नागार्जुन(2) - Nagarjuna(2)

इसके अतिरिक्त 'इंदुजी इंदुजी क्या हुआ आपको', 'शासन की बंदूक', 'बापू के तीन बंदर', 'चंदू मैंने सपना देखा' जैसी कई चर्चित कविताएं हैं, जिनमें तत्कालीन राजनीति की असंगतियों और भ्रष्टाचार पर कड़ा ऐतराज जताया गया है । 'अब बंद करो हे देवी यह चुनाव का प्रहसन शीर्षक कविता में व्यंग्य के कई टुकड़े एक साथ रखे गए है, जैसे सुस्त प्रतिपक्षी, शेर-साँप, वीराने में मुखर ढूँढ दिन में खिलती रजनीगंधा, महँगाई की सूपनखा, सोशलिज़्म की नयी ऋचाएँ, दस बाँहों वाली देवी, कातूसों की माला, मतवाले पंडों की थिरकन आदि ध्यान से देखें तो नागार्जुन का व्यंग्य इतना सपाट नहीं है, वह गहराई में उतरकर अर्थ छवियों की पड़ताल करते हैं। नेताओं के टिकट पाने का दृश्य तो रसलीन के प्रसिद्ध मुहावरे को नया सन्दर्भ देता प्रतीत होता है-


श्वेतस्याम रतनार अँखिया निहार के सिंडकेटी प्रभुओं की पग धूर झार के लौटे हैं दिल्ली से कल टिकट मार के खिले हैं दाँत ज्यों दाने अनार के


आये दिन बहार के


यहाँ व्यंग्य के माध्यम से वे सामाजिक-राजनैतिक विद्रूपता का पर्दाफाश करते हैं, उनके मुखौटे उतारते हैं। इसी प्रकार 'शासन की बंदूक' शीर्षक कविता में वे सच्चाई को प्रकट करने के साथ-साथ सत्ता को चुनौती भी देते हैं-


जली ठूंठ पर बैठकर गायी कोकिला कूक बाल न बाँका कर सकी शासन की बंदूक


इस प्रकार की मुँहफट कविता में स्पष्टवादिता के लिए नागार्जुन को सदा याद किया जाएगा। नागार्जुन की इन सीधी-सपाट कविताओं की सबसे बड़ी खासियत यह है कि सामान्य जनता से मुखातिब पोस्टर की तरह हैं, जिन्हें समझने के लिए किसी अतिरिक्त अर्हता की जरूरत नहीं होती।


नागार्जुन का व्यंग्य और आक्रोश सिर्फ़ देश के नेता और शोषकों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि विश्व की महाशक्ति अमेरिका पर भी वे निशाना साधने से नहीं चूकते।

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वैसे शोषक कहीं का भी हो, निन्दनीय ही माना जाएगा, इसलिए नैतिक साहस के बल पर वे अमेरिका-वियतनाम युद्ध के मुद्दे को उठाते हैं जिसमें वियतनामी जनता के स्वतन्त्रता संग्राम ने अमेरिका के सारे शान्ति प्रतीकों के मुँह पर कालिख पोत दिया था। वे 'देवी लिबर्टी को लानत है सौ बार' जैसी कविताओं के माध्यम से अमेरिकी दम्भ पर करारा प्रहार करते हैं-


पिछली रात सपने में देखा तुमने


लिंकन का दिव्य प्रेत लिपटा पड़ा है। देवी लिबर्टी की प्रतिमा से ... ।


- (हजार हजार बाँहों वाली, पृष्ठ 155 )


अमेरिका सहित सभी साम्राजवादी ताकतों की तथाकथित शान्ति की चालों में अन्तर्निहित उनके स्वार्थी को वे देश के नेताओं के सामने प्रकट करते हैं और सचेत रहने के लिए कहते हैं-


पेटी में पिस्तौल सँभाले, अमन चैन के बोल अधर पर


अब भी बाइबिल बाँट रहे हैं, गोरी चमड़ी वाले बर्बर ... कोरिया को विरान बनाने वाले राजघाट में बापूजी की समाधि पर..... हमें शान्ति की सीख दे रहे चील गीध के चचे भतीजे हमें शील का पाठ पढ़ाते टाइ कालर सूट बूट से लैस अद्यतन बाघ भेड़िये ?


