प्रमुख ग़ज़लकार (2) - leading ghazals(2)
जहीर कुरैशी
हिन्दी ग़ज़ल के क्षेत्र में जहीर कुरैशी का नाम विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है। विगत चार दशकों से वे हिन्दी ग़ज़ल लेखन में सक्रिय हैं। जहीर जनवादी लेखक संघ से संलग्न ग़ज़लकार हैं। इस एक बात से उनकी लेखकीय प्रतिबद्धता का अनुमान लगाया जा सकता है। हिन्दी ग़ज़ल के सन्दर्भ में उन्होंने कहा है- "हिन्दी ग़ज़ल आज की .... यानी विचार युग की ग़ज़ल है। वह कोठों पर गायी जाने वाली संगीत- उन्मुख ग़ज़ल नहीं, बल्कि खेतों, दफ्तरों, कारखानों में काम करते 'रफ-टफ लोगों की भावनाओं की निर्मल अभिव्यक्ति है।
इसलिए रदीफ़, काफ़िया, अरूज का पालन करते हुए भी हिन्दी ग़ज़ल अपने बर्ताव ... अपने भाव-भंगिमा के आधार पर उर्दू ग़ज़ल से एकदम करते हैं।" ज़हीर ने महानगरीय जीवन की सभ्यता का खोखलापन, पर्यावरण के प्रति लापरवाही, भूख के कारण समाप्तप्राय सामान्य आदमी जैसे विषयों के साथ-साथ मूल्य-हास की समस्या का बेबाक चित्रण किया। वे कभी-
शहर में हर कहीं मेला दिखाई देता है।
हरेक फिर भी अकेला दिखाई देता है।
कहकर तो कभी-
पीठ पीछे से हुए वार से डर लगता है। मुझ को हर दोस्त से, हर बार से डर लगता है।
कहकर वर्तमान जीवन में व्याप्त अविश्वसनीयता को अभिव्यक्त करते हैं।
जहीर ने स्त्री-जीवन की विडम्बना को व्यक्त करने में कोई कसर बाकी नहीं रखी। समय बदला, स्त्री की स्थिति न बदली बल्कि आधुनिक जीवन में स्त्री-समस्याओं ने अधिक विकराल रूप धारण किया है,
इस बात को वे सक्षमता से अधोरेखित करते हैं-
लिंग निर्धारण समस्या हो गई कोख में ही कत्ल कन्या हो गई
कहकर स्त्री से छीना जा रहा जीवन व्यक्त करते हैं। पर्यावरण चिन्ता पर वे ऐसी टिप्पणियाँ करते हैं-
सर्प रक्षा न कर पाए पेड़ की
बाहुबलशाली ही चंदन ले गए।
'इकोनामी ऑफ़ वईस' और 'डेंसिटी ऑफ़ पोएट्री' जैसी विशेषताओं के कारण ग़ज़ल विधा चुनने वाले ज़हीर ग़ज़लों के साथ अपने रिश्ते को अभिव्यक्त करते हुए अपने ग़ज़ल संग्रह 'एक टुकड़ा धूप के फ्लैप पर लिखते हैं- "कविता मेरे लिए न तो बुद्धि विलास का साधन रही और न ही कविता को मैंने पेट भरने का काम सौंपा है। ये दोनों स्थितियाँ कवि को कविता के प्रति ईमानदार नहीं रहने दे सकतीं। कविता मेरी उस तिलमिलाहट की अभिव्यक्ति है, जो वर्तमान जीवन परिवेश में बिखरी हुई विसंगतियों तथा विद्रूपताओं के कारण मुझमें बूंद-बूँद जमा होती रहती है। ऐसे ही जीवन्त क्षणों का स्पन्दन ये मेरी ग़ज़लें हैं।" यही कारण है कि वे अपने अक्षर-अक्षर को लेकर आश्वस्त हैं-
किस्से नहीं हैं ये किसी विरहन की पीर के
ये शेर हैं- अंधेरों से लड़ते 'जहीर' के
अदम गोंडवी
अदम गोंडवी हिन्दी ग़ज़ल का अजरामर नाम है। कुयन्त की ग़ज़ल परम्परा को आगे बढ़ाने वाले ग़ज़लकारों में पहला नाम अदम गोंडवी का ही है। भारतीय राजनीति को लेकर उन्होंने इतनी बेबाक टिप्पणियाँ की हैं कि अदम देखते ही देखते एक राजनैतिक शायर के रूप में उभरे।
वे भारत की गन्दी राजनीति, भ्रष्टाचार, लालफीताशाही, संसद की विडम्बनाएँ, आर्थिक विषमता, सामाजिक विसंगतियाँ जैसे विषयों पर लेखनी चलाते रहे-
