापक क्षेत्र का अध्ययन एक चुनौतीपूर्ण कार्य है।
नगरों में परिवेशीय परिवर्तन ग्रामीण परिवेश की अपेक्षा अधिक तीव्रता से होते हैं इसलिए नगरों में लोक-साहित्य का अध्ययन अनुसन्धान अधिक आवश्यक है। इसके लिए इस व्यापक क्षेत्र के प्रत्येक वर्ग और समाज से सम्पर्क कर तथ्यों का संकलन किया जाना चाहिए।
लोक-साहित्य का अध्ययन निम्नलिखित समूहों में किया जा सकता है-
1. अभिरुचि वाले संग्रहकर्त्ताओं द्वारा
2. शोधार्थियों द्वारा
3. साहित्यिक संस्थाओं द्वारा
4. विश्वविद्यालयों द्वारा
5. अनुदानित विभिन्न प्रकल्पों द्वारा
लोक-साहित्य के अध्ययन का कार्य व्यक्तिगत एवं सामूहिक दोनों रूपों से किया जा सकता है। संगठित रूप में समान रुचि वाले लोग यदि इस कार्य को करते हैं तो अद्भुत परिणाम मिल सकते हैं।
लोक-साहित्य का संग्रह एवं संकलन करना अत्यन्त क्लिष्ट कार्य है।
अध्ययन प्रक्रिया के लिए लोक- साहित्य का संग्रह करने के सन्दर्भ में डॉ. सत्येन्द्र ने निम्नलिखित विधियों का उल्लेख किया है-
1. पुस्तकों / पुस्तिकाओं पर नोट करना
2. त्वरा लेखन (शार्टहैंड) करना
3. ध्वनि को रिकॉर्ड करना (क) तरंग, (ख) तार, (ग) फीता, (घ) ध्वनि फिल्म ।
डॉ. सत्येन्द्र ने अपने शोध में 'ब्रज साहित्य मण्डल' की हिन्दी साहित्य परिषद् और संकलन पत्र के नमूने, संकलन सामग्री आदि का विधिवत विवरण भी दिया है।
संग्रहकर्त्ता कुशल कार्य दक्ष, सद्भावनापूर्ण एवं प्रशिक्षित हो तो वैज्ञानिक पद्धति से यह कार्य सम्पन्न किया जा सकता है। संग्रह कार्य हेतु कुछ महत्त्वपूर्ण बिन्दुइस प्रकार हैं-
1. एक स्थान के संग्रह के लिए एक समूह ही उचित होता है।
2. समूह को क्षेत्रीय इतिहास, भूगोल एवं संस्कृति का पूर्ण ज्ञान होना चाहिए।
3. लोक वार्ता, नृत्यकला, पुरातत्त्व, लोक-साहित्य और उसकी विभिन्न विधाओं से सम्बन्धित सामग्री का पृथक्-पृथक् संकलन किया जाना चाहिए।
4. सर्वेक्षण के समय सम्पर्क में आने वाले व्यक्तियों से लोक वार्ता सम्बन्धी जानकारी ग्रहण करनी चाहिए।
5. लोक वार्ता संग्रह या संकलन करने वाले अध्येता दो समूहों में होने चाहिए।
6. अध्येता सामान्य योग्यता वाले हों, उनकी साहित्य में रुचि हो, वे लोक-साहित्य मर्मज्ञों से तथ्य संग्रह करने में कुशल हों। लोक-साहित्य संकलनकर्त्ता त्वरित लेखन में दक्ष हो ।
7. लोक-साहित्य संकलनकर्त्ता तकनीकी रूप से कुशल हो और उसे अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की टेप सम्बन्धी जानकारी हो।
संग्रहकर्त्ता के दो उपादान माने गए हैं-
(क) आन्तरिक साधन
1. आत्म मुग्ध न होकर संग्रह-संकलन के क्षेत्र को महत्त्व देना ।
सम्बन्धित लोगों से आत्मीय सम्बन्ध स्थापित करना । स्थानीय नियमों का पालन करना एवं सुष्ठु तथा सज्जनतापूर्वक व्यवहार निभाना ।
2. उस क्षेत्र के लोगों की परम्पराओं के प्रति सम्मान व्यक्त करना तथा उनसे सहानुभूति प्राप्त करना।
3. अनुसन्धानकर्ता को चतुर और ज्ञानी होना चाहिए उसे अनुमान होना चाहिए कि कौन-सी सामग्री कहाँ प्राप्त हो सकती है !