- ( तालाब की मछलियाँ, पृष्ठ 163)


वे देश के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को भी सावधान करते हुए कहते हैं कि-


सावधान ओ पण्डित नेहरू !


पैर तुम्हारे धँसे जा रहे डालर की दलदल में प्रतिपल ।


- (हजार हजार बाँहों वाली, पृष्ठ 44 )


बाबा ने अपनी कविताओं का भाव-धरातल सदा सहज और प्रत्यक्ष यथार्थ रखा, वह यथार्थ जिससे समाज का आम आदमी रोज जूझता है। यह भाव धरातल एक ऐसा धरातल है जो नाना प्रकार के काव्य- आन्दोलनों से उपजते भाव- बोधों के अस्थिर धरातल की तुलना में स्थायी और अधिक महत्त्वपूर्ण है। नागार्जुन ने सही मायने में शोषित, प्रताड़ित, गरीब लोगों को वाणी दी। किसान, मजदू और निम्न मध्यमवर्ग का शोषण करने वाली ताकतों के वे हमेशा विरोधी रहे और व्यवस्था में परिवर्तन लाने के लिए क्रान्ति का आह्वान करते रहे । विश्वम्भर मानव के शब्दों में कहें तो, "व्यक्तिगत दुःख पर न रुककर वे व्यापक दुःख पर प्रकाश डालते हैं और यही सच्चे कवि की पहचान है।"


नागार्जुन की कविता सिर्फ़ यथार्थ का निरूपण ही नहीं करती है, बल्कि उन जन-शक्तियों की खोज का मार्ग भी दिखाती है जिसके द्वारा मुक्त और शोषणमुक्त समाज की स्थापना की जा सकती है। नागार्जुन के जन रचनाकार होने की गवाह है, उनकी कविता 'हरिजन गाथा' । यह कविता उन्होंने 1977 ई. में पटना से करीब चालीस किलोमीटर दूर स्थित बेलछी गाँव में हुए दलितों के नरसंहार के आक्रोश में लिखी थी। उस नरसंहार में तेरह दलितों को ज़िंदा जला दिया गया था और उस अमानवीय कुकृत्य ने पूरे राष्ट्रीय मानस व मीडियावर्ग को झकझोर दिया था। बाद में 1977 में ही सम्पन्न हुए आम चुनाव में इस घटना का राजनैतिक लाभ उठाने के लिए इंदिरा गाँधी उस गाँव तक हाथी पर चढ़कर पहुँची थीं और वहीं से अपने चुनावी अभियान की शुरुआत की थी। पूरी कविता दलितों की मर्मान्तक पीड़ा और प्रतिशोध भावना से भरी हुई हैं। आजादी के इतने दिनों के बाद भी देश की बड़ी आबादी कहे जाने वाले दलितों के साथ हो रहे अमानुषिक उत्पीड़न को यह कविता व्यक्त करती है। कविता प्रबन्ध काव्य के लयपूर्ण कथात्मक विन्यास में रचित है। कविता के भीतर कथा चलती है जो कविता का आख्यान में बदल देती है। कथा में नरसंहार के कुछ समय बाद दलित स्त्री के गर्भ से बच्चा पैदा होता है। उसके पिता की भी हत्या कर दी गई है। वह पितृहीन संतान संसार में पैदा तो जाती है पर उसके दुर्भाग्य के बारे में दलित वर्ग का हर व्यक्ति चिन्तित है। उसके भावी जीवन के बारे में जानने के लिए एक रैदासी सन्त को बुलाया जाता है जो बच्चे की हाथ की रेखाओं को पढ़कर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करता है। वह भविष्यवाणी करता है कि बच्चा दलितों और शोषितों का नायक बनेगा और उन्हें हर प्रकार की ज़ुल्म और ज्यादती से मुक्त कराएगा। उसके नाम से चोर-उचक्के और गुण्डे थर-थर काँपेंगे और वह सर्वहारा की मुक्ति के लिए सशस्त्र संघर्ष की राह ग्रहण करेगा। इस कथा-आख्यान से कंस-कृष्ण के पौराणिक द्वन्द्व का आभास भी मिलता है, पर उससे यह इस मायने में भिन्न है कि इसमें नायक को सवर्ण के स्थान पर दलित जाति के घर पैदा होते दर्शाया गया है। यथा -


