लोकोक्तियों की परम्परा - tradition of proverbs
लोकोक्तियों की परम्परा - tradition of proverbs
लोकोक्तियों की परम्परा लोक कथा और लोक गाथा की ही भाँति अत्यन्त प्राचीन है। इनके प्रारम्भ के विषय में निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता। जब मनुष्य ने अपनी बात को क्षीण होते देखा होगा तभी किसी कहावती वाक्य या उक्ति को पुष्टि के लिए कहा होगा। इस प्रकार अपनी बात की पुष्टि के लिए लोकोक्तियों के प्रयोग की परम्परा का विकास हुआ होगा। भारत के प्राचीनतम लिखित साहित्य वेदों में लोकोक्तियों के अनेक उदाहरण मिलते हैं। जैसे- -
"सत्यस्य नावः सुकृतमयी परन ।"
अर्थात् धर्मात्मा को सत्य की नाव पार लगाती है।
"माता भूमिः पुत्रहम् पृथिव्या।"
अर्थात् भूमि मेरी माता है मैं उस भूमि का पुत्र हूँ।
"चक्षुवे सत्यम् ।"
अर्थात् आँखों देखा ही सत्य होता है।
इसी प्रकार पुराणों और उपनिषदों में भी अनेक लोकोक्तियों का प्रयोग किया गया है जो तत्कालीन समाज के ज्ञान और रीति-नीति पर प्रकाश डालती है। रामायण और महाभारत में भी लोकोक्तियों की प्रचुरता पाई जाती हैं। वहीं पंचतंत्र हितोपदेश आदि ग्रन्थों में नीति-सम्बन्धी विचारों की पुष्टि के लिए इनका प्रयोग किया गया है। 'प्रियेषु सौभाग्य फला हि चारुता' लिखने वाले महाकवि कालिदास के ग्रन्थों में भी कहावतों को पर्याप्त स्थान मिला है।
कवि माघ, श्रीहर्ष आदि ने अपने काव्य में लोकोक्ति का प्रयोग प्रचुरता से किया है। हिन्दी के कवियों कबीर, सूर, बिहारी, रहीम आदि ने अपने काव्य में लोकोक्तियों का प्रयोग कर लोकोक्ति-साहित्य की श्री वृद्धि में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया है। इस प्रकार हिन्दी साहित्य में लोकोक्ति परम्परा अत्यन्त प्राचीन है किन्तु इनकी मौखिक परम्परा उससे भी अधिक प्राचीन कही जा सकती है। दूसरे शब्दों में कहें तो मानव के सोचने- समझने की क्षमता के उदय के साथ ही लोकोक्तियों का भी जन्म हुआ होगा जो वर्तमान में भी निरन्तर प्रचारित और प्रसारित हो रही है।
वार्तालाप में शामिल हों