काजू भुने प्लेट में व्हिस्की गिलास में उतरा है रामराज विधायक निवास में पक्के समाजवादी हैं तस्कर हों या डकैत इतना असर है खादी के उजले लिबास में
गरीबी, भुखमरी में जीती भारतीय सामान्य जन की व्यथा मनोदशा को अदम अत्यधिक मार्मिकता के साथ व्यक्त करते हैं-
आप कहते हैं सरापा गुलमुहर है ज़िंदगी हम गरीबों की नज़र में इक कहर है ज़िंदगी भुखमरी की धूप में कुम्हला गई अस्मत की बेल मौत के लम्हात में भी तल्खतर है ज़िंदगी अदम गोंडवी एक अल्पशिक्षित शायर थे।
उन्हें किताबों से ज्यादा शिक्षा जीवन ने दी सो किताबी शिक्षा की दृष्टि से कुछ कमियाँ उनकी ग़ज़लों में पायी जाती हैं। आलोचक कहते हैं कि अदम गोंडवी की ग़ज़लों की भाषा एवं शिल्प पक्ष में कई कमियाँ हैं। जैसे, वे बहर का योग्य ध्यान नहीं रख पाते हैं आदि-आदि। इस सन्दर्भ में प्रसिद्ध ग़ज़लकार एवं ग़ज़लों के आलोचक ज्ञान प्रकाश विवेक कहते हैं. ."... और शब्दावली एकदम मुँहफट । - इसके बावजूद यह शब्दावली अखरती नहीं। ग़ज़ल की न होने के बावजूद ग़ज़ल की लगती है। अदम गोंडवी ग़ज़ल को 'देसी' बना देते हैं। गँवारू नहीं।"
सही है, ग़ज़ल को ठेठ देसी आयाम प्रदान करने वाले यथार्थवादी ग़ज़लकार की बाइस वर्षों की ग़ज़ल यात्रा अत्यधिक संस्मरणीय है।
ज्ञान प्रकाश विवेक
ज्ञान प्रकाश विवेक हिन्दी ग़ज़ल का महत्त्वपूर्ण नाम है। वस्तुतः शायरी विवेक को अपने पिता से विरासत में मिली किन्तु पिता की पारम्परिक शायरी की बजाय उन्होंने प्रगतिशील लेखन चुना । ज्ञान प्रकाश विवेक ने विस्थापन की पीड़ा, विभाजन की त्रासदी को झेला था अतः वह तल्खी उनके लेखन में स्वाभाविक रूप से उतरी है -
हर खुशी में छुपा हुआ गम था
हँसने वाला भी चश्में- पुरनम था
मील-ही-मील साथ चलता रहा दर्द ही था जो मेरा हमदम था
दर्द के साथ इस नाते को निभाते निभाते विवेक देश की विषमताओं और विसंगतियों पर भी कड़ी टिप्पणियाँ करते हैं- -
उस भूखे आदमी का तब दर्द मैंने जाना जब गोल चाँद को भी रोटी-सा उसने माना
जावेद अख़्तर
जावेद अख्तर हिन्दी और उर्दू ग़ज़ल की सीमारेखा पर लेखनरत शायर हैं। उनकी गजलों में मानवीय संवेदनाएँ साम्प्रदायिक सद्भाव की चर्चा बार-बार आती है। शायरी का गुण उन्हें अपने प्रगतिशील पिता से प्राप्त हुआ। माँ के अत्यधिक करीब जावेद अख्तर माँ की मृत्यु और पिता के दूसरे निकाह के बाद बिल्कुल अकेले हो गए। यह अकेलापन उनकी शायरी में सर्वत्र छाया हुआ है। जैसा कि कुर्रतुल ऐन हैदर कहती हैं- "ताज़गी, गहराई और विविधता, भावनाओं की ईमानदारी और ज़िंदगी में नये भावों की तलाश उनकी शायरी की विशेषताएँ हैं।"
हम तो बचपन में भी अकेले थे
सिर्फ़ दिल की गली में खेले थे इक तरफ मोर्चे थे पलकों के इक तरफ आँसुओं के रेले थे
या फिर
अपनी महबूबा में अपनी माँ देखे बिना माँ के लड़कों की फितरत होती है
जैसे भावुक शेर हो या 'साजो सामान से भरे घर' के मुकाबले वह घर 'जिसमें बूढ़ी नानी रहती थी का दिल के करीब होना हो या फिर 'कत्थई आँखों वाली लड़की' की अठखेलियों का वर्णन हो जावेद अख़्तर ने खूब डूबकर लिखा और हिन्दी ग़ज़ल को नितान्त सुन्दर मनोवैज्ञानिक आयाम प्रदान किया।
निदा फाजली