दिल ने कहा- अरे यह बालक


निम्न वर्ग का नायक होगा होंगे इसके सी सहयोद्धा लाख-लाख जन अनुचर होंगे


नागार्जुन यह कविता उस समय लिख रहे हैं, जब पूरा भोजपुर दहक रहा था। गाँवों में ज़मींदार और किसान आमने-सामने थे। विकल्प सिर्फ़ यह थे कि या तो हिंसा का जवाब प्रतिहिंसा से दिया जाए या फिर खुद को अहिंसक बनाये रखकर सब कुछ सह लिया जाए। नागार्जुन ने हिंसा के बदले प्रतिहिंसा को प्रस्तावित किया । नागार्जुन कई बार साक्षात्कार में यह स्वीकार भी किया है कि प्रतिहिंसा मेरी कविता का स्थायी भाव है।


इसके अतिरिक्त इस कविता में पारलौकिक शक्तियों के बल पर किसी दुष्ट आततायी के वध के स्थान पर व्यवस्था परिवर्तन करने वाले सामूहिक प्रयत्न की ओर संकेत दिये गए हैं। इस कविता में भी वे राजनैतिक रूपान्तरण के लिए पौराणिक चेतना का प्रयोग करते प्रतीत होते हैं पर उसका उद्देश्य धार्मिक वर्ण-व्यवस्था की क्रूरता का उद्घाटन हो जाता है। वे वर्ण-व्यवस्था की बीभत्स हिंसा को घटित होते इस प्रकार दिखाते हैं-


ऐसा तो कभी नहीं हुआ था कि


एक नहीं, दो नहीं, तीन नहीं


तेरह के तेरह अभागे अग्नि की विकराल लपटों में


अकिंचन मनुपुत्र / ज़िंदा झोंक दिये गए हों


साधन-सम्पन्न ऊँची जातियों वाले सौ-सौ मनुपुत्रों द्वारा


समाज की इस बीभत्सता को दिखाने में नागार्जुन बेहद संवेदनशीलता का परिचय देते हैं। प्रसिद्ध आलोचक नामवर सिंह ने उनकी इस काव्य प्रवृत्ति के प्रसंग में ठीक ही लिखा है- "संस्कृत काव्यशास्त्र में नौ रसों के अन्तर्गत बीभत्स की भी गणना की गई है और खानापूरी के लिए थोड़ी-बहुत बीभत्स रस की रचनाएँ भी हुई हैं। किन्तु नागार्जुन पहले कवि हैं जिन्होंने सामाजिक राजनैतिक सन्दर्भ में बीभत्स को नयी शक्ति प्रदान की है। " नागार्जुन की कविताएँ केवल ख़बर की कविताएँ नहीं बल्कि दखल की कविताएं हैं। सहजानन्द सरस्वती, राहुल सांकृत्यायन, जे. पी. और नक्सल आन्दोलनों में भागीदारी के कारण जनता से उनका सीधा जुड़ाव था। वे अपने समय की तमाम विसंगतियों को पूरी तरह समझते हैं और समाज में परिवर्तन के लिए जनता के राजनैतिक हस्तक्षेप को आवश्यक मानते हैं। वे स्वयं में कविता के माध्यम से अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त करते हैं। नागार्जुन के लिए लिखना भी राजनैतिक कर्म था और जीना भी उनकी कविताएँ भी इसीलिए राजनैतिक घटनाओं व परिवर्तन के संघर्षो के प्रति संवेदनशील हैं और सबसे प्रामाणिक ढंग से जनजीवन से लगाव को व्यक्त करती हैं। "उनकी रचनाएँ उनकी नज़र में विद्वता का प्रतिबिम्बन नहीं बल्कि उनके आत्मविस्तार का साधन हैं। लोक उनके लिए किताबी तथ्य नहीं बल्कि रोजमर्रा का जीवनानुभव है।" 'हरिजन गाथा' कविता में भी वह जिस प्रकार राक्षसी काण्ड के बारे में लिखते हैं, वह समूची भारतीय कविता के सामने अदभुत एक उदाहरण बनकर उपस्थित होता है। उत्पीड़न की वेदना को वह बग़ावत में ढलते देखते हैं और उसमें केवल किसी तबके या वर्ग की तक़दीर नहीं बल्कि पूरे भारत के राष्ट्रीय-सामाजिक चरित्र में युगान्तरकारी परिवर्तन का आह्वान सुनते हैं, लिखते हैं-


