ग़ज़ल : तात्पर्य एवं स्वरूप(2) - Ghazal: Meaning and Form(2)
शब्दगत विशेषता
हिन्दी ग़ज़लों की भाषिक विशेषताओं की चर्चा करते समय सबसे पहला मुद्दा तो भाषा में प्रयुक्त शब्द- वैविध्य है। हिन्दी ग़ज़लों ने उर्दू ग़ज़लों से विरासत में काफी कुछ पाया है, इसमें कोई सन्देह नहीं। स्वाभाविक रूप से फारसी-उर्दू शब्दों का अत्यधिक प्रयोग हिन्दी ग़ज़लों में होता है। हिन्दी के ग़ज़लकार अपनी ग़ज़लों में फारसी- उर्दू शब्दों का प्रयोग करने का मोह त्याग नहीं पाए हैं। बल्कि ज्ञान प्रकाश विवेक जैसे कई ग़ज़लकार और ग़ज़ल समीक्षक मानते हैं कि उर्दू-फारसी शब्द ग़ज़ल का प्राणतत्त्व है अतः इन्हें हटाकर जिंदवश खींचतान कर हिन्दी शब्दों का प्रयोग ग़ज़ल के सौन्दर्य के लिए हानिकारक सिद्ध होगा। इसी दृष्टिकोण के तहत हिन्दी ग़ज़लों में उर्दू- फारसी शब्दों का खूब प्रयोग हुआ। दुष्यन्त कुमार की ग़ज़लें इस दृष्टि से विशेष महत्त्वपूर्ण हैं-
कहाँ तो तय था चिरागाँ हरेक घर के लिए,
कहाँ चिराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए
प्रस्तुत शेर में तय, चिराग, मयस्सर जैसे शब्दों पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। ये शब्द अपना अर्थ सम्पूर्णता के साथ प्रकट करते हैं और हिन्दी ग़ज़ल में चार चाँद लगा देते हैं।
हिन्दी ग़ज़लों में हो रहे विशुद्ध हिन्दी शब्द प्रयोगों के कारण हिन्दी ग़ज़ल की भाषा भीड़ में स्वतन्त्र नज़र आती है। हिन्दी ग़ज़लें अब संस्कृतनिष्ठ तत्सम शब्दावली के साथ लिखी जा रही हैं।
अर्थात् इस सन्दर्भ में दो स्वतन्त्र विचारधाराएँ देखी जा सकती हैं।
पहली विचारधारा के अनुसार उर्दू-फारसी का प्रयोग ग़ज़लों को उर्दू ग़ज़ल की छाया से बाहर न निकलने देगा अतः इसे वर्जित माना जाए तो दूसरी विचारधारा के अनुसार हिन्दी शब्दों के तत्सम प्रयोग के कारण हिन्दी ग़ज़लों में स्वाभाविकता के दर्शन तो होंगे किन्तु ग़ज़ल 'ग़ज़ल' न लगेगी। बहरहाल, विविध विचारधाराओं का परिपाक यही है कि हिन्दी ग़ज़ल मानक हिन्दी शब्दों के प्रयोग के साथ लिखी जाए। इसी का अनुपालन करते 'रंग', 'नीरज' आदि कई ग़ज़लकार विशुद्ध हिन्दी प्रयोग करते हुए ग़ज़लें लिख रहे हैं। निराला, दुष्यन्त की ओर से इस सन्दर्भ में किये गए प्रयास विशेष उल्लेखनीय हैं-
मन हमारा मग्न दुःखकी, दुर्धरा में हो गया कुछ न था तब लग्न वह, विश्वंभरा में हो गया विश्व को वैषयिकता से सीख देने के लिए देह छोड़ी स्नेह से ज्योतिस्सरा में हो गया।
बलवीर सिंह 'रंग' की ग़ज़ल देखिए-
पधारी चाँदनी है, तुम कहाँ हो,
तुम्हारी यामिनी है तुम कहाँ हो,
अमृत के आचमन का अर्थ ही क्या, तृषा वैरागिनी है तुम कहाँ हो
हिन्दी ग़ज़ल समय के साथ कदमताल करते हुए आधुनिक हो रही है अतः बिना किसी संकोच के साथ प्रचलित अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग हिन्दी ग़ज़ल में किया जा रहा है-
कल महोत्सव वोट गिराने का है शायद इसलिए
आज 'पर्वत' पूछने आया है 'कंकर' का पता
हिन्दी ग़ज़ल के भाषिक वैशिष्ट्यों में एक महत्त्वपूर्ण वैशिष्ट्य यह कि हिन्दी ग़ज़ल देशज खाँटी शब्दों का प्रयोग करते हुए लिखी जा रही है। देशज शब्दों का प्रयोग भाषा को सहज-स्वाभविक बना देता है।
