संघर्ष के विविध रूप - various forms of conflict

संघर्ष के विविध रूप - various forms of conflict


मॉरीशस की कुल जनसंख्या में भारतवंशियों की संख्या आधी से अधिक है। इतनी बड़ी भारतवंशी जनसंख्या का निर्माण एक लंबी प्रक्रिया का परिणाम है। सबसे ज्यादा प्रवासन साम्राज्यवादी- उपनिवेशवादी दौर में अनुबंधित श्रमिकों के रूप में हुआ। प्रवासी भारतीय कामगारों का छोटा सा दल सबसे पहले 1834 ई. में मॉरीशस गया था। 1834 से 1920 ई. तक अनुबंधित श्रमिक व्यवस्था के अंतर्गत 4 लाख 60 हजार श्रमिक मॉरीशस गए। 5 साल की अवधि समाप्त करके 1 लाख 60 हजार श्रमिक वापस लौट गए। शेष बचे भारतीय श्रमिकों ने मॉरीशस को ही अपनी मातृभूमि बना ली। इन उपनिवेशों में गन्ने के कृषि केंद्रों में इनसे काम लिया जाता था।

यूरोपीय उपनिवेशीकरण का दौर 12 मार्च, 1968 ई. को समाप्त हुआ। इस नई शर्तबंदी प्रथा के अंतर्गत सन् 1834 ई. में 75 भारतीय मजदूर यहाँ लाए गए इसके बाद मजदूरों को लाने की एक प्रथा-सी बन गई। यह सिलसिला 1920 ई. तक चलता रहा। इन प्रवासित मजदूरों के कल्पित स्वप्न अंधकार में विलीन हो गए। उन्हें यहाँ बहुत कष्ट साध्य जी वन व्यतीत करना पड़ा।


खेत बागान (इस्टेट कैंप) से संसद तक की यात्रा : भारतीय मारिशसी लोगों का राजनैतिक उत्थान


उन्नीसवीं सदी के ग्रैंड मार्सलमेंट ने पहली पीढ़ी के प्रवासी भारतीय लोगों को मॉरीशस की बागान शक्ति संरचना में स्वयं को स्थापित करने के लिए प्रोत्साहित किया।

इसके फलस्वरूप ये समृद्ध भू- स्वामी नए बसे भारत-वंशी गाँवों के सांस्कृतिक एवं धार्मिक संरक्षक भी बने। इनकी जागरुकता के कारण मॉरीशस में शिक्षित एवं राजनैतिक रूप से सक्रिय भारत-वंशी समूहों का उदय हुआ। हालाँकि औपनिवेशिक मॉरीशस में भारतवंशी वाणिज्यिक समूहों द्वारा ही पहली बार राजनैतिक पद ग्रहण किए गए। पहली बार सन् 1827 ई. में अन्नासामी कोलोनियल कमेटी के सदस्य बने और मध्य 19वीं सदी में तमिल समुदाय के सिन्नताम्बू चेट्टियार एवं मुनीसामी मुदलियार डिस्ट्रिक्ट कमेटी के सदस्य नामित किए गए। पिचेन, प्रगासा, रायप्पा एवं संदप्पा परिवार अर्जित संपत्ति के आधार पर 1850 ई. में निर्वाचक नामावली में स्थान पाने में सफल हुए।

ज्ञानादिक्राएन अलंदा 1886 ई. में गवर्नमेंट कौंसिल के सदस्य नामित किए गए। गवर्नर पॉप हेनेसी द्वारा 1880 ई. में कई मुस्लिम सदस्यों को नामित किया गया। 1896 ई. एवं 1901 ई. के चुनाव में खड़े होने वाले कलकतिया मुसलमान अब्दुल्ला गुलाम दस्तगीर (उत्तरी भारत से आए भोजपुरी बोलने वाले लोगों के वंशजों के लिए प्रयुक्त शब्द) पहले इंडो-मारिशसी बने। इस समय मात्र 400 भारत-वंशी निर्वाचक सूची में सम्मिलित थे। यद्यपि दस्तगीर निर्वाचित नहीं हो सके, लेकिन वे अपने समुदाय के अतिरिक्त वोट प्राप्त करने में सफल हुए। लश्कर समुदाय के एक मुसलमान डॉ. हसन साकिर सन् 1900 में पोर्ट लुई के म्युनिसिपल कौंसिलर के लिए चुनाव जीतने में सफल रहे।


