पहेलियों की परम्परा - tradition of riddles
पहेलियों की परम्परा - tradition of riddles
भारत में पहेलियों की परम्परा वैदिक काल से ही उपलब्ध हो जाती है जिसके आधार पर कह सकते हैं कि वैदिक युग से पूर्व भी पहेलियों की परम्परा रही होगी। वैदिक काल में 'पहेली' को 'अश्वमेध यज्ञ' के अवसर पर अनुष्ठान का आवश्यक अंग माना जाता था। अश्व की बलि देने से पूर्व 'होता' और ब्राह्मण पहेली पूछा करते थे जिसे 'ब्रह्मोदय' कहा जाता था। ऋग्वेद का प्रसिद्ध मंत्र, जिसे विद्वानों ने 'पहेली' स्वीकार किया है, इस प्रकार है- -
चत्वारि शृंगा त्रयो अस्य पादाः द्वे शीर्षे सप्तहस्ता सो अस्य । त्रिधा बद्धो वृषभो रोरवीति महादेवो मर्त्या आविशेशः ॥
अर्थात् जिसके चार सींग हैं, तीन पैर हैं, दो सिर हैं, जो तीन जगहों से बंधा हुआ है, वह मनुष्यों में प्रविष्ट हुआ वृषभ शब्द करता हुआ महादेव है। इसका गूढार्थ यह है कि यह वृषभ जिसके चार सींग चारों वेद हैं, प्रातःकाल, मध्याह्न और सायंकाल तीन पैर हैं, उदय और अस्त दो सिर हैं, सात प्रकार के छन्द सात हाथ हैं। यह मंत्र, ब्राह्मण और कल्परूपी तीन बन्धनों से बँधा हुआ मनुष्य में प्रविष्ट है।
उपनिषदों में भी रहस्यात्मक भाषा प्राप्त होती है। महाभारत में यक्ष-युधिष्ठिर संवाद और गीता में कृष्ण द्वारा सृष्टि का वर्णन 'पहेली' की श्रेणी में ही आते हैं।
संस्कृत साहित्य में भी प्रचुर मात्रा में पहेलियाँपाई जाती हैं। इनका एक संग्रह 'सुभाषितरत्नभाण्डागारम्' के नाम से मिलता है। संस्कृत की 'पहेली' का उदाहरण द्रष्टव्य है-
श्यामामुखी न मार्जारी द्विजिह्वा न सर्पिणी।
पंचभर्ता न पांचालीयो जानाति सः पण्डितः ॥
अर्थात् काला मुँह है पर बिल्ली नहीं, दो जीभ हैं किन्तु सर्पिणी नहीं, पाँच पति हैं परन्तु पांचाली नहीं।
इस वस्तु को जो जानता है, वह पण्डित है। इसका उत्तर है- 'कलम'। कलम का मुँह काला होता है, उसकी जीभ बीच में से विभाजित होती है और उसे पाँच उँगलियों से पकड़ कर लिखा जाता है।
जैन साहित्य में पहेली सदृश रचनाओं 'हीयाली' का पर्याप्त प्रचलन था । यही 'पहेली' आगे चलकर सिद्धों और नाथों की रचनाओं में उलटबांसियों के रूप में मिलती है। हिन्दी साहित्य में अमीर खुसरो की पहेलियाँ और मुकरियाँ विशेष प्रसिद्ध हैं। यथा-
एक थाल मोती से भरा,
सबके सिर पर औंधा धरा ।
चारों ओर थाल वह फिरे,
मोती उससे एक न गिरे |
(आकाश)
हिन्दी की क्षेत्रीय बोलियों में पर्याप्त मात्रा में पहेलियाँ उपलब्ध होती हैं। मुकरियाँ भी 'पहेली' का ही अन्य रूप हैं। इसमें 'पहेली' प्रश्नोत्तर रूप में दी जाती है। जैसे ऐ सखि साजन, ना सखि... । इस प्रकार प्रदत्त उत्तर से मुकर कर (ना सखि) उत्तर दिया जाता है। इसी कारण इन्हें मुकरी कहा जाता है।
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