वर्तमान हिन्दी ग़ज़ल में देशज शब्द प्रयोगों के कारण एक स्वाभाविकता का समावेश हो चुका है। देशज शब्द माने देश की ठेठ गँवई माटी से निर्मित हुए शब्द जनसामान्यों द्वारा ऐसे शब्दों का खुलकर प्रयोग किया जाता है। हिन्दी ग़ज़ल के जनसाधारण में लोकप्रिय होने का एक महत्त्वपूर्ण कारण उसमें प्रयुक्त देशज शब्द हैं। दुयन्त समेत कई ग़ज़लकारों ने अपनी ग़ज़लों में ऐसे प्रयोग किए हैं-
बायें से उड़ के दाई दिशा को गरुड़ गया, कैसा शकुन हुआ है कि बरगद उखड़ गया
जैसे शेर हों या -
अफवाह है या सच है ये कोई नहीं बोला, मैंने भी सुना है अब जाएगा तेरा डोला
ओमप्रकाश यती की देशज ठाठ के साथ लिखी ग़ज़ल देखिए-
खेतों-खलिहानों की फसलों की खुशबू लाते हैं बाबूजी गाँवों की खुशबू गठरी में तिलवा है, चिवड़ा है, गुड़ है, लिपटी है अम्मा के हाथों की खुशबू बाहर हैं, भइया की मीठी फटकारें, घर में है भाभी की बातों की खुशबू मँगरू भी चाचा हैं, बुधिया भी चाची, गाँव में ज़िन्दा है रिश्तों की खुशबू खिचड़ी है, बहुरा है, पिंडिया है, छठ है, गाँवों में हरदम त्योहारों की खुशबू मुहावरों- कहावतों का प्रयोग
हिन्दी ग़ज़लों की भाषा की विशेषताओं में से एक महत्त्वपूर्ण विशेषता उसका मुहावरेदार होना है। मुहावरों- कहावतों के प्रयोग के कारण हिन्दी ग़ज़ल बेहद सहज बन चुकी है। अरबी शब्द 'मुहावरा' का अर्थ है 'बातचीत' । हिन्दी ग़ज़लों में विशिष्ट अर्थ को प्रस्तुत करते वाक्यांश अर्थात् मुहावरे का बखूबी प्रयोग हो रहा है। सामान्य भाषा की तुलना में सांकेतिकता के साथ प्रयुक्त मुहावरे ग़ज़ल की भाषा में जीवन्तता भर देते हैं। मुहावरे के साथ-साथ कहावतों का सक्षम प्रयोग भी हिन्दी ग़ज़ल में पाया जा रहा है। कहावत अर्थात् लोकोक्ति अपने आप में एक सम्पूर्ण वाक्य होता है। इसका ग़ज़ल में प्रयोग मुहावरा प्रयोग की तुलना में काफी कठिन है। बावजूद इसके हिन्दी ग़ज़ल की भाषा मुहावरों कहावतों से युक्त है एक बेहतरीन मुहावरा प्रयोग देखिए-
हो व्यवस्था कुर्सियों की पान की दुकान पर पान खाओ ठाठ से चूना लगाओ देश को
कहावत प्रयोग कठिन होने के बावजूद धड़ल्ले से हो रहा है। ग़ज़ल के शेर में एक सम्पूर्ण वाक्य शामिल करना ग़ज़लकारों के लिए इसलिए भी सम्भव हो पा है क्योंकि वर्तमान हिन्दी ग़ज़ल पारम्परिक उर्दू ग़ज़ल-सी नहीं बल्कि नित नये रूखे-सूखे पर महत्त्वपूर्ण विषयों को छूने का माद्दा रखती है-
दूध का दूध करे, पानी का पानी कर दे
न्यायधीशों में भला कौन है हँसों से बड़ा
प्रतीक एवं बिम्ब
वर्तमान हिन्दी ग़ज़लों में प्रतीक प्रयोग अत्यधिक मात्रा में हुआ है। प्रतीक एक ऐसा शब्द होता है जो विशिष्ट अर्थ प्रदान करता है। हिन्दी के ग़ज़लकारों ने विविध प्रकार के प्रतीकों को प्रयुक्त किया है। पौराणिक प्रतीकों का प्रयोग करने में हिन्दी ग़ज़लकारों को विशेष महारथ हासिल है। राम, सीता, रावण, विभीषण, द्रौपदी, पाण्डव, एकलव्य, द्रोणाचार्य जैसे अनेकानेक रामायण- महाभारतकालीन चरित्रों को वे प्रतीक के रूप में प्रयुक्त करते हैं। हिन्दी ग़ज़लकारों ने पशुपंछी, प्राकृतिक उपादान आदि प्रतीकों का प्रयोग कर भाषागत विशेषताओं में वृद्धि की है।