4. जाँच-परख के पश्चात् ही किसी तथ्य को स्वीकार करना और परम्पराओं के लिए उस क्षेत्र के प्रचलित शब्दों को ही लेना चाहिए तथा स्थानीय भाषा के शब्दों का विवरण लिखना चाहिए।
5. सामग्री देने वाले का हुलिया और परिचय पत्र अवश्य लेना चाहिए।
6. जो सुना जाए वही लिखा जाना चाहिए। शब्दों को पर्याय नहीं देना चाहिए। कहीं अशुद्धि लगे तो स्वयं शुद्ध नहीं किया जाना चाहिए। इस प्रकार के संशोधक घातक सिद्ध होते हैं।
7. अधिकाधिक पाठों का संग्रह करना चाहिए। एक ही लोक गाथा के कथानक आदि में अन्य प्रान्त में भिन्नता हो जाती है अतः संग्रहकर्ता को जो भी पाठ जहाँ भी मिले उसे संग्रह कर लेना चाहिए। जैसे मूल आल्हा बुंदेलखंडी में है किन्तु वह साथ ही कन्नौजी और भोजपुरी में भी है। डॉ. कृष्णदेव उपाध्याय ने 'गोपीचंद लोक गाथा के तीन पाठों का संकलन किया है।
(ख) बाह्य साधन
साधन युक्त संग्रहकर्त्ता ही लक्ष्य तक पहुँच सकता है। संग्रहकर्ता को यत्र-तत्र बिखरी हुई सामग्री अत्यन्त चतुराई से एकत्र करनी चाहिए। लोक साहित्य के रत्न कहाँ और किसके पास है ! उसे प्राप्त करना ही उसका मुख्य ध्येय होना चाहिए।
1. नोटबुक, पेन, पेंसिल आदि विभिन्न रंगों के होने चाहिए।
2. कैमरा व्यक्ति, परिवेश, देवी-देवताओं एवं उनके घरों की बनावट आदि को ग्रहण करने में सहायक होता है ।
3. रिकॉर्डिंग मशीन (टप रिकॉर्डर) परम आवश्यक यंत्र है। इससे संकलनकर्ता का कार्य सरल हो जाता है।
वर्ष ऋतु में धान की रोपाई के समय गाये जा रहे गीत को लिपिबद्ध करते संकलनकर्ता की नोटबुक अथवा कागज़ भीग सकता है किन्तु उसी को बड़े आनन्द से टेप किया जा सकता है।
4. मुंडन, विवाह, गवना, छठ, होली, दशहरा, माता-पूजा आदि संस्कारों और पूजा-पाठ के अवसर पर फिल्म निर्माण कर संस्कृति की रक्षा की जा सकती है। लुप्त हो रही चीजों को संरक्षित और सुरक्षित करने में फिल्म निर्माण अधिक उपयोगी है। ऐसे संकलनों को पुस्तकालयों में रखा जाना चाहिए।
इस संकलन एवं संग्रह कार्य के माध्यम से लोक शब्दावली का अध्ययन किया जा सकता है। लोक शब्दावली के विकास में मानसिकता का अध्ययन तथा तत्सम रूपों का ज्ञान, उसकी प्रकृति, प्रत्यय विचार एवं प्रवृत्ति को जाना जा सकता है, जैसे 'र' परिनिष्ठित शब्द है किन्तु लोकभाषा में रामा, रमऊ, रमुआ, रमईया, - रामू जैसे अनेक रूप हैं।
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