मॉरीशस उन भारतेतर देशों में से है, जहाँ सन् 1834 ई. से शर्तबंद प्रथा के अंतर्गत जो दासत्व का दूसरा रूप था, भारतीयों को भेजा जाता रहा। इसके अंतर्गत सन् 1923 ई. तक चार लाख साठ हजार लोग आए और इसी अवधि में अपना पट्टा समाप्त करके 166 हजार लोग स्वदेश लौटे थे। इस हिसाब से शर्तबंद अप्रवासन की समाप्ति पर इस टापू पर तीन लाख चौवन हजार भारतीयों की संख्या होनी चाहिए थी, किंतु उस समय देश में कोई ढ़ाई लाख भारतीय मौजूद थे. ..क्या उन्हीं एक लाख भारतीयों के आत्मबलिदान की भित्ति पर उन्नीसवीं सदी के मॉरीशस का निर्माण नहीं हुआ?


भारतवंशियों के आत्मबलिदान से मॉरीशस का काया कल्प हुआ और जिसके परिश्रम से यह संसार के मानचित्र पर उभरा,

उन्हीं भारतीयों की संतानों ने बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में अपने राजनीतिक अधिकारों को पहचान कर संघर्ष किया था और बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में मॉरीशस को स्वतंत्र करके अपने नेतृत्व का एक उदाहरण प्रस्तुत किया है। आधी शताब्दी पहले जिस वर्ग में नेताओं का अभाव खटकता था, उसी वर्ग से तीन प्रधानमंत्री, चार गवर्नर जनरल, तीन राष्ट्रपति एवं दर्जनों सरकारी और अर्ध-सरकारी संस्थाओं के निदेशक बनकर आज चमक रहे हैं। यही नहीं, इसी वर्ग की एक संतान सर शिवसागर रामगुलाम को मॉरीशस के राष्ट्रपिता होने का गौरव प्राप्त है।


-प्रह्लाद रामशरण, मॉरीशस के इतिहासकार


1901 ई. में महात्मा गांधी का अल्प समय के लिए मॉरीशस आगमन हुआ। प्रवासी भारतवंशियों की सहायता के लिए 1907 ई. में इनके द्वारा मणिलाल डॉक्टर को मॉरीशस भेजा गया।

यहाँ उन्हें भारतीयों की वास्तविक स्थिति का आभास हुआ। उन्होंने अप्रवासी मजदूरों को संबोधित किया। इन परिस्थितियों को देखते हुए इन्होंने आर्य समाज का सहारा लिया। मणिलाल डॉक्टर ने भारत-वंशी समुदायों को राजनैतिक रूप से संगठित करने में बड़ी भूमिका निभाई। मणिलालजी आर्य समाजी तो नहीं थे, पर इन्होंने यह अनुभव किया कि प्रवासियों का उद्धार आर्य समाज जैसी शक्तिशाली संस्था ही कर सकती है। आर्य समाज की स्थापना ने प्रवासित भारतीयों के आंदोलन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई ।। उल्लेखनीय है कि सन् 1898 ई. में भोलानाथ नामक बंगाली ने स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा रचित ‘सत्यार्थ प्रकाश' नामक ग्रंथ की एक प्रति खेमलता को दिया।

