नाट्य-धर्मिताएँ - theatrics
नाट्य-धर्मिताएँ - theatrics
प्राचीन भारतीय रंगमंच की दो प्रकार की नाट्यधर्मिताओं का उल्लेख प्राप्त होता है- (अ) नाट्यधर्मी और (ब) लोकधर्मी ।
नाटक के स्वरूप तथा उसके प्रमुख तत्त्वों, जैसे कथावस्तु, नेता व रस से सम्बन्धित नियमों व सिद्धान्तों को नाट्यधर्मी माना गया है। भरतमुनि ने नाट्यशास्त्र ग्रन्थ में यह स्वीकार किया है कि लोकजीवन वलोक नाट्य, नाट्य की वास्तविक आधारभूमि है। भरतमुनि ने लोक नाट्य (लोकधर्मी) को सहज-स्वाभाविक तो नाट्यधर्मी को विशेष कहा है।
लोक नाट्य लोकजीवन के मुँह-बोलते चित्र हैं।
इनमें लोकजीवन की सुख-दुखात्मक अनुभूतियों को अभिव्यक्ति मिलती है। लोक-नाट्यों का विषय-क्षेत्र अपरिमित है। लोक नाट्य को नाट्यधर्मी की भाँति शास्त्रीय कसौटी में कसकर नियमों में आबद्ध नहीं किया जा सकता क्योंकि लोक नाट्य लोकजीवन के भावों व सहज प्रवृत्तियों को लेकर चलते हैं और भावों को नियमों में बाँधना असम्भव-सा प्रतीत होता है। यही कारण है कि लोक-नाट्यों की आलोचना नाट्यशास्त्रीय नियमों को आधार बनाकर नहीं की जा सकती है।
भरतमुनि ने तेरहवें अध्याय में लोकधर्मी नाट्य-परम्परा पर विचार करते हुए इसके लक्षणों को इस प्रकार बताया है-
1. लोकधर्मी नाटक स्वाभाविक ढंग से प्रकट होने वाला नाटक है।
. इसके दो भेद होते हैं- (i) शुद्ध स्वाभाविक व (ii) विकृत स्वाभाविक ।
3. दोनों ही भेदों का मूलाधार लौकिक क्रियाएँ एवं लोक वार्ता है। 4. लोक नाट्य में अंग लीला का वर्णन है।
5. लोक नाट्य का अभिनय स्वाभाविक होता है।
6. लोक नाट्यों में अनेक स्त्री-पुरुष भाग लेते हैं।
दोनों प्रकार की नाट्य-धर्मिताओं के आधार पर दो नाट्य-रूप उभर कर आते हैं- (1) लोक नाट्य तथा (2) शिष्टनाट्य
इन दोनों प्रकार के नाट्य रूपों में मुख्य अन्तर है शास्त्रीय बन्धनों एवं नियमों, उप-नियमों में बँधने और - न बँधने का। लोक नाट्य सहज रूप में बिना साज-सज्जा एवं शास्त्रीय नियमों में आबद्ध हुए लोक मानस की कृति होता है जबकि परिनिष्ठित साहित्य की नाट्य विधा एक व्यक्ति विशेष की कृति होती है जो शास्त्रीय नियमों में पूर्णरूपेण आबद्ध रचना होती है।
लोक रंगमंच तथा नागरिक या साहित्यिक रंगमंच ( शिष्टनाट्य) का अन्तर करते हुए श्री जगदीशचन्द्र माथुर के विचार अवलोकनीय हैं- "लोक रंगमंच और नागरिक अथवा साहित्यिक रंगमंच में मुख्य अन्तर यह है कि लोक रंगमंच असाधारण विशेषत: देहाती जनता के दैनिक जीवन की एक प्रक्रिया है,
वह उनके दैनिक जीवन का एक अनिवार्य अंग रहा है। यह सामाजिक उद्देश्यों का एक माध्यम है जबकि नागरिक रंगमंच वर्ग-विशेष के लोगों के मनोरंजन का साधन है जो उनकी फुरसत के क्षणों का मन बदलाव के लिए आयोजित होता है।" दूसरे शब्दों में "लोक रंगमंच लोक समाज की देह का अंग है, नागरिक या साहित्यिक रंगमंच उसका बाहरी आभूषण, लोक- रंगमंच जीवन की उमंग की स्वाभाविक और अनायास अभिव्यक्ति है, नागरिक रंगमंच कलात्मक और चेष्टायुक्त अभिव्यक्ति ।"
भारतीय नाट्य समीक्षा में साहित्यिक नाटकों के वस्तु, नेता, रस व अभिनय जैसे तत्त्वों को आधार बनाया जाता है। वहीं लोक-नाट्यों के विषय में उपर्युक्त चारों तत्त्वों पर तो थोड़ा-बहुत विचार ही किया जाता है परन्तु यहाँ नृत्य, गीत, वेशभूषा तथा वाद्य जैसे तत्त्वों की प्रधानता रहती है जबकि शिष्ट-नाट्यों में इनकी कोई विशेष आवश्यकता अनुभव नहीं की जाती है।
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