दिल ने कहा- दलित माओं के सब बच्चे


अब बाग़ी होंगे अग्निपुत्रा होंगे,


वे अन्तिम विप्लव के सहभागी होंगे


यह पूरी कविता क्रूर प्रशासन और सामन्ती ताक़तों के निर्लज्ज गठजोड़ पर चोट करती है। भारत में आज़ादी के बाद भी लम्बे समय तक राज्य की भूमिका पर प्रश्न करना ईश्वर और समाज से द्रोह करने जैसा माना जाता रहा है। सदैव लोकतन्त्र को राजतन्त्र की तरह चलाने के प्रयास होते रहे हैं। "ऐसे समय नागार्जुन की निगाह केवल नेहरूवादी शहरी भारत पर नहीं थी जहाँ आधुनिक मध्यमवर्ग विकसित हो रहा था और पूरे भारत की किस्मत बदलने के लिए यह मध्यमवर्ग अपनी किसी बड़ी भूमिका की कल्पना कर रहा था। वह किसी ऐसे शहरी भारत पर भी बहुत विश्वास करने के लिए तैयार नहीं थे जो ग्रामीण दरिद्रता व विस्थापन से पैदा श्रम के दोहन के बल पर टिका होता है। " देश की सामाजिक और राजनीति बदलाव की ऐसी प्रवृत्ति का नागार्जुन ने भरपूर विरोध किया । नागार्जुन परिवर्तन के उभार का मुख्य केन्द्र गाँवों को मानते थे और गाँवों के दलित-निम्नवर्ग को परिवर्तनकामी चेतना का वाहक घोषित करते हैं। उन्हें संगठित प्रतिरोध के बल पर नया इतिहास रचने वाली ताकतें गाँवों में ही दिखती थीं और गाँव छोड़कर दिल्ली-पटना जाना उनके लिए ग़लत समझौते जैसा था।


चूँकि किसान केवल भूमि से ही नहीं बल्कि शोषक वर्ग से पुश्तैनी सम्बन्धों में बँधा रहता है इसलिए वह विद्रोह करने की स्थिति में कम रहता है। एक ही गाँव में कई पुश्तों से रह रहा किसान ज़मींदार शोषक वर्ग से पुश्तैनी रिश्तों में ख़ुद को बँधा पाता है और वह लड़ने के लिए तैयार नहीं रहता। वह पीढ़ियों से चले आ रहे उत्पीड़न को भी स्वीकार कर लेता है। पर किसी नये औद्योगिक वातावरण में जहाँ मज़दूरों का नया वर्ग अस्तित्व में आ रहा हो, वहाँ वह विरोध व विद्रोह की राजनीति के लिए शीघ्र तैयार हो जाता है। इसलिए नागार्जुन कविता में दलित शिशु का कर्मक्षेत्र व राजनीति झरिया, गिरिडीह व बोकारो होने की कल्पना करते है जहाँ कोयला व लोहे की खदानें हैं और जहाँ वह-


खान खोदने वाले सौ-सौ मज़दूरों के बीच पलेगा युग की आँचों में फौलादी


साँचे-सा यह वहीं ढलेगा।


नागार्जुन के यहाँ हिंसा और प्रतिहिंसा ऐसे भाव हैं जिनसे उनका अच्छा-खासा लगाव है। उन्होंने लिखा


भी है कि-


जन-जन में जो ऊर्जा भर दे


प्रतिहिंसा ही स्थायीभाव है मेरे कवि का मैं उद्गाता हूँ उस रवि का।


- (खिचड़ी विप्लव देखा मैंने, पृष्ठ 87)


प्रतिहिंसा का यह भाव जन भावनाओं की ऊँचाई से अपनी उदात्त चेतना अर्जित करता है। प्रतिहिंसा का यह पूरा दर्शन मूलतः राज्य के खिलाफ खड़े हिंसक आन्दोलनों के निर्मम दमन और विश्व साम्यवाद से प्रेरित था । इसलिए उनकी कविता में 1947 ई. के बाद के भारत के बारे में तीखी आलोचनाएँ उपस्थित हैं। ये आलोचनाएँ उस व्यवस्था पर चोट करती हैं जो नौकरशाहों की फाइलों और राजनेताओं के स्वार्थों की गुलाम हो गई है।