इस पुस्तक ने मॉरीशस में आर्य समाज का सूत्रपात करने में अभूतपूर्व योगदान दिया। 20वीं शताब्दी के प्रथम चरण के प्रारंभ से ही आर्य समाज का आंदोलन अंकुरित हो रहा था। 1903 ई. में आर्य समाज की स्थापना द्वीप के प्रसिद्ध शहर क्युपप में हुई। मणिलाल डॉक्टर ने हिंदू युवा संघ की नींव रखी निर्विवाद रूप से मॉरीशस की स्वतंत्रता हेतु यह सामाजिक-सांस्कृतिक एवं राजनैतिक आंदोलन के रूप में प्रथम प्रयास था। इसी तरह अन्य संस्थाओं जैसे- हिंदी प्रचारिणी सभा, आर्य महिला महामंडल, सनातन धर्म सभा, आर्य प्रतिनिधि सभा, हिंदू महासभा, कबीरपंथी, गहलौत राजपूत सभा, गीता प्रचारक महामंडल आदि ने मॉरीशस की स्वतंत्रता में अभूतपूर्व योगदान दिया है।

उपरोक्त सभी संस्थाओं की स्थापना से लेकर कार्यों के क्रियान्वयन तक में भारतीयों की प्रमुख भूमिका रही है। मणिलाल ने हिंदुस्तानी समाचार पत्र आरंभ किया एवं 1911 ई. में भारत वापस आने से पूर्व अनेक मुकदमों में भारत-वंशी लोगों की पैरवी की।


1920 ई. तक शर्तबंद श्रमिकों (इंडेंचर) में अनेक हिंदू बुद्धिजीवी उठ खड़े हुए और इन प्रवासी लोगों के हितों को आवाज देने लगे। अप्रवासी रेल मजदूर के पुत्र रामखेलावन बुधन ब्रिटेन से बैरिस्टर बनकर वापस लौटे और 1921 ई. के चुनाव में उम्मीदवार के रूप में खड़े हुए।

चुनाव में पराजित होने के बाद भी सन् 1921 से 1926 ई. की अवधि के लिए मॉरीशस के भारतीय लोगों का प्रतिनिधित्व करने के लिए डॉ. हसन साकिर के साथ उन्हें भी गवर्नर द्वारा नामित किया गया। एक अन्य अप्रवासी श्रमिक के पुत्र बुधन लाला भी राजनीति में उतरे और 1911 ई. के चुनाव में उन्हें एक श्वेत द्वारा पराजित होना पड़ा। भारतवंशियों ने फ्रांस के पक्षधर उभरते रेट्रोसेसनिस्ट आंदोलन का विरोध करना आरंभ कर दिया लेकिन जातिगत वैमनस्य के चलते यह विरोध कमजोर बना रहा। 1926 ई. के आम चुनाव में बिहारी मूल के राजकुमार गजाधर और लाला एल. यूनियन मरिसेने के बैनर तले चुनाव जीतने में सफल रहे।


इसी समय हिंदू एवं मुसलमान समुदायों के राजनैतिक गतिविधि का एक नया युग आरंभ होता है। इस अवधि में भारत से स्थानीय ब्राह्मण पुरोहितों एवं अन्य धर्म प्रचारकों का आगमन होता है। 1930 ई. की आर्थिक मंदी ने श्रमिक वर्गों को उम्र करने में मुख्य भूमिका निभाई। श्रमिक संघों(ट्रेड यूनियन) का गठन हुआ एवं 1936 में डॉ. मारिश कीरे द्वारा मजबू दल (लेबर पार्टी) बनाई गई। 1935 में अनुबंधित श्रमिकों (इंडेंचर्ड) के आगमन की शताब्दी समारोह के आयोजनों ने भारतीय समुदायों को लामबंद करने में सफलता हासिल की। सन् 1940 में बासदेव बिसुनदयाल ने हिंदुओं को जागरूक करने के लिए एक आंदोलन खड़ा कर दिया।

1947 ई. में लागू किए गए नए संविधान के अनुसार सभी साक्षर स्त्री एवं पुरुषों को मत देने का अधिकार दे दिया गया। भारत-वंशी मतदाताओं की संख्या अचानक 10,000 से बढ़कर 70,000 हो गई। विधान परिषद के 1948 ई. के चुनावों को भारतीय मॉरिशसी लोगों को गतिशील करने में महत्वपूर्ण माना गया। ग्रामीण डिस्ट्रिक्ट क्षेत्रों में हिंदू बहुसंख्यक होने के कारण अनेक सीटों पर इन्हें भारी सफलता मिली और मुसलमान उम्मीदवार पराजित हुए। इसने मुस्लिम अल्पसंख्यक स्थिति को पहली बार राजनैतिक रूप से प्रदर्शित किया।