निदा फाजली का नाम ग़ज़ल का बेहद सशक्त नाम है। वे उर्दू ग़ज़ल के दमदार शायर हैं। उर्दू ग़ज़ल को उन्होंने अनेक नये आयाम प्रदान किये। उन्होंने देशविभाजन, धार्मिक उन्माद, विस्थापन जैसे दश सहे । अपनी सारी पीड़ा को वे शायरी में उडेलते रहे। 'आँखों भर आकाश' निदा फाजली का देवनागरी में लिखा ग़ज़ल-गीत संकलन है। इसमें विशुद्ध हिन्दी में लिखी ग़ज़लों ने हिन्दी ग़ज़ल को एक नयी ताजगी प्रदान की-
छोटा करके देखिए जीवन का विस्तार
आँखों भर आकाश है मुट्ठी भर संसार
जैसे शेरों ने हिन्दी ग़ज़ल- विश्व को समृद्ध बनाया।
मुनव्वर राना
मुनव्वर राना भी उर्दू के साथ-साथ हिन्दी में खूब लिखते हैं। भावनाओं से ओतप्रोत उनकी ग़ज़लें विशेष से माँ को केन्द्र में रखकर लिखी हुई हैं। महबूबा का हुस्नो शबाब, रूख रूखसार का चित्रण करने की अपेक्षा रूप माँ के चित्रण में वे अधिक रमे हैं। उनकी शायरी पर कई बार 'इमोशनल ब्लैकमेलिंग का आरोप लगाया जाता हैं। इस सन्दर्भ में वे कहते हैं "मेरी शायरी पर मुद्दतों, बल्कि अब तक ज्यादा पढ़े लिखे लोग 'इमोशनल - ब्लैकमेलिंग' का इल्जाम लगाते रहे हैं। शब्दकोशों के मुताबिक ग़ज़ल का मतलब महबूब से बातें करना है। अगर इसे सच मान लिया जाए तो फिर महबूब 'माँ' क्यों नहीं हो सकती... अगर मेरे शेर इमोशनल ब्लैकमेलिंग है। तो श्रवणकुमार की फरमा-बरदारी को ये नाम क्यों नहीं दिया गया" वे अपने भावनाप्रधान लेखन में तन्मयता से डूबे रहे-
ज़रा सी बात है लेकिन हवा को कौन समझाए दिए से मेरी माँ मेरे लिए काजल बनाती है।
'ग़ज़ल गाँव', 'पीपल छाँव', 'सब उसके लिए', 'नीम के फूल', 'माँ' आदि कई संकलनों में प्रकाशित उनकी ग़ज़लें हिन्दी ग़ज़ल साहित्य को समृद्ध बना रही हैं।
गुलज़ार
गुलज़ार हिन्दी और उर्दू की सीमारेखा पर खड़े एक ऐसे ग़ज़लकार हैं जिनका हिन्दी और उर्दू ग़ज़लों को समान योगदान रहा है। जैसा कि यतीन्द्र मिश्र कहते हैं- "उनकी कविता, जो हिन्दी की ज़मीन से निकलकर दूर आसमान तक उर्दू की पतंग बनकर उड़ती है...।" उनके द्वारा किये गए बिम्ब-प्रयोग अपने आप में अनोखे हैं। प्राकृतिक, साहित्यिक, आध्यात्मिक बिम्बों का प्रयोग कर वे अपनी ग़ज़लों को उच्चाकाश तक ले जाते हैं।
विभाजन की त्रासदी झेल चुका यह शायर नितान्त कोमल मानसिकता का धनी है। अतः उनकी शायरी में कोमलता, रिश्तों का व्याकरण, सूफ़ियाना ढंग, प्रेम, पीड़ा आदि कई भाव कुलांचे भरते हैं-
जब भी ये दिल उदास होता है
जाने कौन आसपास होता है
जैसे शेर हो या
जिंदगी यूँ हुई बसर तन्हा काफिला साथ और सफर तन्हा
जैसे शेर हों, उनका भावनाप्रधान वीतराग बराबर झलकता है। शब्दों की कारीगिरी गुलजार की ग़ज़लों
की विशेषता है -
हाथ छूटें भी तो रिश्ते नहीं छोड़ा करते
वक्त की शाख़ से लम्हे नहीं तोड़ा करते
जैसे नाजुक शब्द प्रयोग गुलजार ही कर सकते हैं। सहज सरल हिन्दुस्तानी बानी में लिखने वाले गुलजार हिन्दी ग़ज़ल साहित्य को समृद्ध बना रहे हैं।
हिन्दी ग़ज़ल को समृद्धि के इस पड़ाव पहुँचाने में शेरजंग गर्ग, राजेश रेड्डी, गिरिराज शरण अग्रवाल, हनुमंत नायडू वेद प्रकाश अमिताभ, अनिल गहिलौत, राधेश्याम शुक्ल जैसे कई-कई ग़ज़लकारों का अत्यधिक योगदान है। इन्हीं ग़ज़लकारों की लेखनी के कारण आज हिन्दी ग़ज़ल साहित्य-विश्व का सूर्य बन चुकी है।
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