प्रगतिवाद एवं प्रयोगवाद में निहित अन्तर(2) - Inherent difference between progressivism and experimentalism(2)
प्रतीकों का प्रयोग
प्रयोगवादी तथा नये कवियों की कविता का शिल्प प्रतीक प्रयोग के कारण भी सम्पन्न माना जाता है। उनकी काव्य-भाषा की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता यह भी रही है कि इन कवियों ने प्रतीक और बिम्बों का संयुक्त प्रयोग किया। प्रतीक प्रयोग को लेकर प्रयोगवादी कवि अत्यन्त गम्भीर थे। उन्होंने नये प्रतीकों का सृजन करना आवश्यक समझा।
वह वस्तु जो किसी अन्य वस्तु का बोध कराये प्रतीक कहलाती है। अज्ञेय ने 'आत्मनेपद' में कहा है- "जो सीधे-सीधे अभिधा में नहीं बँधता उसे आत्मसात करने या प्रेषित करने के लिए प्रतीक काम देते हैं।
सत्य के अथाह सागर में वह (कवि) प्रतीक रूपी कंकड़ से उसकी थाह का अनुमान करता है।" उनकी यह सोच भी थी कि कोई कवि अपने साहित्य में प्रतीकों की सृष्टि करता रहता है तब तक स्वस्थ रहता है, जब वह यह सृष्टि- सृजन बंद कर देता है तो जड़ हो जाता है। प्रतीक प्रयोग के सन्दर्भ में इतने आग्रही अज्ञेय और उनके प्रयोगवादी तथा नयी कविता से जुड़े साहित्यिकों ने प्रतीक प्रयोग अत्यन्त कुशलता से किया। प्रतीकों का अनेकार्थ सूचक होना मात्र पर्याप्त नहीं, अर्थ के प्रत्येक स्तर पर प्रतीक का प्रभविष्णु होना भी अनिवार्य है। इस दृष्टि से इन कवियों द्वारा किये गए प्रयोग इतने सार्थक थे कि अज्ञेय (और समकालीनों) को प्रतीकवादी कहा जाने लगा।
पारम्परिक प्रतीकों को नवीन सन्दर्भों में प्रस्तुत करने के साथ-साथ प्रयोगवादी कवियों ने प्रकृति, राजनीति, धर्म, दर्शन, मनोविज्ञान आदि से जुड़े प्रतीकों का सृजन कर अपने काव्य-शिल्प में अत्यन्त नाविन्य भर दिया। अज्ञेय ने भी अध्यात्म-दर्शन से लेकर व्यंग्यात्मकता तक से जुड़े प्रतीकों का इतना कुशल प्रयोग किया कि आलोचकों ने उन्हें फ्रांस के प्रतीकवादियों का भारतीय प्रतिनिधि घोषित किया।
प्रकृतिविषयक प्रतीक प्रयोग प्रयोगवादियों को विशेष रूप से लुभाता रहा है। सागर, बूँद, आँगन, भोर, द्वार, आकाश, सूर्य, इन्द्रधनु आदि प्रकृति से जुड़े अनगिनत प्रतीक इस कालखण्ड में प्रयुक्त हुए।
प्रयोगवाद पर अतिव्यक्तिवादिता और सामाजिक जीवन से विछिन्न होने का आरोप लगाया गया तब उसका उत्तर भी प्रयोगवादी नये कवियों ने 'नदी के द्वीप' और 'यह दीप अकेला' जैसे प्रतीकों का सृजन करके दिया। अज्ञेय ने 'सागर' पर अनेकानेक कविताएँ रचीं। मात्र इतना ही नहीं, सागर को अनेक प्रतीकों को समाहित कर लेने वाले प्रतीक के रूप में देखा-
ओ सागर
ओ मेरी धमनियों की आग ....
ओ मेघ, ओ ज्वार, ओ बीज, ओ निदाध, ओ रावण, ओ कीट दंश ! ओ रवि-चुंबी गरुड़, ओ हारिल, ओ आँगन के नृत्य रत मयूर ! ओ अहल्या के राम, ओ सागर ! 12
सागर ही की भाँति मछली का प्रतीक भी अज्ञेय को विशेष प्रिय था। उनके विचार में "यदि हम सागर को हमारे न जाने हुए सब कुछ का प्रतीक मान लें, तो मछली उस प्रतीक का प्रतीक हो जाती है जिसके द्वारा कवि अज्ञात सत्य का अन्वेषण करता है। यहाँ से अन्वेषण पद्धत्ति का अन्वेषण करें तो और भी कई प्रतीक मिलते हैं .... सागर और मछली, नदी, सेतु, जल पर पड़ा हुआ प्रकाश, परछाँही परछाँही को भेदने वाली किरण और अन्त में वह प्रकाशवान् मछली जो परछाँही को भेद जाती है वह प्रतीक जिसके द्वारा अन्वेषी स्वयं अपने अहंकार से उत्पन्न पूर्वाग्रहों की छाया के पार देख लेता है ... 13 प्रतीकों के प्रति कवियों के इस दुर्दम्य आकर्षण ने प्रयोगवादी शिल्प को प्रतीकों का खजाना बना दिया।