ब्रिटेन प्रशिक्षित भारतीय मॉरिशसी डॉ. शिवसागर रामगुलाम के नेतृत्व में सन् 1959 में कोमिते दी एक्शन मुसुलमान (CAM) ने मजर दल (लेबर पार्टी) के साथ गठबंधन कर स्वतंत्रता के पक्षधर के रूप में चुनाव में भाग लिया।

इस चुनाव में सुकदेव बिसुनदयाल के नेतृत्व में स्वतंत्र फॉरवर्ड ब्लाक ने भी चुनावों में भाग लिया। पारती मौरिशिएन ने स्वंत्रता के विरोध में चुनाव में भाग लिया। इन चुनावों में मजदूर दल ने भारी सफलता प्राप्त की और 1961 में दल के नेता चीफ मिनिस्टर बनाए गए तीन वर्षों बाद मंत्रीमंडल व्यवस्था लागू होने पर रामगुलाम प्रधानमंत्री नियुक्त किए गए। 1960 के दशक में ही गाईतेन दुवाल के नेतृत्व में पारती मौरिशिएन सोशल डेमोक्रेट (PMSD) का उभार हुआ। इनके द्वारा हिंदू बहुसंख्यक प्रभुत्व के भय को हथियार बनाने की एथनिक रणनीति अपनाते हुए क्रियोल समुदाय को एकजुट करने का प्रयास किया गया। ये ब्रिटिश राजसत्ता से जुड़े रहने के पक्षधर थे। सन् 1963 का चुनाव सांप्रदायिक उन्माद एवं हिंसाग्रस्त रहा।


इस अवधि में मॉरीशस में निरंतर बढ़ते एथनिक तनाव की पृष्ठभूमि में लंदन में अनेक संवैधानिक हुए। | इन सम्मेलनों में भाग लेने वाले प्रतिनिधियों ने यह लगातार माँग रखी कि अल्पसंख्यक सम्मेलन समुदायों को समुचित प्रतिनिधित्व प्रदान किया जाए। 1965 ई. के अंतिम संवैधानिक सम्मेलन में बेस्ट लूजर प्रणाली को अपनाते हुए अल्पसंख्यक सीटें सुनिश्चित की गई। इसी समय एक गुप्त समझौते के तहत चागोस द्वीप समूह के आस-पास ब्रिटिश इंडियन ओशन टेरिटरी (BIOT) सृजित किया गया एवं ब्रिटिश लोगों द्वारा दियागो गार्सिया को सैन्य प्रयोजनों हेतु अमेरिका को पट्टे पर दे दिया गया। वास्तव में सन् 1967 का चुनाव मॉरीशस की स्वतंत्रता के लिए एक प्रकार से जनमत संग्रह था।

मुस्लिम मत विभाजित था। इसके कुछ समूह स्वतंत्रतावादी दलों के समर्थक थे और कुछ PMSD और फारवर्ड ब्लाक के चुनाव में पूर्ण बहुमत के साथ स्वतंत्रता दल विजयी हुआ। हालाँकि 1967 में पोर्ट लुई में नस्लीय हिंसा भड़क उठी, जो धीरे-धीरे पूरे द्वीप में फैल गई। मॉरीशस में भारतीय परिधान पहने जाने की अनिवार्यता संबंधी PMSD द्वारा फैलाई जा रही अफवाहों के कारण अल्पसंख्यक समूह के लोग आस्ट्रेलिया, यूरोप, दक्षिण अफ्रीका और कनाडा प्रवासित होने लगे। इस प्रकार भारतीय मारिशसी चुनाव में भले ही जीत गए, लेकिन उनकी आगे की राह अत्यंत कठिन थी, क्योंकि नए बेस्ट लूजर व्यवस्था में उम्मीदवारों की एथनिक पहचान को सार्वजनिक किए जाने संबंधी संवैधानिक प्रावधानों ने सांप्रदायिकता को संस्थागत रूप दे दिया।