प्रतीकों की ही भाँति बिम्ब प्रयोग भी हिन्दी ग़ज़ल का उत्कृष्ट भाषिक वैशिष्ट्य है । बिम्बों अर्थात् इमेजेस की सार्थकता उभरने में होती है। हिन्दी ग़ज़लकार इतने अद्वितीय बिम्ब प्रयुक्त करते हैं कि वे क्षणांश में मन में उभर आते हैं। गत्वर बिम्ब, नाद बिम्ब, स्पर्श बिम्ब, रस बिम्ब, गन्ध बिम्ब, दार्शनिक बिम्ब, प्राकृतिक बिम्ब, राजनैतिक बिम्ब जैसे बिम्बों के नये पुराने प्रकारों का सार्थक प्रयोग हिन्दी ग़ज़ल में देखा जा सकता है। गन्धात्मक बिम्ब का सफल प्रयोग देखिए-
उसमें खुशबू है तो फिर सबको ही खुशबू देगा फूल धरती पे खिले, चाहे खिले पानी में अलंकार एवं छन्द
विभिन्न अलंकारों के प्रयोग ने हिन्दी ग़ज़ल की भाषा को खूब सजाया है।
'हो गई पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए' में प्रयुक्त उपमा अलंकार हो या 'यहाँ दरख्तों के साये में धूप लगती हैं जैसा विरोधाभास अलंकार हो, ऐसे प्रयोगों ने काव्य की शोभा बढ़ाई है, इसमें कोई सन्देह नहीं।
हिन्दी ग़ज़लों में उर्दू के बहर के तर्ज पर दोहा, चौपाई आदि कई छन्दों का सफल प्रयोग देखा जा सकता
है। चौपाई छन्द का एक सफल प्रयोग द्रष्टव्य है-
यह मेरी गुमनाम ज़िंदगी बिना बात बदनाम ज़िंदगी सुबह ज़िंदगी, शाम ज़िंदगी गोया आठो याम ज़िंदगी
भारतीय शैली के छन्दों के साथ-साथ उर्दू के बहर का भारतीयकरण करके हिन्दी ग़ज़लों में उन्हें प्रयोग किया गया है।
यथा - बहरे वाफ़िर (सुमन छन्द), बहरे मुनसरिह (सहज छन्द), बहरे मुतकारिब (मिलन छन्द), बहरे वसीत (विशाल छन्द), बहरे क़रीब (समीपा छन्द), बहरे खफ़ीफ़ (लघुता छन्द), बहरे जदीद (नूतन छन्द) आदि अनगिनत बहरों को छन्दों में रूपान्तरित कर प्रयुक्त किया गया है। उर्दू बहरों की विशेषताओं को हिन्दीकरण करते हुए प्रयुक्त करने की वजह से हिन्दी ग़ज़लें भारत की गंगा-जमनी संस्कृति की प्रतीक बन चुकी हैं।
संगीतात्मकता
हिन्दी ग़ज़लों की गेयता और संगीतात्मकता से युक्त भाषा उनका बड़ा ही महत्त्वपूर्ण भाषिक वैशिष्ट्य है।
हिन्दी की ग़ज़लें सहज भाषा में लिखी ऐसी ग़ज़लें हैं जिनको संगीत की रागदारी में पिरोया जा सकता है और गाया भी जा सकता है। कई हिन्दी ग़ज़लें केवल गेयता और संगीतात्मकता के कारण सारस्वत परिधि को उल्लांघकर जनमानस में पहुँच चुकी हैं। “अब मैं राशन की कतारों में नज़र आता हूँ, अपने खेतों से बिछड़ने की सजा पाता हूँ" जैसी प्रेम-विरह से कोसों दूर नितान्त सामाजिक संवेदनाओं का प्रचार-प्रसार केवल हिन्दी ग़ज़ल के भाषिक वैशिष्टयों के कारण सम्भव हो पाया है।
ऐसी अनगिनत विशेषताओं ने हिन्दी ग़ज़ल की भाषा को जीवन्त और सहज बना दिया है किन्तु इसका तात्पर्य यह कतई नहीं कि हिन्दी ग़ज़लों की भाषा दोषों से पूर्णतः मुक्त हैं। हिन्दी ग़ज़ल पर अश्लीलता, छन्द उल्लंघन आदि प्रकार के आक्षेप लगाए जाते हैं किन्तु हिन्दी ग़ज़ल की भाषिक विशेषताओं के समक्ष यह आक्षेप काफी छुटपुट हैं। अतः स्वाभाविक रूप से हिन्दी ग़ज़ल के भाषिक वैशिष्ट्यों की बात करते समय उसके दुर्बल पक्ष की तुलना में उसके सक्षम पक्ष ही निर्विवाद रूप से याद रहते हैं।
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