लोक-गीतों के वर्गीकरण की परम्परा - tradition of classification of folk songs

लोक-गीतों के वर्गीकरण की परम्परा - tradition of classification of folk songs


हिन्दीभाषी प्रदेशों के लोक-गीतों के वर्गीकरण-परम्परा की आदिम कड़ी के रूप में श्री रामनरेश त्रिपाठी का नाम सर्वप्रथम लिया जाता है। उन्होंने अपने संकलन कार्य के आधार पर लोक-गीतों को कुल 11 वर्गों में विभक्त किया है-


01. संस्कार सम्बन्धी गीत


02. चक्की और चरखे के गीत


03. धर्म- गीत


04. ऋतु सम्बन्धी गीत


05. खेती सम्बन्धी गीत


06. भिखमंगी सम्बन्धी गीत


07. मेले सम्बन्धी गीत


08. जाति-गीत


09. वीर-गाथा


10. गीत-कथा


11. अनुभव के वचन


उपर्युक्त वर्गीकरण के उपरान्त कालक्रमानुसार वर्गीकरण के अगले सोपान पर श्री सूर्यकरण पारीक का नाम आता है । उन्होंने राजस्थानी लोक-गीतों का अध्ययन-संकलन करते हुए इन गीतों को कुल 29 वर्गों में विभक्त किया है-


01. देवी-देवताओं और पितरों के गीत


02. तीर्थों और बहिन के गीत


03. संस्कारों के गीत


04. भाई और बहिन के गीत


05. पति-पत्नी प्रेम के गीत


06. प्रेम के गीत


07. बालिकाओं के गीत


08. ग्राम-गीत


09. राजकीय गीत


10. धमालें


11. जन्म के गीत


12. वीरों के एवं ऐतिहासिक गीत

13. पशु-पक्षी सम्बन्धी


14. गाँवों के गीत


15. ऋतुओं के गीत


16. व्रत-उपवास और त्योहारों के गीत


17. विवाह के गीत


18. साले - सालियों के गीत


19. पणिहारियों के गीत


20. चक्की पीसने के गीत


21. चरखे के गीत


22. हरजस


23. देश-प्रेम के गीत


24. राज दरबार, मजलिस, शिकार


25. सिद्धपुरुषों के गीत


26. ग्वालों के गीत व हास्य गीत


27. शान्त रस के गीत


28. नाट्य-गीत


29. विविध गीत


वर्गीकरण के क्षेत्र में डॉ. सत्येन्द्र का नाम महत्त्वपूर्ण है। डॉ० सत्येन्द्र ने 1947 में अपने शोध-प्रबन्ध में लोक-गीतों को इस प्रकार वर्गीकृत किया है-


1. जन्म के गीत


2. विवाह के गीत


3. त्योहार, व्रत और देवी आदि के गीत


4. अन्य विविध गीत


5. प्रबन्ध गीत


जनपदीय भाषाओं के लोक-गीतों के वर्गीकरण भी सामने आए जिनमें हरियाणा जनपद के लोक-गीतों के अध्येता डॉ. शंकरलाल यादव प्रमुख हैं। उन्होंने लोक-गीतों के कलेवर को दो मोटे रूपों में विभक्त किया है -


1. प्रबन्ध गीत


2. मुक्तक गीत


मुक्तक वर्ग को उन्होंने पुनः पाँच उपवर्गों में बाँट दिया है-


(1) संस्कार-गीत


(2) ऋतु-गीत


(3) कृषि-गीत


(4) राजनीति गीत


(5) विविध प्रकार के लोक-गीत


इसी क्रम में डॉ. कृष्णलाल हंस ने निमाड़ी लोक गीतों को छह भागों में वर्गीकृत किया है- -


1. संस्कार गीत


2. गीत


3. जीवन- गीत


4. धर्म- गीत तथा 5. इतिहास-गीत


6. अन्य लोक-गीत


वर्गीकरण की परम्परा को आगे बढ़ाते हुए डॉ. श्याम परमार ने मालवा लोक-गीतों का निम्नानुसार


वर्गीकरण किया है-


1. संस्कार विषयक गीत


2. धार्मिक गीत


3. माहवारी गीत


4. ऐतिहासिक / अर्द्धऐतिहासिक गीत


5. विविध गीत


6. अन्य लोक-गीत


डॉ. तेजनारायण लाल ने मैथिली जनपद के लोक-गीतों को अध्ययन का आधार बनाते हुए उसे


निम्नलिखित वर्गों में विभाजित किया है-


1. संस्कारों से सम्बन्धित लोक-गीत


2. पेशों से सम्बन्धित लोक-गीत


3. ऋतुओं से सम्बन्धित लोक-गीत


4. नृत्य से सम्बन्धित लोक-गीत


5. सामाजिक-आर्थिक आधार से सम्बन्धित लोक-गीत


6. विविध लोक-गीत


लोक-गीतों के वर्गीकरण परम्परा की महत्त्वपूर्ण कड़ी के रूप में कार्य करने वाले विद्वान् के रूप में डॉ. कृष्णदेव उपाध्याय का नाम महत्त्वपूर्ण है। इन्होंने इस क्षेत्र में पूर्व में किये गए कार्यों का आलोचनात्मक अध्ययन करते हुए लोक-गीतों को पाँच खण्डों में विभक्त किया है-


1. संस्कारों की दृष्टि से


2. नुभूति की प्रणाली में


3. ऋतुओं व व्रतों के क्रम में 4. विभिन्न जातियों के प्रकार से


5. क्रियागीत की दृष्टि से


कालान्तर में डॉ. सत्येन्द्र ने भी अपने वर्गीकरण में और वर्ग जोड़े तथा आगे जाकर समस्त वर्गीकरण को दो मोटे भेदों में विभक्त कर दिया है. -


1. अनुष्ठान आचार सम्बन्धी


2. मनोरंजन सम्बन्धी


उपर्युक्त विद्वानों के अतिरिक्त और भी कई विद्वानों ने इस परम्परा को आगे बढ़ाने में अपना अमूल्य योगदान दिया है। जैसे भास्कर रामचन्द्र भालेराव, आचार्य शिवपूजन सहाय, डॉ० सत्या गुप्ता आदि । -