एक ओर नितान्त पौराणिक प्रतीक तो दूसरी ओर वैज्ञानिक उन्नति से जुड़े प्रतीक प्रयुक्त करने में प्रयोगवादी कवि सिद्धहस्त थे । द्वार, नदी, मछली, साँप जैसे पारम्परिक प्रतीकों को नवीन अर्थ, नवीन सन्दर्भ प्रदान करने के साथ-साथ भूत, ब्रह्मराक्षस, भैंस, गधा, ऊँट, कुत्ता जैसे नितान्त नये प्रतीक भी इस समय की कविता के शिल्प सौन्दर्य में नयापन भर देते हैं।
मिथक का प्रयोग
अज्ञेय कहते हैं कि "प्रत्येक प्रतीक के मूल में मिथक हुआ करता है।" मिथकीय अवधारणा से जुड़े प्रतीक या सीधे शब्दों में मिथकों का प्रयोग भी इस कालखण्ड के काव्य-शिल्प को अद्वितीय बना देते हैं।
इन कवियों ने वासुकि, शेष नाग, मंदराचल, असुर, इन्द्र, वज्रकीर्ति, मसीहा, दधीचि जैसे ढेरों प्रतीक अपने अंदाज में व्यक्त किए। भक्तिभाव विभोर होकर किये गए मिथक प्रयोग की अपेक्षा नये रूपाकार में मिथक प्रयोग की प्रवृत्ति अधिक दृष्टिगोचर होती है-
वामन ने तीन डग में त्रिलोक नाप लिया था, ऊँचे-पूरे बाम्हन की एक ही डकार से, मच गया कहीं ब्रह्मांड में हाहाकार ? 14
'असाध्य वीणा' मिथकीय प्रयोग की दृष्टि से अद्वितीय कविता है।
भाषा, शैली एवं छन्द-प्रयोग
ठीक इसी प्रकार प्रयोगवादी कवियों ने अप्रस्तुत योजना, उपमान प्रयोग, मूर्त के लिए अमूर्त प्रयोग, अमूर्त के लिए मूर्त प्रयोग, अमूर्त के लिए अमूर्त प्रयोग, मूर्त के लिए मूर्त प्रयोग जैसे कई शिल्पगत प्रयोग किए। इनके उपमान एकदम अनोखे और जीवन से गृहीत हुआ करते थे।
नोन-तेल लकड़ी की फिक्र
में लगे घुन से मकड़ी के जाले से, कोल्हू के बैल से 15
भाषा, शैली, शब्द प्रयोग अलंकार प्रयोग के साथ-साथ ( अर्थात् इस प्रयोग को सफल सम्प्रेषण की दृष्टि से अपर्याप्त जानकर) विराम चिह्न, संकेत चिह्न, अधूरे वाक्य आदि के माध्यम से अपनी 'उलझी हुई संवेदनाओं को पाठकों तक पहुँचाने के लिए प्रयोगवादी कवियों ने शिल्प को अपनी तई मोड़ा। प्रयोगवादी कवियों ने ग्रामीण, देश से लेकर संस्कृत, अंग्रेजी तक सभी प्रकार के शब्दों का प्रयोग किया। विविध विद्याशाखाओं यथा दर्शन, विज्ञान, मनोविज्ञान से यथावश्यक शब्दों को ग्रहण किया।
वैसे तो महाप्राण निराला ने 'खुल गए छंद के बंध' की घोषणा सर्वप्रथम की थी।
किन्तु उनके पश्चात् प्रयोगवादियों ने छन्द के क्षेत्र में विविध प्रयोग किए जिनमें से कुछ सफल तो कुछ असफल हो गए। छन्द के पारम्परिक मात्रिक रूपबन्ध से वे दूर ही रहे। परिणामतः उनकी कविता में लय और गति का अभाव बना रहा और काव्य कई बार गद्यात्मक बन गया। अंग्रेजी सॉनेट उर्दू की ग़ज़लों - रूबाइयों और लोकगीतों की धुनों के प्रभाव को अपनाने के बावजूद लयात्मकता का अभाव निरन्तर विद्यमान रहा। भारतभूषण अग्रवाल की कविता में छाई गद्यात्मकता द्रष्टव्य है-
इसलिए हमारी शादी न हो सकी
तुम अमीर थी पर मान लो, तुम गरीब होती तो भी क्या फर्क पड़ता क्योंकि तब मैं अमीर होता "
कई बार नयेपन का मोह कविता के शिल्प को यूँ सपाट भी बनाता है। नवीनता के अतिरिक्त आग्रह के कारण कविता का सम्प्रेषण बाधित हो जाता है। इस दुरूहता के लिए डॉ. नगेन्द्र पाँच बातों को उत्तरदायी मानते हैं- (i) भाव तत्त्व और काव्यानुभूति के मध्य रागात्मक के स्थान पर बुद्धिगत सम्बन्ध (ii) साधारणीकरण का त्याग (iii) उपचेतन मन के खण्ड अनुभवों का यथावत चित्रण (iv) भाषा का एकान्त एवं अनर्गल प्रयोग (v) नूतनता का सर्वग्राही मोह । इन विविध मत मतान्तरों के बावजूद यह कहना होगा कि शिल्प प्रयोग की दृष्टि से अज्ञेय का प्रतीक युक्त मिथक प्रयोग, प्रभाकर माचवे का अलंकार प्रयोग, उपमान प्रयोग, गिरिजाकुमार माथुर की टेकनिक प्रधानता, मुक्तिबोध की फैंटसी, शमशेर का प्रतीक प्रयोग असाधारण रूप से महत्त्वपूर्ण है।
वार्तालाप में शामिल हों